चक्षु:श्रवा (भाग – १)

चन्द्रकान्त बक्षी

दादा केसरीसिंघ की उम्र उन्हें पता नहीं थी मगर उन्हें बराबर याद था कि विक्टोरिया टर्मिनस स्टेशन बना तब वे अपनी प्रपौत्री कोशा जितने थे | नया स्टेशन बना तब उनके पिता उन्हें चलाकर देखने ले गए थे और समझाया था कि यहाँ आगगाड़ी आएगी | गाड़ी धूएँ से चलेगी | पहली आगगाड़ी आई तब शहर के कई नामांकित स्त्री-पुरुष देखने आए थे | दादा केसरीसिंघ कोशा जितने थे पर स्टेशन पर प्रवेश करती वह पहली आगगाड़ी उनके स्मृतिपट पर स्पष्ट थी, काला लम्बा गोल मूंहवाला अजगर जैसा जानवर, धुंआ निकालता, चित्कार करता, भभकता पटरी पर होकर अन्दर आया था और लोग दूर हट गए थे और जानवर थमकर हाँफकर, सिसकता हुआ ठण्डा पड़ गया था और गोरे साहब गाड़ी से उतरे थे और मेमसाहब, रंगीन छत्रियाँ लेकर | और मेमसाहबों के लिए आराम करने के लिए एक शामियाना बाँधा गया था | बाहर मेला लगा था और शरबत पिए जा रहे थे | आठ साल की कोशा खिलखिलाकर हंसते हुए यह सुन रही थी | पीछे से एक पुत्रने दादा केसरीसिंघ को हिसाब लगाकर बताया था कि दादा, आप १८८० में जन्मे होंगे, उस वक्त आपकी उम्र पक्का आठ साल होगी क्योंकि १८८८ में विक्टोरिया टर्मिनस का पक्का स्टेशन बंधा था | दादा केसरीसिंघ आँखें मीचकर कहते, हाँ, सौ में थोड़े ही साल बाकी हैं | तब पुत्र ने कहा था कि आपकी उम्र बयानवे साल है | पर उस ज़माने में उम्र की तारीख-समय लिखकर रखने का रिवाज नहीं था | कोशा ने पूछा था, दादा, आप कौनसी हॉस्पिटल में जन्मे थे ?

प्रपौत्री कोशा और दादा केसरीसिंघ के बीच फर्क चौरासी साल का था | मगर दादा की कोशा के साथ सबसे ज़्यादा बनती थी और कोशा को भी दादा की बातें सुनने में बड़ा मज़ा आता | दादा बहुत कम सुन सकते | मगर एक पौत्र जो कि रेडियो इंजीनियर था वह कहता कि दादा कोशा की बात सबसे ज़्यादा सुन सकते हैं | दादा और कोशा की वेवलेंग्थ एक ही है | वह हँसकर बोलता कि इसलिए कम्युनिकेशन अच्छा है! दादा के दांत सालों पहले जा चुके थे, कृत्रिम दांत भी अब ज़्यादा काम नहीं करते थे और दादा खाते वक्त हलका हलका चबाने के लिए ही कृत्रिम दंतावली का इस्तेमाल करते, वरना बिना दांत का उनका जबड़ा पूरा दिन हिलता रहता | खाने में प्रवाही ही रहता | दादा धुम्मसी आँखों से कोशा के सामने देखकर कहते, बेबी, तू कान से सुनती है न ? मैं आँखों से सुनता हूँ | कोशा किलकारियाँ  करती हँसने लगती – तो फिर सबकी बातें क्यों आँखों से नहीं सुनते ? मेरी ही बात क्यों आँखों से सुनते हो ? दादा कहते, क्योंकि तुम मुझे सबसे ज़्यादा पसंद हो | कोशा कहती, कोई आँख से नहीं सुनता, सुनते हैं कान से, देखते हैं आँख से | और दादा ज़रा गंभीर होकर समझाते, तुम्हें पता है साँप के कान नहीं होते | साँप आँखों से सुनता है, इसलिए उसे चक्षु:श्रवा कहते हैं | संस्कृत में – जो आँखों से सुनता है, वह इन्सान बूढ़ा हो जाता है इसलिए आँखों से सुनता है | कोशा कुछ समजती नहीं पर दोनों कानों में उंगलियाँ डालकर आँखों से दादा के सामने देखती रहती, फिर कहती : पर मुझे तो कुछ भी सुनाई नहीं दे रहा | दादा हँसते – पगली लड़की है!

मुंबई में प्लेग आया तब दादा केसरीसिंघ लगभग जवान हो चुके थे पर बीसमी सदी अभी तक आई नहीं थी और लोग मुंबई छोड़कर जाने लगे तब उनके पिता ने उनके चाचा को कहा था : प्रह्ल़ाद, बालबच्चों को लेकर तुम कल अपने गाँव चले जाओ | अब यहाँ रहने में बड़ा जोखिम है – कमसे कम बच्चों-स्त्रीओं को यहाँ से ले चलते हैं | हम मर्दों को तो यहीं रहना होगा | और दादा केसरीसिंघ के हठ करने के बावजूद उनको सबके साथ गाँव जाना पड़ा था | प्लेग चला और जैसे ईश्वर पापोंकी सज़ा कर रहा हो, वैसे हज़ारों  परिवार ताराज हो गए | एक ही परिवार के तीन लोग एक ही दिन में मर जाने के किस्से भी सुनने मिले | यज्ञ, होमहवन, पूजा-प्रार्थना बहुत कुछ चला, अकाल भी आया, ढोर मुफ्त देने लगे और दादा केसरीसिंघ ने गरीब किसानों को उनके चाचा प्रह्लादसिंघ के पास आँखों में आँसू लेकर गाय देने आते देखा था | किसान कहते थे : चाचा, गायमाता को खिला नहीं सकते, उन्हें बचाइये, हमारा हम देख लेंगे | और चाचा प्रह्लादसिंघ की आँखों में आँसू देखना दादा को याद था | इंसान मक्खियों की तरह मर रहे थे | हलके लोग तो लकड़ी मिल नहीं रही थी इसलिए आग मुर्दे के मूंह में रखकर हिजरत कर रहे थे | कई लोग लाशों को समंदर में फेंक देते थे | दादा केसरीसिंघने छोटी उम्र में ही मौत को बहुत करीब से देख लिया था और रानी विक्टोरिया की छापवाला, उनके पिता ने मुंबई से लिखा हुआ पोस्टकार्ड भी पढ़ा था कि यहाँ मुंबई शहर में तो प्लेग की वजह से दंगे भी हो रहे हैं |

प्रपौत्री कोशा पूछती : दादा साँप कान से सुनता है ? और दादा केसरीसिंघ धीरे धीरे समझाते : साँप के कान नहीं होते, साँप की आँखें होती हैं | वह आँख से देखता है | मदारी बीन बजाता है और डोलता है इसलिए साँप उसे देखकर डोलता है | मदारी स्थिर हो जाता है तब साँप स्थिर हो जाता है | वह आवाज़ नहीं सुनता, आँख से देखता रहता है और डोलता रहता है इसलिए उसे चक्षु:श्रवा कहते हैं | मतलब जो आँखों से सुनता है वह | दादा केसरीसिंघ बात ख़तम करे उससे पहले ही कोशा पूछ देती, दादा! साँप कितना जीता है ? सौ साल | दादा हँसते | आपको सौ साल हो गए ? दादा कहते : नहीं, तुम कोलेज जाओगी तब मुझे सौ साल होंगे | मैं कोलेज कब जाउंगी ? और बातें आड़ी-टेढ़ी पटरी पर चला करती | स्कूल में कोशा अपने मित्रों पिनाक, राजु और नियति को बड़ी टिफ़िन रिसेस के वक्त बात करती, मेरे डेडी के डेडी के डेडी सौ साल के हैं, और उसके मित्र आँखें फैलाकर, चबाना रोककर सुनते रहते, फिर कोशा बहुत धीरे से, लगभग कानमें कहती हो वैसे स्पष्टता करती, तुम्हें पता है वह कानों से नहीं सुनते, आँखों से सुनते हैं | फिर वह आगे कहती, किसीको बताना नहीं, प्रोमिस ? बच्चे कहते प्रोमिस और बड़ी रिसेस ख़तम होने की घंटी बजती |

दादा केसरीसिंघ की आँखें अभी भी देख सकती थीं | शरीर में प्रवृत्ति थी और रोज सुबह-शाम वे घर में धीरे धीरे घूम सकते | बाल झड गए थे, सिर के दोनों तरफ की हड्डियाँ निकल आई थी और आँखें हड्डियों के गोल घर में बाहर से लगाईं हों वैसी लगती थी | मगर उन आँखों के पीछे जी हुई एक भरपूर ज़िंदगी की झलकें अभी तक कायम थी और भूतकाल – साठ, सत्तर, पचहत्तर पुराने भूतकाल की झपटें, स्वर अभी भी दादा केसरीसिंघ सुन सकते थे | दादा ने पूरे हिन्दुस्तान में नौकरियाँ की थी | पेशावर से कन्याकुमारी तक पेट भरकर घूमे थे, बहुत देखा था, बहुत खाया-पीया था | राजा-महाराजा-नवाब-हुक्काम रेज़ीडेंटो की दुनिया वे बहुत आसानी से याद कर सकते थे | आज़ादी आने के बाद उन्होंने प्रवृत्त जीवन समेट लिया था | और निवृत्ति को भी पचास साल हो चुके थे | दादा केसरीसिंघ कहते कि आज़ादी के बाद ज़िंदगी फीकी पड़ गई | अंग्रेज साहब क्या लोग थे ! अब तो सिर्फ मच्छर बुनबुनाते हैं | राजा – नवाब कदरदान थे, गुणी थे | खानदानी खून उनकी रगों में बहता था | अब तो काला पैसा और कला खून पूरे देश में फैल गए हैं | सफ़ेद कपड़ेवालों ने पूरे देश को काला कर दिया | दादा कभी अपनी पुरानी बेत को पकड़ते, उनकी पघड़ी की किनार पर सड़ी हुई ज़री की किनारिओं पर कांपती उंगलियाँ फेरते, रंग उडी हुई साटिन की रिबन पर लटकते मैडल हाथ में लेकर देखते रहते , काले मखमल पर चांदी के तार से काम की हुई जयपुरी जूतियाँ पहनकर , पित्तल पर गिल्ट की हुई वज़नदार नक्षी की हुई फ्रेम में जड़े पुराने लम्बगोल वेनिशियन शीशे में बहुत पास जाकर अपना मुरझाया हुआ बयानवे साल का चेहरा देखते और पानीदार आँखोंमें से स्मृति के मेघधनुषी प्रतिबिम्ब फैल जाते और अय्याशी की साड़ी घूंटी हुई तर्जो के दबे हुए प्रतिध्वनी सुनाई देने लगते –

 

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