कर्णलोक [2]

कर्णलोक, ध्रुव भट्ट

‘ तू माधो का वकील कब से बनने लगा?’

‘मैंने … मुझे तो …’ अब क्या जवाब दिया जाए?

‘जांच की बात से घबराने के बदले दुर्गा दूसरी ही बात पर चढ़ गई। उसका हसना तो कब का थम चुका था। वह और कुछ कहने जा रही थी; पर फिर रुक गई। थोड़ी देर ऐसे ही सामने देखती हुई खड़ी रही। फिर कौन जाने किस पर दया खा रही हो वैसी शक्ल करके बोली, ‘लक्ष्मी-माधो क्या ख़ाक सिखाएंगे? ऐसी बातों में उलझने के बदले दूकान पर बैठकर साइकलें बराबर रिपेर करते रहो तो भला होगा तुम्हारा।’

और कुछ भी बोले बग़ैर वह चली गई। दूसरे दिन वह जाली के पास खड़ी माधो के साथ कुछ बात कर रही थी जो मैंने देखा। उनकी बातें सुनी जा सके उससे ज़्यादा अंतर था। मैंने माना कि माधो उसे पाठ पढ़ा रहा था।

उसके बाद के हफ़्ते जांच अधिकारी आ गए। नेहा बहन भी आई थी। सबको बुलाया गया। आख़िर में दुर्गा को बुलाया। अधिकारी ने आकर पहले तो दुर्गा को प्रेम से पास बुलाया। फिर बहन की फ़रियाद पढ़कर सुनाई। फिर पीठ थपथपाते हुए पूछा ‘बहन ने यह लिखकर भेजा है। अब तुम कहोगी वह भी सुनूंगा। बोल बेटी, उस दिन क्या हुआ था?’

बस। अधिकारी बोल लें इतनी ही देर थी और दुर्गा ने बता दिया ‘मैंने नलिनी बहन को मारा है। सबके सामने मारा। डाली टूट गई तब तक पीटा। पहले उन लोगों ने हमें…’

दुर्गा स्थिर खड़ी थी। अब क्या हो सकता था उस बारे में सब कुछ न कुछ दलीलें कर रहे थे उसका एक शब्द भी दुर्गा के कान पड़ने वाला नहीं था। अचानक उसने अधिकारी को पूछा ‘अब मैं जाऊँ?’ और छुट्टी मिलने का इंतज़ार किये बिना वह दौड़ गई।

बहन, नेहा बहन, साहब सब अभी बातों में लगे थे। हमने, बाकी के सब ने विदा ली। नंदू दरवाज़े पर बैठा था वह खड़ा होकर हमारे साथ चला। बाहर कम्पाउंड में पहुँचते ही मेरे मुँह से निकल गया ‘सही हुआ।’

‘नंदू ने रूककर मेरे सामने देखा और बोला ‘क्या सही हुआ भाई? ग़लत ही तो हुआ है। पहले उसने हज़ारों बार रोककर रखा था वह आज होकर रहा। मेरी माँ जननी हमेशा छुपाना चाहती थी उन औंसुओं को लाख कोशिश कर भी छिपा नहीं सकी। तुमने देखा नहीं?’

देखा था। अच्छी तरह देखा था। करमी का नाम आते ही जैसे अनजान गुफ़ा से सरकते झरने की तरह खारा पानी आँखों की कोर पर आकर रुका था। ज़्यादा देर वहाँ रुकना पड़ा होता तो बहकर गाल पर फैल जाता।

दूसरे दिन लक्ष्मी और माधो दोनों ख़रीददारी के लिए निकले तब मेरी दुकान पर आकर बैठे। ग्राहक की साइकल का काम ख़तम करके मैंने ऑफ़िस में भेजने के लिए चाय बना ली थी। उन दोनों को भी चाय पिलाई। हाथ में कप लेते हुई लक्ष्मी माधो को कह रही हो उस तरीके से बोली ‘बहन ने बेवजह बवाल किया। इसका परिणाम क्या? कुछ नहीं। मुल्ला की दौड़ मस्जिद तक।

माधो गंभीर होकर बोला ‘वह तो बहन खुद कह रही थीं कि बेवजह शिकायत हो गई। अब लगता है कि भूल गई होती तो अच्छा होता।’

‘वह सब तो ठीक यह दुर्गी भी अलग ही है। मुझे लगा था की इतनी सी लड़की रो देगी और विनती करेगी; पर माफ़ी का तो वह एक शब्द भी न बोली।

लक्ष्मी ने हवा में उड़ती साड़ी पकड़कर अपने मोटे शरीर पर ठीक से लपेटते हुए कहा था ‘दुर्गा रोएगी? उस दिन भी तुमने देखा नहीं कि आँखों में आँसू आए ही थे कि उतने में ‘मैं चलती हूँ’ कहकर जवाब सुनने के लिए भी रुकी नहीं। सीधे दौड़ी।’

लक्ष्मी कहती थी, ‘कितना भी गुस्सा क्यों न हो फिर भी दुर्गा को डांटने का जी नहीं करता। वह कितनी भी शरारत कर ले पर मैं जानती हूँ कि दुर्गा औरों के लिए खुद सहनेवालों में से है।’

लक्ष्मी और माधो को बच्चों को दुत्कारते सब ने देखा है। वैसे भी वे दोनों ढीट माने जाते थे; फिर भी किसी न किसी अवसर पर उनकी भावना बहती निकलते देखी है। इंसान अपनी इच्छा से हमेशा किसी का बुरा नहीं कर सकता। बुराई के अगोचर में से ही भलाई का झरना कभी न कभी अचानक कलकल करता बह ही जाता है।

एक बार माधो से भी सुना था ‘वह तो बहन को लगता था कि इस शिकायत के बहाने बच्चे काबू में नहीं रहते यह कहकर यहां से तबादला करा लिया जा सके इसलिए यह सब तमाशा किया था।

लक्ष्मी की बातों से ही जाना था। इतनी छोटी उम्र की लड़की को कोई सज़ा नहीं की जा सकती। कायदे से देखा जाए तो बाहर के अधिकारी उसे डांट भी नहीं सकते थे। हाँ, नलिनी बहन खुद उसे डांटे या फटकारे या लक्ष्मी उसे धमकाए तो उन्हें कोई क्या कर सकता है?

सारी जफ़ाओं के बाद यह तय हुआ कि बहन को नहीं, दुर्गा को ही कहीं और भेज दिया जाए। ऐसे आश्रम हर जगह तो होंगे नहीं इसलिए पालीताणा नारीसंरक्षण गृह में भेज देने का प्रस्ताव रखा गया।

दुर्गा मेरे लिए तो बिलकुल अनजान थी। फिर भी वह चली जाएगी यह बात नंदू को बताने के लिए मैं दौड़कर गया था। इन लोगों ने दुर्गा को निकाल बाहर करने का फैसला लिया है यह भी कहा था। ‘उसने उस दिन भली बनकर सब कुछ क़ुबूल कर लेने की क्या ज़रूररत थी? माधो ने सिखाया तो था, फिर भी हो गयी न देशनिकाल!’

नंदू ऐसे वक़्त में सोच में पड़ जाता। थोड़े पल कहनेवाले की ओर देखकर उसकी सच्चाई की कसौटी कर रहा हो ऐसा महसूस होता था।

थोड़ी देर के बाद अपनी जनेऊ से खेलते हुए धीरे से पर स्पष्ट आवाज़ में नंदू ने कहा, ‘जो सच था वह ही दुर्गा ने कहा, भाई, उसे जाने बिना तुम कुछ भी सोचोगे तो यह अच्छा नहीं होगा। और कुछ वक़्त यहां रहोगे तब उसे समझ पाओगे।’

माधो और लक्ष्मी की बात पर नंदू थोड़ा हँसा। फिर कहा ‘एक और बात समझ ले मुन्ना, आलतू फ़ालतू लोगों का सिखाया दुर्गाई कभी भी नहीं बोलनेवाली। वह कौन है यह जानोगे तब समझ में आएगा। वह किसी की सिखाई बातें भला क्यों बोलेगी? पालीताणा जाना पड़े या और कहीं। उसे क्या फर्क पड़ेगा! हाँ, इन बच्चों को और मुझे फर्क पड़ेगा।’ नंदू थोड़ी देर रुका। गहरी सांस लेकर आगे बोला, ‘तुम्हें पड़ेगा या नहीं यह अभी से जान नहीं सकता।’

 

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