चक्षु:श्रवा (भाग – १)

चन्द्रकान्त बक्षी

दादा केसरीसिंघ की उम्र उन्हें पता नहीं थी मगर उन्हें बराबर याद था कि विक्टोरिया टर्मिनस स्टेशन बना तब वे अपनी प्रपौत्री कोशा जितने थे | नया स्टेशन बना तब उनके पिता उन्हें चलाकर देखने ले गए थे और समझाया था कि यहाँ आगगाड़ी आएगी | गाड़ी धूएँ से चलेगी | पहली आगगाड़ी आई तब शहर के कई नामांकित स्त्री-पुरुष देखने आए थे | दादा केसरीसिंघ कोशा जितने थे पर स्टेशन पर प्रवेश करती वह पहली आगगाड़ी उनके स्मृतिपट पर स्पष्ट थी, काला लम्बा गोल मूंहवाला अजगर जैसा जानवर, धुंआ निकालता, चित्कार करता, भभकता पटरी पर होकर अन्दर आया था और लोग दूर हट गए थे और जानवर थमकर हाँफकर, सिसकता हुआ ठण्डा पड़ गया था और गोरे साहब गाड़ी से उतरे थे और मेमसाहब, रंगीन छत्रियाँ लेकर | और मेमसाहबों के लिए आराम करने के लिए एक शामियाना बाँधा गया था | बाहर मेला लगा था और शरबत पिए जा रहे थे | आठ साल की कोशा खिलखिलाकर हंसते हुए यह सुन रही थी | पीछे से एक पुत्रने दादा केसरीसिंघ को हिसाब लगाकर बताया था कि दादा, आप १८८० में जन्मे होंगे, उस वक्त आपकी उम्र पक्का आठ साल होगी क्योंकि १८८८ में विक्टोरिया टर्मिनस का पक्का स्टेशन बंधा था | दादा केसरीसिंघ आँखें मीचकर कहते, हाँ, सौ में थोड़े ही साल बाकी हैं | तब पुत्र ने कहा था कि आपकी उम्र बयानवे साल है | पर उस ज़माने में उम्र की तारीख-समय लिखकर रखने का रिवाज नहीं था | कोशा ने पूछा था, दादा, आप कौनसी हॉस्पिटल में जन्मे थे ?

प्रपौत्री कोशा और दादा केसरीसिंघ के बीच फर्क चौरासी साल का था | मगर दादा की कोशा के साथ सबसे ज़्यादा बनती थी और कोशा को भी दादा की बातें सुनने में बड़ा मज़ा आता | दादा बहुत कम सुन सकते | मगर एक पौत्र जो कि रेडियो इंजीनियर था वह कहता कि दादा कोशा की बात सबसे ज़्यादा सुन सकते हैं | दादा और कोशा की वेवलेंग्थ एक ही है | वह हँसकर बोलता कि इसलिए कम्युनिकेशन अच्छा है! दादा के दांत सालों पहले जा चुके थे, कृत्रिम दांत भी अब ज़्यादा काम नहीं करते थे और दादा खाते वक्त हलका हलका चबाने के लिए ही कृत्रिम दंतावली का इस्तेमाल करते, वरना बिना दांत का उनका जबड़ा पूरा दिन हिलता रहता | खाने में प्रवाही ही रहता | दादा धुम्मसी आँखों से कोशा के सामने देखकर कहते, बेबी, तू कान से सुनती है न ? मैं आँखों से सुनता हूँ | कोशा किलकारियाँ  करती हँसने लगती – तो फिर सबकी बातें क्यों आँखों से नहीं सुनते ? मेरी ही बात क्यों आँखों से सुनते हो ? दादा कहते, क्योंकि तुम मुझे सबसे ज़्यादा पसंद हो | कोशा कहती, कोई आँख से नहीं सुनता, सुनते हैं कान से, देखते हैं आँख से | और दादा ज़रा गंभीर होकर समझाते, तुम्हें पता है साँप के कान नहीं होते | साँप आँखों से सुनता है, इसलिए उसे चक्षु:श्रवा कहते हैं | संस्कृत में – जो आँखों से सुनता है, वह इन्सान बूढ़ा हो जाता है इसलिए आँखों से सुनता है | कोशा कुछ समजती नहीं पर दोनों कानों में उंगलियाँ डालकर आँखों से दादा के सामने देखती रहती, फिर कहती : पर मुझे तो कुछ भी सुनाई नहीं दे रहा | दादा हँसते – पगली लड़की है!

मुंबई में प्लेग आया तब दादा केसरीसिंघ लगभग जवान हो चुके थे पर बीसमी सदी अभी तक आई नहीं थी और लोग मुंबई छोड़कर जाने लगे तब उनके पिता ने उनके चाचा को कहा था : प्रह्ल़ाद, बालबच्चों को लेकर तुम कल अपने गाँव चले जाओ | अब यहाँ रहने में बड़ा जोखिम है – कमसे कम बच्चों-स्त्रीओं को यहाँ से ले चलते हैं | हम मर्दों को तो यहीं रहना होगा | और दादा केसरीसिंघ के हठ करने के बावजूद उनको सबके साथ गाँव जाना पड़ा था | प्लेग चला और जैसे ईश्वर पापोंकी सज़ा कर रहा हो, वैसे हज़ारों  परिवार ताराज हो गए | एक ही परिवार के तीन लोग एक ही दिन में मर जाने के किस्से भी सुनने मिले | यज्ञ, होमहवन, पूजा-प्रार्थना बहुत कुछ चला, अकाल भी आया, ढोर मुफ्त देने लगे और दादा केसरीसिंघ ने गरीब किसानों को उनके चाचा प्रह्लादसिंघ के पास आँखों में आँसू लेकर गाय देने आते देखा था | किसान कहते थे : चाचा, गायमाता को खिला नहीं सकते, उन्हें बचाइये, हमारा हम देख लेंगे | और चाचा प्रह्लादसिंघ की आँखों में आँसू देखना दादा को याद था | इंसान मक्खियों की तरह मर रहे थे | हलके लोग तो लकड़ी मिल नहीं रही थी इसलिए आग मुर्दे के मूंह में रखकर हिजरत कर रहे थे | कई लोग लाशों को समंदर में फेंक देते थे | दादा केसरीसिंघने छोटी उम्र में ही मौत को बहुत करीब से देख लिया था और रानी विक्टोरिया की छापवाला, उनके पिता ने मुंबई से लिखा हुआ पोस्टकार्ड भी पढ़ा था कि यहाँ मुंबई शहर में तो प्लेग की वजह से दंगे भी हो रहे हैं |

प्रपौत्री कोशा पूछती : दादा साँप कान से सुनता है ? और दादा केसरीसिंघ धीरे धीरे समझाते : साँप के कान नहीं होते, साँप की आँखें होती हैं | वह आँख से देखता है | मदारी बीन बजाता है और डोलता है इसलिए साँप उसे देखकर डोलता है | मदारी स्थिर हो जाता है तब साँप स्थिर हो जाता है | वह आवाज़ नहीं सुनता, आँख से देखता रहता है और डोलता रहता है इसलिए उसे चक्षु:श्रवा कहते हैं | मतलब जो आँखों से सुनता है वह | दादा केसरीसिंघ बात ख़तम करे उससे पहले ही कोशा पूछ देती, दादा! साँप कितना जीता है ? सौ साल | दादा हँसते | आपको सौ साल हो गए ? दादा कहते : नहीं, तुम कोलेज जाओगी तब मुझे सौ साल होंगे | मैं कोलेज कब जाउंगी ? और बातें आड़ी-टेढ़ी पटरी पर चला करती | स्कूल में कोशा अपने मित्रों पिनाक, राजु और नियति को बड़ी टिफ़िन रिसेस के वक्त बात करती, मेरे डेडी के डेडी के डेडी सौ साल के हैं, और उसके मित्र आँखें फैलाकर, चबाना रोककर सुनते रहते, फिर कोशा बहुत धीरे से, लगभग कानमें कहती हो वैसे स्पष्टता करती, तुम्हें पता है वह कानों से नहीं सुनते, आँखों से सुनते हैं | फिर वह आगे कहती, किसीको बताना नहीं, प्रोमिस ? बच्चे कहते प्रोमिस और बड़ी रिसेस ख़तम होने की घंटी बजती |

दादा केसरीसिंघ की आँखें अभी भी देख सकती थीं | शरीर में प्रवृत्ति थी और रोज सुबह-शाम वे घर में धीरे धीरे घूम सकते | बाल झड गए थे, सिर के दोनों तरफ की हड्डियाँ निकल आई थी और आँखें हड्डियों के गोल घर में बाहर से लगाईं हों वैसी लगती थी | मगर उन आँखों के पीछे जी हुई एक भरपूर ज़िंदगी की झलकें अभी तक कायम थी और भूतकाल – साठ, सत्तर, पचहत्तर पुराने भूतकाल की झपटें, स्वर अभी भी दादा केसरीसिंघ सुन सकते थे | दादा ने पूरे हिन्दुस्तान में नौकरियाँ की थी | पेशावर से कन्याकुमारी तक पेट भरकर घूमे थे, बहुत देखा था, बहुत खाया-पीया था | राजा-महाराजा-नवाब-हुक्काम रेज़ीडेंटो की दुनिया वे बहुत आसानी से याद कर सकते थे | आज़ादी आने के बाद उन्होंने प्रवृत्त जीवन समेट लिया था | और निवृत्ति को भी पचास साल हो चुके थे | दादा केसरीसिंघ कहते कि आज़ादी के बाद ज़िंदगी फीकी पड़ गई | अंग्रेज साहब क्या लोग थे ! अब तो सिर्फ मच्छर बुनबुनाते हैं | राजा – नवाब कदरदान थे, गुणी थे | खानदानी खून उनकी रगों में बहता था | अब तो काला पैसा और कला खून पूरे देश में फैल गए हैं | सफ़ेद कपड़ेवालों ने पूरे देश को काला कर दिया | दादा कभी अपनी पुरानी बेत को पकड़ते, उनकी पघड़ी की किनार पर सड़ी हुई ज़री की किनारिओं पर कांपती उंगलियाँ फेरते, रंग उडी हुई साटिन की रिबन पर लटकते मैडल हाथ में लेकर देखते रहते , काले मखमल पर चांदी के तार से काम की हुई जयपुरी जूतियाँ पहनकर , पित्तल पर गिल्ट की हुई वज़नदार नक्षी की हुई फ्रेम में जड़े पुराने लम्बगोल वेनिशियन शीशे में बहुत पास जाकर अपना मुरझाया हुआ बयानवे साल का चेहरा देखते और पानीदार आँखोंमें से स्मृति के मेघधनुषी प्रतिबिम्ब फैल जाते और अय्याशी की साड़ी घूंटी हुई तर्जो के दबे हुए प्रतिध्वनी सुनाई देने लगते –

 

Subscribe to ‘Rakhadta Bhatakta’

Processing…
Success! You're on the list.

गुड नाइट, डेडी!

चन्द्रकान्त बक्षी

उसने देखा बच्ची कहानी सुनते सुनते ही सो गई थी।

धीरे से उसने बच्ची के बालोँकी दोनोँ रेशमी रिबनें खोलीं | फिर एक-एक करके हेरपिन्स निकालीं, बाल खुले कर दिए और सिर पर हाथ फेरा, गाल पर हलका सा बोसा दिया | कहनेका मन हुआ ‘गुड नाईट, डार्लिंग!’

सुबहकी फ्लाईट से जाना था बच्ची को |

मेज पर पड़ी पुरानी डबल-लाइनवाली नोटका पन्ना फफडाया | वह खडा हुआ | होमवर्ककी किताब ठीक करके बेगमें रखते उसका ध्यान गया | आड़े-टेढ़े अक्षरसे अंग्रेजीमें पेन्सिलसे लिखा हुआ था : ‘फेरी पिंक कुड नोट फ्लाय, फॉर हर विंग्स वर वेट |’ – पंख भीग गए थे इसलिए फेरी पिंक उड़ नहीं पाई थी | फेरी पिंक परी थी | नदीके किनारे रहती थी | लाइलेकके फूलों के बीच उड़ती थी | वह उड़ती थी इसलिए फूल हिलते थे और पंखुड़ियोंसे शबनम झरती थी , और शबनमकी एक बूँद झरती वहाँ एक तितली पंख फफड़ाकर उड़ जाती थी |

उसने किताब बंद की और बेगमें रखी |

उसने कहा था : ‘बेटा, जल्दी से सो जाओ, कल जल्दी उठकर तैयार होना है |’

‘क्यों ?’

‘कल जल्दी उठना है | फिर तुम उठोगी नहीं |’

‘उठूँगी, पहले मुझे कहानी सुनाओ |’

वह कहानी बनाने लगा : ‘एक बच्ची थी …’

‘मेरे जैसी ?’

‘हाँ, तुम्हारे जैसी | मगर, उसके बाल तुमसे लम्बे थे.’

‘कितने लम्बे , डेडी ?’

‘बहुत लम्बे |’

‘वह चश्मे पहनती थी ?’

वह हसा | फिर याद आया, मम्मी चश्मे पहनती थी इसलिए. वह ग़मगीन हो गया. संयत हो गया | फिर हँसा | ‘तुम्हेँ कैसे पता चल गया?’

‘मुझे नहीं पता |’

‘अच्छा | वह चश्मे पहनती थी ?’

‘हमारी मम्मी भी चश्मे पहनती है न ?’ ‘हाँ, मम्मी चश्मे पहनती थी | मगर, बच्चीके चश्मे मम्मीके चश्मोंसे छोटे थे |’

‘वह देख नहीं पाती थी ?’

‘देख पाती थी. मगर, ज़्यादा नहीं |’

‘चश्मा पहनने के बाद रो नहीं सकते ?’

‘रो सकते हैं |’

‘फिर ?’

‘ – फिर वह बच्ची एक बादल पर बैठ गई | बादलमें बहुत पानी था |’

‘बच्ची भीग गई ?’

‘नहीं बेटा, वह बच्ची बादल पर बैठ गई और बादल आसमानमें बह रहा था | एक छोटा हरा पंछी आया | पंछी बहुत थक गया था | उड़-उड़कर पंख हिलाता डुलाता वह बादल पर बैठकर थोड़ी साँस लेने लगा, और …’

‘वह रास्ता भूल गया था ?’

‘हाँ, वह रास्ता भूल गया था |’

‘रात हो गई ?’

‘नहीं, रात नहीं थी. पर, अन्धेरा हो गया था इसलिए पंछी घबरा रहा था | वह बच्चीके पास जाकर बैठ गया |’

‘उसे डर लगता था ?’

‘डर तो लगता है न ? इतने बड़े आसमानमें अकेला अकेला उड़ता रहता तो डर तो लगता न ?’

‘लगता है’

‘इसलिए बच्चीने पंछीको पूछा: पंछी तुम कहाँ रहते हो?’

‘पंछी कहाँ रहता था ?’

‘पंछी बोला, मैं तो एक तारेमें रहता हूँ | वह तारा यहाँ से बहुत दूर है |’

‘कितना दूर ?’

‘बहुत दूर | मामाजीका घर है न, उतना दूर |’

‘पंछी रोने लगा ?’

‘नहीं , वह बोला बच्ची, मैं रास्ता भूल गया हूँ | मुझे बादल पर बैठने दोगी ? बच्ची बोली : हाँ, ज़रूर बैठने दूँगी | फिर पंछी बैठा | और बादल आगे बहने लगा |’

‘वह उड़ उड़कर थक गया था ?’

‘हाँ बेटा, वह बहुत उड़ उड़कर थक गया था, इसलिए बादल पर बच्चीके साथ बैठ गया |’

‘फिर ?’

फिर चश्मेवाली बच्चीने हरे पंछीसे पूछा : ‘पंछी, तुम्हे गाना आता है ?’

पंछी बोला : ‘मुझे तो गाना आएगा ही न!’

बच्चीने पूछा : ‘मुझे एक गाना सुनाओगे ?’

‘पंछीओंको गीत गाना आता है, डेडी ?’

‘इस पंछीको आता था बेटा , उसने गाया |’

‘बच्चीको मज़ा आया ?’

‘बहुत मज़ा आया | बच्ची बहुत खुश हो गई | खडी हो गई | बहुत नाची | वह नाची इसलिए बादल हिला और बादालमें से बारिश गिरने लगी |’

‘तुम कितनी अच्छी बातें करते हो, डेडी!’

‘तुम्हेँ अच्छी लगी ?’

‘हाँ , बहुत अच्छी लगी | फिर क्या हुआ ?’

‘बहु बारिश गिरी | बादल खाली हो गया | बारिश नदी पर पड़ी और पर्बतों पर पड़ी | ज़मीन पर गिरी, पेड़ों पर पड़ी, पत्तों पर पड़ी |’

‘पेड़ भी भीग गए ?’

‘हाँ , एक पेड़ था | उसके पत्ते पीले पड़ गए थे | उसमें एक केसरिये रंगकी चींटी रहती थी |’

‘वह भी भीग गई ?’

‘हाँ , केसरी चींटी पीले पत्ते पर सो रही थी | हवा चली इसलिए पत्ता टूटने लगा , चींटीके पर भीग गए | वह उड़ न पाई | फिर वह रोने लगी |’

‘चींटी क्यों रोने लगी ?’

‘उसके पर भीग गए न बेटा , इसलिए वह उड़ न पाई तो रोने लगी |’

‘डेडी, फेरी पिंकके पर भीग गए थे | वह भी रो रही थी |’

‘यह चींटी भी फेरी पिंककी तरह रोने लगी | कहने लगी : मेरे पर भीग गए हैं, अब मैं उड़ नहीं पाउंगी |’

‘बच्चीने उसके पर पोंछ दिए ?’

‘नहीं | वहाँ एक मोटा मेंढक बैठा था | उसका गला हिलता था और आँखें बाहर निकल आई थी | चींटी के पर भीग गए न , तो वह हसने लगा |’

‘फिर ?’

‘फिर सूरज चमका | आसमान गर्म हो गया | नदी गर्म हो गई | पर्बत गर्म हो गए | ज़मीन गर्म हो गई इसलिए चींटीके पर भी सूख गए |’

‘चींटी उड़ गई ?’

‘धुप निकली तो चींटीके पर भी सूख गए | और मेंढककी आँखें धूपमें बंद हो गईं | चींटीके पर धूपमें झगमग होने लगे | फिर केसरी चींटी उड़ने लगी | हरा पंछी गाने लगा | चश्मेवाली बच्ची नाचने लगी ‘

‘कितना सुन्दर है, डेडी !’

‘फिर सामने एक मेघधनुष्य खुल गया |’

‘मेघधनुष्य मतलब ?’

‘बारिश पड़ती है और सूरज चमकता है तब आसमानमें सात हल्के रंगोंका एक पुल बन जाता है | ज़ू में है न वैसे जापानिज़ पुल जैसा |’

‘फिर ?’

‘केसरी चींटी उस मेघधनुष्यके रंगीन पुल पर जाकर खेलने लगी | हरा पंछी उस पुल पर होकर उड़ गया | वह रहता था उस तारे की ओर उड़ गया |’

‘और बच्ची, डेडी ?’

‘बच्ची भी सो गई ,बेटा | चलो, अब तुम भी सो जाओ |’

‘बच्ची कहाँ सो गई ?’

‘उसके डेडीके पास | कहानी ख़तम हो गई |’

‘चलो | अब सो जाओ – गुड नाईट |’

‘गुड नाईट , डेडी !’

रेशमी रिबन और हेरपिन्स उसने बच्चिकी छोटी बेगमें रखे. पेन्सिलसे होमवर्क की हुई किताब रख दी गई | केसरी चींटी भेघधनुष्य पर खेल रही थी | हरा पंछी उड़ गया था – तारोंके देश में | चश्मेवाली बच्ची चश्मा, रिबन और हेरपिन्स निकालकर डेडीको गुड नाइट कहकर सो गई थी | कहानी ख़तम हो गई थी |

बच्चीको सुबह की फ्लाईट से भेज देना था | वह अकेली जानेवाली थी | यहाँसे बैठकर जानेवाली थी नौ बजे | साड़े बारह बजे चेन्नई उतर जानेवाली थी | चेन्नई उसकी मम्मी उसे लेने आनेवाली थी |

उसका वेकेशन भी ख़तम होने आया था |

-और उसे डेडी के साथ रहने आनेकी कोर्ट की दी हुई मोहलत भी |

~ चन्द्रकान्त बक्षी (1932 – 2006)

Subscribe to ‘Rakhadta Bhatakta’

Processing…
Success! You're on the list.

कर्णलोक [1]

कर्णलोक, ध्रुव भट्ट

मैं चाहती हूँ कि गुजराती साहित्य की सबसे अच्छी, मेरी पसंदीदा कृतियाँ आप तक सब से पहले पहुंचाऊं। विदेश में गुजराती किताबों के अभाव से गुजराती साहित्य की अच्छी कहानियों का मेरा संपुट खत्म होता चला है और पिछले दो महिनों से कहानियों के अनुवाद कर अब मुझमें इतनी हिम्मत आई है कि, नवलिकाओं के अनुवाद करने की गुस्ताख़ी कर सकू। आनेवाले कई सप्ताहों तक इस कथा के प्रकरण धारावाहिक रूप में यहाँ प्रस्तुत होंगे।

 


‘मैंने उसे मारा है। डाली टूट गई तब तक धुलाई की।’  दुर्गा बोल रही थी। साहब शांति से उसे सुन रहे थे। ‘पहले उन लोगों ने गालियाँ दी। उस वक्त हम तो सिर्फ खड़े ही थे। कुछ कर नहीं रहे थे फिर भी।  फिर उन लोगों ने हमें मारना शुरू किया। इतनी छोटी करमी को भी उन लोगों ने …’ दुर्गा आगे बोल न पाई।

यह ही होना था। माधो और लक्ष्मी ने कितना भी सिखाया हो, फिर भी दुर्गा ने जो किया था वह ही वह बोलने वाली थी। इस जगत में कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जिन्हें दुनिया से छिपाने जैसा भी कुछ होता है उस बात की समझ नहीं होती। ऐसे विरल जनों को कहाँ, क्या बोलना चाहिए यह सिखाने का सामर्थ्य किसी में नहीं होता।

‘उन लोगों ने मतलब बेटा, किन किन लोगों ने?’ दुर्गा ने ‘उन लोग’ शब्द का इस्तेमाल किया इससे ज़रा आश्चर्यचकित साहब ने भावुक स्वर में पूछा।

‘यह नलिनी बहन ने।’ नलिनी बहन के सामने ही बिलकुल हिचकियाए बिना दुर्गा ने कहा। उसकी आँखों में ज़रा भी डर नहीं था।

‘उस औरत को आप ‘वे लोग’ कहते हैं ?’ साहब के मन में हुआ प्रश्न मेरे मन में भी जागा था।

‘वे लोग हमें भी ‘वे लोग’ ही कहते हैं। दुर्गा खुद को जो सहज, सरल लगा वह बोली।

साहब ने बहन के सामने देखा और ऊपर ऊपर से पूछा ‘आप आपस में ‘वे लोग’ बनकर रहने का वातावरण बदल नहीं सकते?’ इस तरह पूछे गए प्रश्नों के उत्तर दिए नहीं जाते।

दुर्गा ऐसे सीधा सीधा बोल देगी उसका अंदाज़ा शायद किसी को, स्वयं नलिनी बहन को भी नहीं था; तो फिर बेचारे माधो और लक्ष्मी को तो कहाँ से होगा? साहबों के सामने कचहरी में बुलाकर पूछा जाए तब झूठा बयान देना सिखाने के अपने हुनर पर माधो और लक्ष्मी को चाहे कितना ही भरोसा क्यों न हो; पर उस दिन उनकी शिक्षा काम नहीं आई। परिणामस्वरूप जो होना था वह ही हुआ। माधो ने लक्ष्मी की ओर देखकर मुँह बिगाड़ा। लक्ष्मी ने सिर पर हाथ पटका।

चोरी करती, धड़ाधड़ी सामने जवाब देती, कोई न कोई फ़साद मचाती रहती, चालाक और शैतान मानी जाती दुर्गा ने खरे समय पर, अंतिम घड़ी में लक्ष्मी-माधो का कहा, सिखाया सब बिसरकर जो हुआ था वह ही बोल दिया।

‘लड़की खुद तो सब कबूल कर रही है। अब क्या करना है वह आप बताईए।’ अधिकारी नलिनी बहन की ओर देखकर बोला।

‘गुनाह कर के कबूलने में उन लोगों को क्या शर्म?’ नलिनी बहन ने अपनी हल्की भूरी साड़ी का पल्लू खींचकर जवाब दिया। उन्होंने नेहा बहन की ओर भी देख लिया। नेहा बहन सफ़ेद सलवार कमीज़ में शांत और विचारमग्न बैठीं रहीं। नलिनी बहन की आँखें उन्होंने पढ़ी या नहीं यह समझ नहीं आ रहा था।

दुर्गा इन किसी की भी तरफ ध्यान दिए बिना अधिकारी की ओर देखती रही। नलिनी बहन की बात ने उसकी स्वच्छ चमकीली आँखों में अपार आश्चर्य भर दिया। इस पूरी बात में गुनाह क्या और कहाँ था यह दुर्गा की समझ में आ रहा हो ऐसा मालूम नहीं पड़ता था।

साहब शिकायत के फैसले की, सज़ा किस तरह हो सकती है इस मुद्दे की, और दूसरी बातें कर रहे थे उस वक्त दुर्गा तो अपना दिल साबुत रहे और आंसुओं का समंदर न बह जाए इस कोशिश में लगी हुई थी। ऐसा नहीं होता तो वह खुद ही जाँच-अधिकारी को सब कुछ समझाती।

वह कहती, ‘आप ही बताइए साहब, ताले में बंद करनेवला गुनाहगार ठहरता है या फिर बंदी को छुड़ाने वाला? बच्चों के लिए आई हुई खाने-पीने की, पहनने-ओढ़ने की चीज़ों को ताले-चाबी के पीछे छिपाए रखनेवाले, सब कुछ अपने घर ले जानेवाले गुनाहगार कहलाते हैं या फिर उसे छुड़ाकर बच्चों तक पहुंचाने वाले!’

उस उम्र में ऐसा भाषण शायद उसको नहीं आता फिर भी दुर्गा इतना तो ज़रूर कहती, ‘उस दिन हमने एक भी अमरुद तोड़ा नहीं था। तोड़ा हो तो भी उनके घर का तो नहीं तोड़ा था। बाग़ के पेड़ पर उगे अमरुद तोड़े इसलिए उन लोगों को किसी को मारने का तो हक़ नहीं।’ फिर भी उन्होंने हमें मारा, छड़ी से मारा, मेरी ज़ात पर गाली दी, फिर भी मैंने कुछ नहीं किया पर करमी को छड़ी लगाई…’

इसके बाद की सारी बात तो अधिकारी की टेबल पर टाइप की हुई पड़ी थी। उसमें नलिनी बहन ने जो लिखा था वह सब कुछ हुआ था।

दुर्गा दृढ़तापूर्वक मानती थी कि जो होना चाहिए था वही हुआ था। इतनी सीधी बात इतने बड़े और भले दिखते अधिकारी को न समझ आए ऐसा तो होनेवाला नहीं था; पर दुर्गा ऐसा कुछ कह न पाई। वह कह पाई होती तो भी ऐसी बातें समझ सके ऐसा कोई अधिकारी कहीं हो सकता था या नहीं यह यक्षप्रश्न से भी जटिल सवाल है।

आज समझ सकता हूँ कि उस बारह साल की लड़की को, खुद ने क्या गुनाह किया है यह समझने की ज़रुरत ही नहीं थी। अगर वह समझने का प्रयास करे भी तो उस घड़ी पर ही नहीं, जीवनभर उसको समझ नहीं आनेवाला था; क्यों कि उसका किया कोई भी कृत्या ‘गुनाह’ की उस बच्ची की अपनी समझ की परिभाषा में बैठता नहीं था।

वह छोटी, छः वर्ष की थी तब से रसोई-भंडार में घुसकर ताले-चाबी में पड़े बिस्किट, दूध के पाउडर या ढंके भोजन को मुक्त करने की कला उसने साध्य कर ली थी। अँधेरी रात में भी पीली दीवार कूदकर किसी भी तरीके से वह आम तोड़कर ला सकती थी; पर ऐसे बेजोड़ कौशल्य को गुनाह कहते हैं यह बात; उस कौशल्य दिखाने की सज़ा भुगतने के बावजूद वह कभी स्वीकार नहीं कर पाई थी।

उस दिन पूछताछ चल रही थी। बाहर गाँव से आए अधिकारी टेबल के पीछे कुर्सी पर बैठे थे। एक तरफ नेहा बहन, दूसरी तरफ भारी भरखम चेहरा धारण किये रखने के प्रयत्न में उलझी नलिनी बहन। पीछे दीवार के पास माधो। सामने हमेशा की तरह नए कपड़े पहनकर खड़ी लक्ष्मी।

नंदू दरवाज़े के बाहर आँगन में बैठा था। दुर्गा लाल रंग के फूलों वाला लंबी बांह का फ्रॉक पहनकर, गुरु द्रोण के पद्म में निडरता से प्रवेश किए हुए बाल अभिमन्यु की तरह, टेबल के सामने ही स्वस्थ खड़ी रहकर जवाब दे रही थी।

उस पीली दीवार से घिरे मकान के निवासिओं का थोड़ा-बहुत परिचय हुए मुझे तो अभी दस – पंद्रह दिन ही हुए थे। जिस रात उस पीली दीवार वाले मकान पर पहुँचना हुआ उस सुबह ही दुर्गा और नलिनी बहन के बीच जो हुआ वह मुझे बिलकुल नज़रों के सामने देखने मिला था।

उस सुबह के बाद के दो दिन उस जगह का रूटीन इन्स्पेक्शन था। इस इन्स्पेक्शन के दौरान ही नलिनी बहन ने लिखित शिकायत की थी।

नलिनी बहन ने कागज़ तैयार किये हैं यह बात माधो जानता था। थोड़े दिन तो वह कुछ बोला नहीं था। फिर एक बार ऐसे ही आया हो उस तरह दुकान पर आया था। स्टूल खींच कर पैर पर पैर चढ़ा कर बैठते बोला, ‘दुर्गा भले ही शरारती हो पर बेचारी भले दिल की है। चोरी करती है, सामने जवाब देती है पर तुम ही बताओ भानजे, ऐसा तो आजकल कौन नहीं करता!’

जवाब न मिले फिर भी माधो अपनी बात रोक दे ऐसा होनेवाला नहीं था। उसकी ओर थोड़ा भी ध्यान दिए बिना जो कर रहे हो वह करते रहो तो भी अपनी बात की उपेक्षा हो रही है वैसा वह मानने वाला नहीं, इसकी गारंटी कोई भी दे सकता था।

दांत बाहर दिखे वैसे माधो हंसा और आगे बोला, ‘भंडार से कितनी बार चीज़ें गई हैं। मैं जानू कि दुर्गा उठाती है; पर बड़ी बात न हो तो शिकायत नहीं करता। हम भी जानते हैं, और तुम ही कहो, इतनी सी लड़की की शिकायत थोड़े ही करेंगे?’

‘क्या शिकायत? कोई चोरी हुई है?’ ज़रा चौंक कर मैंने पूछा।

माधो क्या कह रहा है यह जब कोई समझता नहीं तब वह ज़रा चिढ़ जाता। उसे लगता था कि उसकी बात न समझने का ढोंग हो रहा है। उस वक्त उसके काले रुक्ष चेहरे पर कपटी हास्य चमकता।

माधो साशंक बोला, ‘तो लाला भाई, आप भी माधो को चक्कर में घुमाने की कोशिश में लग गए! शिकायत चोरी की नहीं तो और किस बात की हुई है। उस छुटकी सी लड़की ने बहन को जो मार लगाई है वह आपने नहीं देखा?’

ना कहा नहीं जा सकता था। जो नज़रों के सामने बना हो वह देखा न हो ऐसा तो कैसे हो सकता है। देखा ही था। तीन दिन पहले, यहाँ पहुँचते पहली सुबह को ही देखा था।

‘हम्म, तो अब चाय बना दे’ माधो ने कहा और बोला, ‘मारामारी की शिकायत बहन ने इन्स्पेक्शन वाले दिन ही ऊपर भेजी है। मैं कहुँ, दुर्गी जैसी जी हो पर दिल की बुरी नहीं। चोरी करेगी पर कोई पैसे वैसे की नहीं, चीज़ें लेकर बेचती हो ऐसा भी नहीं। बस, उसका मन बच्चों में लगा रहता है। बच्चे भूखे हुए नहीं कि दुर्गा छापा मारेगी। या तो दूध का पाउडर उठाएगी, या दूध चुरा जाएगी या कुछ खाने पीने का ले जाएगी। और कभी कुछ नहीं।’ बोलकर माधो फिर हंसा।

दुर्गा के विषय में माधो ने जो कहा उससे ज़्यादा मुझे कुछ पता भी नहीं था। जो आदमी कल-परसो आया हो और अंदर रहता भी न हो उसको ऐसा पूछना व्यर्थ है यह बात माधो समझने वाला नहीं था। मैंने कहा, ‘अंदर आप सब क्या करते हो उसकी इधर किसी को कुछ नहीं पड़ी।’

माधो बोला, ‘पड़ी क्यों नहीं, भाई? तुझे मिलने यहां मैं ऐंवे ही नहीं आया। कहना तो यह था कि मैं छोटा आदमी होकर इतना चला लेता हूँ तो बहन तो सबकी ऊपरी हैं। उन्होंने थोड़ा कुछ चला लिया होता तो इस इतनी सी लड़की की शिकायत ऊपर तक नहीं जाती और जांच पड़ताल न आती।’

पड़ताल आने वाली है यह सुन कर किसी को भी घबराहट होगी। ख़ास कर प्रसंग देखने वाले को तो चिंता करनी ही पड़ती है। माधो की बात पर बिलकुल ध्यान न देना तो अशक्य था। पूरी हकीकत जाननी तो पड़ी ही। शिकायत क्या है और उसकी जांच कब होने वाली है यह बात भी जानी।

अंत में माधो ने कहा था, ‘दुर्गा को किसी से पूछना चाहिए कि जांच में कैसे और क्या जवाब देते हैं। मैं जानता हूँ। लक्ष्मी भी जानती है कि क्या कहने के बाद कुछ परेशानी नहीं होती। दुर्गी जाने खुद राजकुमारी हो। किसी से पूछ कर जैसे छोटी हो जाएगी।’

दुर्गा। इतनी से लड़की को ज्ञान नहीं होगा कि उसे माधो और लक्ष्मी जैसे सलाहकारों की सलाह के मुताबिक़ चलना चाहिए। अगर हो भी तो शायद उसे वैसा करना पसंद न हो। माधो यह सब यहां दूकान पर आकर क्यों बोल रहा था यह समझ नहीं आ रहा था लेकिन मैंने कुछ कहा नहीं।

माधो ने अपनी बात शुरू रखी, ‘वह पूछे या न पूछे। बुज़ुर्ग होने के नाते हमारा भी तो कुछ फ़र्ज़ तो है न! हम कहकर भेजे वह बोलती तो वे लोग कितनी भी कोशिश करें तो भी कुछ होता नहीं।’

जवाब देने की कला आप जानते हों और दुर्गा का भला चाहते हो तो आप ही उसे कहिए न! मन में आई बात टाल कर मैंने कहा, ‘दुर्गा तो रात दिन आप के साथ रहती है तो फिर सिखाइए न!’

माधो बोला, ‘हम से सीधा बोला जाता तो तुम तक आते ही नहीं। मैं बिलकुल खरे हृदय से कहूँ तो भी मेरी कोई बात दुर्गा मानने वाली नहीं। लक्ष्मी पर तो उसको बिलकुल भरोसा नहीं। एक नंदू की सुनती है; पर नंदू इन मामलों में पड़ता नहीं। पड़ता है तो उलटा बकता है। तुम बाहर के हो। तुम बोलोगे तो शायद उसे भरोसा होगा।’

थोड़ा रूक कर माधो ने कहा, ‘बच्चू, जांच में जवाब तो तुमको भी देना पड़ेगा। तुम वहीँ हाज़िर थे यह भी अर्ज़ी में लिखा है। साक्षी में तुमको बुलाकर ही छोड़ेंगे। तुम दुर्गा से मिल लो उसमें ही भलाई है।’

मुझे भी फंसना है तो अब काम रोक कर भी कुछ सोचना पड़े वैसी नौबत आ गई थी। मैं वैसे दुर्गा को एका – दो बार ही मिला था। उस रात ट्रेन में साथ थी पर कुछ लंबी बात तो हुई नहीं थी। अरे, एक दुसरे से ख़ास कोई पहचान भी नहीं बनाई थी।

दुसरे दिन सुबह बाग़ में नलिनी बहन के साथ उसका जो हुआ वह देखा और आखिर में कल ही वह यहाँ, इस दुकान पर नंदू की बात पूछने आई थी उतना ही, इससे अधिक दुर्गा के साथ मेरा कोई परिचय नहीं। दुर्गा को समझाना तो दूर की बात है, थोड़ी सी सिफारिश करते भी मुझसे बने इस विषय में मेरी बिलकुल श्रद्धा नहीं थी।

फिर भी पिछले दो-चार दिन नंदू ने दुर्गा के विषय में की बातें, दुर्गा का परिचय करने की सुषुप्त इच्छा, उस समय माधो की की हुई बात या फिर साक्षी के तौर पर कुछ कहना पड़ेगा इस बात का भय, न जाने किस कारण से प्रेरित होकर मैंने दुर्गा से साथ बात करने का कबूल किया था। कहा था, ‘दुर्गा को मिलूंगा तब उसको आप की बात माननी चाहिए ऐसा कह कर देखूंगा। और साक्षी होना पड़ेगा तो कह दूंगा कि मुझे कुछ पता ही नहीं। उस वक्त मैं बहुत दूर खड़ा था।’

‘बस, यही जवाब देते रहना। मैंने देखा ही नहीं वही कहते रहहना। और कुछ बोलना ही मत।’ माधो कह कर गया।

कुछ मुश्किलें ऐसी होतीं हैं जिसका निवारण ढूंढने में उलझो और वे अपने आप आसानी से सुलझ जातीं हैं। उस सूबह बात करके माधो गया फिर पूरा दिन, वह और लक्ष्मी जैसा कहे वैसा बयान देने की बात दुर्गा को कैसे कही जाए उस उलझन में कटा। सामने से दुर्गा को मिलने जाना चाहिए या वह नंदू के वहाँ आई हो तब कहना चाहिए यह निश्चय नहीं हो पा रहा था। उतने में शाम को शाला से वापिस आती हुई दुर्गा दिखी।

‘एक मिनिट, ज़रा रुको तो।’

वह निःसंकोच खड़ी रही। मैं नज़दीक पहुंचा तब थोड़ा हंसी।

अचानक ही क्या कहना था वह मैं भूल गया। लगभग समान उम्र की लड़की को ऐसे रास्ता रोककर खड़े रखने उसके सामने मूर्खता से मौन खड़ा रहना भी मेरे लिए शर्मनाक हो गया। अरे बाप रे! मन में आयोजित किए शब्द जैसे हवा में पिघल गए।

दुर्गा ज़ोर से हंस पड़ी। દુર્ગા જોરથી હસી પડી.

सुना तो था कि ऐसा हो तब धरती रास्ता देती हो तो उसमें समा जाना चाहिए या फिर चुल्लू भर पानी में डूब मरना चाहिए; पर ऐसा कुछ करना पड़े उससे पहले तो वापिस हिम्मत आई। जो दिमाग में आया वह ही बोल दिया, ‘सुन, तेरी पड़ताल होने वाली है।’

बिलकुल अनाड़ी वाक्य। और कहने का तरीका तो उससे भी ज़्यादा अनाड़ी। लगा कि दुर्गा फिर से हंस देगी। मज़ाक ही बनेगा; पर ऐसा कुछ नहीं हुआ।

किताबें छाती से लगाकर दुर्गा सीधी खड़ी हो कर आगे क्या बोला जाता है वह सुनने को तैयार खड़ी रही। मैंने आगे कहा, ‘उस दिन … उस दिन जो बाग़ में हुआ उसकी फ़रियाद बहन ने की है। जांच होने वाली है। माधो कह रहा था कि जांच पड़ताल में कैसे जवाब दिया जाता है यह माधो और लक्ष्मी को आता है। वे दोनों सिखाएंगे।’ ठीक बोला जा रहा है या नहीं यह सोचने के लिए मुझे रुकना पड़ा।

Subscribe to ‘Rakhadta Bhatakta’

Processing…
Success! You're on the list.

कर्णलोक [2]

कर्णलोक, ध्रुव भट्ट

‘ तू माधो का वकील कब से बनने लगा?’

‘मैंने … मुझे तो …’ अब क्या जवाब दिया जाए?

‘जांच की बात से घबराने के बदले दुर्गा दूसरी ही बात पर चढ़ गई। उसका हसना तो कब का थम चुका था। वह और कुछ कहने जा रही थी; पर फिर रुक गई। थोड़ी देर ऐसे ही सामने देखती हुई खड़ी रही। फिर कौन जाने किस पर दया खा रही हो वैसी शक्ल करके बोली, ‘लक्ष्मी-माधो क्या ख़ाक सिखाएंगे? ऐसी बातों में उलझने के बदले दूकान पर बैठकर साइकलें बराबर रिपेर करते रहो तो भला होगा तुम्हारा।’

और कुछ भी बोले बग़ैर वह चली गई। दूसरे दिन वह जाली के पास खड़ी माधो के साथ कुछ बात कर रही थी जो मैंने देखा। उनकी बातें सुनी जा सके उससे ज़्यादा अंतर था। मैंने माना कि माधो उसे पाठ पढ़ा रहा था।

उसके बाद के हफ़्ते जांच अधिकारी आ गए। नेहा बहन भी आई थी। सबको बुलाया गया। आख़िर में दुर्गा को बुलाया। अधिकारी ने आकर पहले तो दुर्गा को प्रेम से पास बुलाया। फिर बहन की फ़रियाद पढ़कर सुनाई। फिर पीठ थपथपाते हुए पूछा ‘बहन ने यह लिखकर भेजा है। अब तुम कहोगी वह भी सुनूंगा। बोल बेटी, उस दिन क्या हुआ था?’

बस। अधिकारी बोल लें इतनी ही देर थी और दुर्गा ने बता दिया ‘मैंने नलिनी बहन को मारा है। सबके सामने मारा। डाली टूट गई तब तक पीटा। पहले उन लोगों ने हमें…’

दुर्गा स्थिर खड़ी थी। अब क्या हो सकता था उस बारे में सब कुछ न कुछ दलीलें कर रहे थे उसका एक शब्द भी दुर्गा के कान पड़ने वाला नहीं था। अचानक उसने अधिकारी को पूछा ‘अब मैं जाऊँ?’ और छुट्टी मिलने का इंतज़ार किये बिना वह दौड़ गई।

बहन, नेहा बहन, साहब सब अभी बातों में लगे थे। हमने, बाकी के सब ने विदा ली। नंदू दरवाज़े पर बैठा था वह खड़ा होकर हमारे साथ चला। बाहर कम्पाउंड में पहुँचते ही मेरे मुँह से निकल गया ‘सही हुआ।’

‘नंदू ने रूककर मेरे सामने देखा और बोला ‘क्या सही हुआ भाई? ग़लत ही तो हुआ है। पहले उसने हज़ारों बार रोककर रखा था वह आज होकर रहा। मेरी माँ जननी हमेशा छुपाना चाहती थी उन औंसुओं को लाख कोशिश कर भी छिपा नहीं सकी। तुमने देखा नहीं?’

देखा था। अच्छी तरह देखा था। करमी का नाम आते ही जैसे अनजान गुफ़ा से सरकते झरने की तरह खारा पानी आँखों की कोर पर आकर रुका था। ज़्यादा देर वहाँ रुकना पड़ा होता तो बहकर गाल पर फैल जाता।

दूसरे दिन लक्ष्मी और माधो दोनों ख़रीददारी के लिए निकले तब मेरी दुकान पर आकर बैठे। ग्राहक की साइकल का काम ख़तम करके मैंने ऑफ़िस में भेजने के लिए चाय बना ली थी। उन दोनों को भी चाय पिलाई। हाथ में कप लेते हुई लक्ष्मी माधो को कह रही हो उस तरीके से बोली ‘बहन ने बेवजह बवाल किया। इसका परिणाम क्या? कुछ नहीं। मुल्ला की दौड़ मस्जिद तक।

माधो गंभीर होकर बोला ‘वह तो बहन खुद कह रही थीं कि बेवजह शिकायत हो गई। अब लगता है कि भूल गई होती तो अच्छा होता।’

‘वह सब तो ठीक यह दुर्गी भी अलग ही है। मुझे लगा था की इतनी सी लड़की रो देगी और विनती करेगी; पर माफ़ी का तो वह एक शब्द भी न बोली।

लक्ष्मी ने हवा में उड़ती साड़ी पकड़कर अपने मोटे शरीर पर ठीक से लपेटते हुए कहा था ‘दुर्गा रोएगी? उस दिन भी तुमने देखा नहीं कि आँखों में आँसू आए ही थे कि उतने में ‘मैं चलती हूँ’ कहकर जवाब सुनने के लिए भी रुकी नहीं। सीधे दौड़ी।’

लक्ष्मी कहती थी, ‘कितना भी गुस्सा क्यों न हो फिर भी दुर्गा को डांटने का जी नहीं करता। वह कितनी भी शरारत कर ले पर मैं जानती हूँ कि दुर्गा औरों के लिए खुद सहनेवालों में से है।’

लक्ष्मी और माधो को बच्चों को दुत्कारते सब ने देखा है। वैसे भी वे दोनों ढीट माने जाते थे; फिर भी किसी न किसी अवसर पर उनकी भावना बहती निकलते देखी है। इंसान अपनी इच्छा से हमेशा किसी का बुरा नहीं कर सकता। बुराई के अगोचर में से ही भलाई का झरना कभी न कभी अचानक कलकल करता बह ही जाता है।

एक बार माधो से भी सुना था ‘वह तो बहन को लगता था कि इस शिकायत के बहाने बच्चे काबू में नहीं रहते यह कहकर यहां से तबादला करा लिया जा सके इसलिए यह सब तमाशा किया था।

लक्ष्मी की बातों से ही जाना था। इतनी छोटी उम्र की लड़की को कोई सज़ा नहीं की जा सकती। कायदे से देखा जाए तो बाहर के अधिकारी उसे डांट भी नहीं सकते थे। हाँ, नलिनी बहन खुद उसे डांटे या फटकारे या लक्ष्मी उसे धमकाए तो उन्हें कोई क्या कर सकता है?

सारी जफ़ाओं के बाद यह तय हुआ कि बहन को नहीं, दुर्गा को ही कहीं और भेज दिया जाए। ऐसे आश्रम हर जगह तो होंगे नहीं इसलिए पालीताणा नारीसंरक्षण गृह में भेज देने का प्रस्ताव रखा गया।

दुर्गा मेरे लिए तो बिलकुल अनजान थी। फिर भी वह चली जाएगी यह बात नंदू को बताने के लिए मैं दौड़कर गया था। इन लोगों ने दुर्गा को निकाल बाहर करने का फैसला लिया है यह भी कहा था। ‘उसने उस दिन भली बनकर सब कुछ क़ुबूल कर लेने की क्या ज़रूररत थी? माधो ने सिखाया तो था, फिर भी हो गयी न देशनिकाल!’

नंदू ऐसे वक़्त में सोच में पड़ जाता। थोड़े पल कहनेवाले की ओर देखकर उसकी सच्चाई की कसौटी कर रहा हो ऐसा महसूस होता था।

थोड़ी देर के बाद अपनी जनेऊ से खेलते हुए धीरे से पर स्पष्ट आवाज़ में नंदू ने कहा, ‘जो सच था वह ही दुर्गा ने कहा, भाई, उसे जाने बिना तुम कुछ भी सोचोगे तो यह अच्छा नहीं होगा। और कुछ वक़्त यहां रहोगे तब उसे समझ पाओगे।’

माधो और लक्ष्मी की बात पर नंदू थोड़ा हँसा। फिर कहा ‘एक और बात समझ ले मुन्ना, आलतू फ़ालतू लोगों का सिखाया दुर्गाई कभी भी नहीं बोलनेवाली। वह कौन है यह जानोगे तब समझ में आएगा। वह किसी की सिखाई बातें भला क्यों बोलेगी? पालीताणा जाना पड़े या और कहीं। उसे क्या फर्क पड़ेगा! हाँ, इन बच्चों को और मुझे फर्क पड़ेगा।’ नंदू थोड़ी देर रुका। गहरी सांस लेकर आगे बोला, ‘तुम्हें पड़ेगा या नहीं यह अभी से जान नहीं सकता।’

 

Subscribe to ‘Rakhadta Bhatakta’

Processing…
Success! You're on the list.

कर्णलोक [3]

कर्णलोक, ध्रुव भट्ट

मामा के घर को त्याग करने के मेरे निर्णय को मैंने भाग जाने के निर्णय के तौर पर कभी नहीं स्वीकार किया। बारह-तेरह साल की उम्र में भी मैंने समझा था कि इसे तो मेरा महाभिनिष्क्रमण कहा जा सकता है।

घर छोड़ते समय मैं जो अनुभूति कर रहा था उसमें हीनता की भावना कहीं भी नहीं थी। ऐसा न होता तो दोपहर को ट्रेन पर चढ़ जाने के अलावा मैंने कुछ किया न होता, पर स्टेशन में दाख़िल होने से पहले मैंने टिकट खरीदी थी मुंबई की। मुंबई जाना नहीं था। कहाँ जाऊँगा वह पता नहीं था। मामा स्टेशन पर जांच करें तो मैं मुंबई गया हूँ यह मान लें इतना काफी था।

रास्ते में जहाँ चाहूँ वहीं उतर जाना था। कहाँ यह तय नहीं किया था। शाम को बारिश शुरू हुई। बीच के किसी स्टेशन से दो आदमी, एक औरत और एक लड़की गाड़ी में चढ़े थे।

औरत पतली, थोड़ी श्याम, सुन्दर और सौम्य पर दृढ़ मुखवाली और एक पुरुष मज़बूत शरीरवाला, जिसके विद्वान होने का आभास होता था, खादी के कुर्ते-पाजामे में। दूसरा ज़रा वृद्धत्त्व की ओर ढलता, धोती और ऊपर सिर्फ बंडी पहना हुआ।

साथ में एक किशोरी थी जिसे पलभर देखते रहने का मन करे वैसी। उसने आते ही मानो पूरा डिब्बा रोक लिया हो वैसे बेंच पर थैलियाँ रखनी शुरू कर दी। सब सामने की सीट पर बैठने लगे। थोड़ा सामान सीट के टेल रखकर लड़की फिर से ऊपर के छज्जे पर जा बैठी। एक थैला सर पर रखकर वहाँ लेटकर कोई पत्रिका पढ़ने में व्यस्त हुई। गाड़ी चली, न चली और फिर से वह नीचे उतारकर दूर जाते स्टेशन को आवाज़ें देती रही।

उन लोगों के साथ जो स्त्री थी वह अपनी बेंच से उठकर मेरे पास आकर बैठी। पूछा ‘तुम्हारा नाम क्या है बेटे? अकेले ही हो?’

जवाब में क्या कहना था यह जल्दी सोचा न गया। पल भर सुना अनसुना कर कुछ बोले बग़ैर खिड़की से बाहर देखता रहा। उस धोती-बंडी वाले ने भी मुझे ध्यान से देखा।

मुझे ज़्यादा सताये बिना वह स्त्री उस बंडी वाले की ओर देखकर बोली ‘नंदू, खाने का डिब्बा निकाल ले भाई।’

डिब्बा खुलते ही थेपले और अचार की खुश्बू फैल गई। खिड़की पर आकर बैठी। बैठी हुई लड़की ने तुरंत खड़े होकर छज्जे पर से एक थैली में से थोड़े अख़बार बाहर निकालकर नीचे देते हुए कहा ‘लीजिये निम-बहन।’

निमु बहन ने अखबार के टुकड़े कर हर एक में थेपला और अचार रखे। एक भाग ऊपर देते हुये कहा ‘दुर्गा, ले। और तुम्हारी थैली में भाईजी का नाश्ता होगा, वह दे।’

दुर्गा अपनी थैली में ढूंढने लगी। उसमें से भाखरी और मेथी की सब्ज़ी निकाली और नीचे आकर उस खादीधारी को देते हुए कहा ‘लीजिए भाईजी, आपका फीका।’ फिर कोई फल दिखाते हुए बोली ‘चाहिए?’

दुर्गा के चेहरे का घाट, उजला चेहरा, बड़ी आँखें सभी कुछ उसे उसके साथिओं से अलग करते थे। उसके लक्षण भी उसके धीर-गंभीर दिखते साथिओं में किसी से मिलते नहीं थे। शायद उन लोगों के किसी मित्र की या कुटुम्बीजन की लड़की होगी ऐसा मैंने अनुमान लगाया।

ये लोग शान्ति से खा सकें इस लिए मैं दूसरी तरफ जाने के लिए उठा तो निमु बहन ने स्नेहपूर्वक रोकते हुए कहा ‘बैठो न बेटे। चलो हमारे साथ थोड़ा खा लो।’ फिर नाश्ता हाथ में देते हुए कहा ‘ले भाई। ये लो तुम्हारा भाग। और चाहिए तो डिब्बे से ले लेना।’

थोड़ा खंचित हो कर मैंने थेपले लिए और खाने लगा।

सामने बैठी दुर्गा मुझे देखती रही। फिर बोली ‘अचार पसंद है?’ जवाब की राह देखे बिना उसने परोस भी दिया।

मैंने सोचा कि वह थोड़ी देर और बोलती रही होती तो अच्छा होता। पर वह तो खिड़की से बाहर अंधेरे में दूर के गाँवों में जलते दीये देखते देखते खा रही थी। मैं उसकी ओर देखता रहा। अचानक मैं उसे देख रहा हूँ यह अंदाज़ा दुर्गा को लग गया। थोड़ा भी संकोच किये बिना उसने जो सोचा वह ही कहा ‘खाने पर ध्यान दो।’ फिर स्वाभाविक तरीके से फिर से बाहर देखती रही।

पेट में ठंडक हुई इसलिए बैठे ही बैठे कब नींद आ गई पता न चला। आधी रात में एक बड़े स्टेशन पर नंदू ने जगाया। ‘उतरना है?’

निमु बहन और भाईजी कहीं दिखे नहीं। ये लोग कौन हैं यह भी मुझे पता नहीं था। थोड़ी मुश्किल सी हो गई। नंदू को ना कहूँ तो शायद मुझे आगे कहाँ जाना है वह बताना पड़े उससे अच्छा उसके साथ उतारकर फिर किसी बहाने चले जाना सहल लगा।

गाड़ी से उतरते उतर तो गया; पर फिर तुरंत याद आया कि दरवाज़े पर टिकट मांगेंगे। मेरी टिकट मुंबई की थी इसलिए शायद कोई पूछताछ होगी।

थोड़ी घबराहट में जेब में हाथ डाला तो टिकट ग़ुम। जिस जेब में देख रहा था उसी में टिकट रखी थी इतना मुझे विश्वास था, फिर भी दूसरी जेब की भी जांच की। टिकट वहाँ भी नहीं थी। 

थैली में तो मैंने रखी ही नहीं थी फिर भी थैली में देखने के लिए मैं नीचे बैठा और दुर्गा बोली ‘सामने देखो तो सही, दरवाज़े पर कोई नहीं।’

ऊपर देखा तो लोग दरवाज़े से बेरोकटोक आ-जा रहे थे। मैं इतनी उलझन में था कि टिकट ढूंढ रहा था इसकी खबर दुर्गा को कैसे लगी यह ख़याल मुझे नहीं आया था। बाहर निकलते मुझे आभास हुआ कि दुर्गा किसी रहस्यमय तरीके से हंस रही थी।

बाहर हलकी हलकी बारिश हो रही थी। थोड़ा पानी भी भर आया था। नंदू ने दुर्गा से कहा ‘तुझे नेहा बहन के वहाँ छोड़ आता हूँ। बारिश हो रही है और साइकल पर तीन लोग बैठ नहीं पाएंगे।’

‘ठीक है पर सुबह स्कूल का क्या?’ दुर्गा बोली।

भागने का मौका देखकर मैंने कहा ‘तो आप लोग चले जाइए। मैं अपना देख लूंगा।’

‘नहीं नहीं, तुम साइकल से चलो आराम से। दुर्गाई को मैं सवेरे सवेरे ले जाऊँगा।’ नंदू ने कहा। उससे पीछा छुड़ाना मुश्किल था। उन लोगों के साथ चलने के अलावा मैं कुछ कर न सका।

थोड़ा आगे जाकर एक मकान के पास हम रुके। घंटी बजाकर घर के मालिक को जगाया। एक प्रभावशाली युवती ने दरवाज़ा खोला और बोली ‘आईए। निमु बहन और भाईजी नहीं आए?’

वे लोग आगे आश्रम के रास्ते पर उतर गए। रात स्टेशन पर बिताकर सुबह की बस से आश्रम तक पहुँच जाएंगे।’ नंदू ने कहा और अंदर आते बोला ‘इस दुर्गा को रात यहीं छोड़कर जा रहा हूँ। सवेरे जल्दी आते-जाते किसी के साथ भेज दीजिएगा। वरना लेने आ जाता हूँ।’

‘ठीक है, मैं ही छोड़ दूँगी। और क्यों न आप सब भी रुक जाइए। सुबह चले जाना।’ उस युवती ने कहा। उसने मेरी पहचान न पूछी इसलिए मेरी एक मुश्किल तो काम हुई।

‘नहीं नेहा बहन, एक बार वहाँ पहुँच जाने के बाद ही थोड़ा आराम मिलेगा।’ नंदू ने कहा और मेरी ओर देखकर बोला ‘चलो।’

बारह-तरह वर्ष की उम्र में गृहत्याग करके निकले किशोर की होती है वैसी मूढ़ स्थिति मेरी भी थी। पकड़ा गया तो वापिस जाना असह्य हो जाएगा। किसी अनजान टोली में फंसने का भय सताता था। पिछली रात निमु बहन, दुर्गा, नंदू और अब नेहा बहन के बर्ताव से एकाधी रात नंदू के वहाँ बिताने में मुझे कुछ भय जैसा तो नहीं लगा था। उलटी थोड़ी आत्मीयता और राहत ही महसूस हुई थी।

मैंने कहा ‘हाँ। चलो।’

उस रात नंदू मुझे अपनी साइकल पर बिठाकर शहर से दूर ले गया। खेतों के बीच अंधेरे रास्ते पर आधा-एक घंटा चलने के बाद उसने साइकल एक बड़े दरवाज़े में मोड़ ली और दीवार के पास बंधी तीन खोलियों में से आखिरी खोली के पास मुझे उतारकर ताला खोलने लगा।

घर में प्रवेश कर मुझे एक कोरी धोती हाथ में थमाकर अपना शरीर गमछे से पोछते नंदू ने मुझे कहा था ‘घर से भागे हुए लड़के को तो पुलिस बुलाकर वापिस घर भेजना चाहिए। मुझे भी वैसे ही करना चाहिए था। पर तेरी शकल देखकर लगता है कि तुझे भागना पड़ा न होता तो तू भागा न होता। ज़रूर कोई वजह होनी चाहिए वर्ण कोई घर क्यों छोड़ता है भला? यह तेरा चेहरा ही कहता है कि तू वैसा नहीं है।’

यह सुनते ही मैं हक्काबक्का रह गया। मैं घर से निकल आया हूँ यह बात इस आदमी ने कैसे जानी यह मुझे समझ में नहीं आया। मैं ज़रा रुका और बोल दिया ‘मैं घर से भागा नहीं। मेरा घर ही नहीं।’

‘भागा नहीं? वाह! भागे बिना रेलवे के डिब्बे में बेंच पर बैठने पहुँच गए!’ कोने से अंगीठी खींचता नंदू मुझे देखकर हंसा, ‘तुम्हे और भी बहुत कुछ कहना होगा, पर अभी यह नंदू कुछ सुननेवाला नहीं। रहते रहते सब पता चल ही जाएगा। अभी तो मेरे मन में सुबह के काम की पीड़ा है। थोड़ी बहुत रात रह गई है उसमें नींद करनी है। ‘ कहकर उसने पानी पिया और मुझे पानी थमाते हुए बोला ‘तुम्हे भूख लगी हो तो डिब्बे में बिस्कुट पड़े होंगे।’

‘गाडी में निम बहन और आप लोगों ने मुझे खाना दिया था।’ मैंने कहा। 

‘देंगे ही तो। निम बहन तो बिलकुल देंगीं। वह नहीं भी होतीं तो भी तुझे कोई भी देता। तेरा ऐसा रंग और शक्ल देखकर तुझे दिए बिना और भी कोई रह पाएगा ?’ नंदू जल्दी में बोला। 

मैं उसका कमरा देखता रहा। इतनी देर में नंदू ने घर के पिछवाड़े में हाथ धोये और पोछते पोछते फिर कहने लगा ‘तेरी यह राजकुमार जैसी शक्ल-सूरत देखकर ही निमु बहन ने मुझे कहा था कि, तुम्हें – नए नए भगौड़े को इधर ले आऊं। मुझे भी समझ में आ गया था कि तुझे यहीं लाना पड़ेगा। वरना कौन जाने किस के हाथ लग गए होते।  सब आरासुरवाली माता का ही किया होना चाहिए। मान लो कि तुम कवच-कुंडल लेकर जन्मे होंगे। वरना तू बैठा हो उसी डिब्बे पर निमु बहन चढ़ेंगी ही क्यों!’

नंदू थोड़ा आवेश में था। खटिया लगाते वह फिर बड़बड़ाने लगा ‘अब अंगीठी जला, बारिश में भीगे हैं तो खोली गरम रखनी पड़ेगी। बीमार पड़ेंगे तो मुश्किल हो जाएगी। फिर परसो तो इन्स्पेक्शन आनेवाला है। कई इंतज़ाम करने पड़ेंगे। दुर्गा को चुप रहने के लिए समझाना पड़ेगा या फिर कहीं बाहर भेजना पड़ेगा। वह कोई मेरे-तुम्हारे जैसी इंसान थोड़ी है। वह जगज्जननी तो अपनी इच्छा से आई है इस पीले मकान में। उसे किस बात का डर!’

बात करते करते अचानक रुककर नंदू ने फिर कहा ‘अंगीठी लगा ले और तू अपना बिस्तर बना ले। मुझे अभी ध्यान-पूजा भी करने भी बाकी हैं। सोने से पहले कर लूँगा तो शांति मिलेगी। 

मैं देखता रहा। पनियार, डिब्बे-डिब्बियाँ – पुरुष के हाथों बसाया हुआ घर। इस खोली में कोई स्त्री शायद कभी नहीं रही होगी। दुर्गा नंदू के साथ तो नहीं रहती होगी? कुछ समझ नहीं आ रहा था। 

नंदू की पूजा हो गई। हम दोनों एक भी शब्द बोले बिना सो गए। मेरी चटाई ज़मीन पर और नंदू खटिया पर सोया। 

इन्स्पेक्शन है। दुर्गा को समझाना पड़ेगा। यह कुछ मुझे स्पष्ट समझ नहीं आ रहा था। नंदू ने तो ‘तेरी बात नहीं सुननी’ ऐसा कह ही दिया था। फिर ऐसी सब यहाँ की बातों में पड़ने का ख़याल तब नहीं आया था। कहाँ आ फँसा हूँ यह जानने जितना होश भी मुझे नहीं था। नंदू की बातें मुझे अधेड़ उम्र पार करने के छोर पर खड़े अकेले आदमी की बड़बड़ाहट से विशेष और कुछ नहीं लगती थी। एक लड़की को जगजननी कह दे यह क्या बात हुई!

हमारी आँख लगी न लगी कि दरवाज़े पर कोई आया और भारी आवाज़ में बोला ‘नंदू महाराज, आ गए क्या? बहन ने पुछवाया है क्या आपने दुर्गा के साथ बात कर ली?’

‘नहीं की। कल कर लूंगा।’ नंदू ने सोते सोते ही जवाब दिया।  

फिर बड़बड़ाते बोला ‘मुझे जो कहते हो वह बात खुद क्यों नहीं कर लेते? कोई गलती-गुनाह जताना हो तब तो सब खुद ही उसे कहने लगते हो। अब उसकी ज़रूरर आन पड़ी तब नंदू हाथ याद आता है?

यह सब सुनकर मेरी मुश्किल बढ़ी। यहाँ किस बात का इन्स्पेक्शन हो रहा होगा? शायद पुलिस आनेवाली होगी उस ख़याल से डर लगा। इस सुनसान एकांत माहौल में मन ही मन रोना आ रहा था। ट्रेन और स्टेशन का भरा-पूरा कोलाहलमय संसार छोड़कर नंदू के साथ आने को तैयार हो गया उसका पछतावा भी शायद हुआ होगा। याद नहीं। जाने किसी रहस्यमय जगह में कैद हो गया हूँ ऐसा महसूस हो रहा था। 

नींद से भी चौंककर जग जाता था। इसलिए सुबह उठने में देर हुई। पूजा के झरोखे में पड़े ताज़े फूल देखकर समझ गया कि नंदू नहाकर और पूजा करके बाहर निकल गया है। 

रात वह दुर्गा जल्दी आ जायेगी यह बात की थी, वह आ गई हो ऐसे कोई निशान नहीं थे। शायद नंदू उसे लेने गया हो। घर खाली था। 

मैंने कमरे का दरवाज़ा खोला और बाहर आया। चारों ओर से कम्पाउंड वॉल से घिरी जगह के बीच सुन्दर पुराने सरकारी मकान जैसा पीला मकान। अस्पतालों या स्कूलों में होता है वैसे ही आगे के भाग में दो कमरों के बीच से पीछे के आँगन में जा सकें वैसी रचना थी। आँगन में जाने का रास्ता जाली-बंद था। आँगन में कुछ बच्चे और एक स्त्री किसी काम में लगे हों ऐसा आभास होता था। उस जाली-बंद चौक के दोनों ओर कमरे हों ऐसा मालुम पड़ता था। जाली से बाहर दाहिने तरफ के कमरे पर बॉर्ड लगा था। ‘ऑफ़िस’।

बाईं तरफ़ थोड़े दूर छोटा सा बगीचा था। बगीचे में में बच्चों के लिए झूले, फिसल पट्टी जैसे साधन लगाए हुए थे। आसपास अमरुद, नींबू, सीताफल, अनार और थोड़े फूलों के पेड़ थे। बगीचे के पीछे चार-पांच घर दिख रहे थे। 

दाहिनी ओर बड़ा दरवाज़ा था जिससे कल रात हमने कम्पाउंड में प्रवेश किया था। अंदर की जगह सुन्दर थी। कल रात लगा भय पिघल जाए ऐसी। बाहर क्या है यह देखने दरवाज़े की ओर गया।  

दरवाज़े से निकलते ही आसपास न तो कोई मकान थे न दुकानें। दरवाज़े से थोड़ी दूर पक्की सड़क थी। सड़क के नीचे नाले से होकर छोटा सा झरना बहता था। उसके पार दूर दूर तक खेत, उसमें छोटे झोंपड़े और क्षितिज पर शहर की सोसाइटियाँ दिखाई पड़ती थीं। 

रास्ते पर ज़्यादा वाहन नहीं थे। एक-दो गाड़ियाँ या दूधवाले की मोटरसाइकल, शहर की ओर काम पर जाते हुए ग्रामजनों की साइकलों के अलावा कोई आता-जाता दिखा नहीं। उस ज़माने में आज जैसे और इतने सारे वाहन थे भी कहाँ!

फिर वापस अंदर जाने के लिए मुड़ा कि मेरी नज़र पीले मकान के आसपास लंबी चुनी हुई ऊंची दीवार पर पड़ी। सड़क के उस पार से आता प्रवाह आगे जाकर उस दीवार से घिसता चला जा रहा था। इतने बड़े कम्पाउंड में सिर्फ इतने ही मकान!

यह नंदू कहाँ रहकर क्या काम करता था यह मुझे समझ नहीं आ रहा था। अंदर  नज़दीक से देख लेने के विचार से वापिस दरवाज़े की और मुड़ा तब मेरी नज़र दरवाज़े पर लम्बी चौड़ी कमान खींचकर लिखे अक्षरों पर पड़ी। 

पांच साल की उम्र से ही सात पीढ़ी के पूर्वजों के नाम बोलना सीखा हुआ, रोज़ उनका नाम लेकर मन ही मन प्रणाम करनेवाला, गौरवशाली पिता और रुआबदार माँ की संतान मैं, मुझे कभी भी न आना हो ऐसी जगह आकर खड़ा था। जिन शब्दों से दूर भागने निकला था वह ही शब्द मेरे सामने भड़कीले लाल रंग में चमक रहा था। ….. बालाश्रम।

Subscribe to ‘Rakhadta Bhatakta’

Processing…
Success! You're on the list.