काव्य कोडियां ‘मरीज़’ – नहीं वो बात

अनुवाद, मरीज़

નથી એ વાત કે પહેલાં સમાન પ્રીત નથી,
મળું હું તમને તે એમાં તમારું હિત નથી.

હવે કહેા કે જીવન-દાસ્તાન કેમ લખાય?
અહીં તો જે જે પ્રસંગેા છે સંકલિત નથી.

થયો ન હારનો અફ્સાસ કિંતુ દુઃખ એ રહ્યું,
કે મારા આવા પરાજયમાં તારી જીત નથી.

મળે ન લય તો ધમાલોમાં જિંદગી વીતે
કે કોઈ શેાર તો સંભળાવીએ જો ગીત નથી.

બીજી તરફ છે બધી વાતમાં હિસાબ હિસાખ,
અહીં અમારા જીવનમાં કશું ગણિત નથી.

એ મારા પ્રેમમાં જોતા રહ્યા સ્વાભાવિકતા,
કે મારો હાલ જુએ છે અને ચકિત નથી.

ભલે એ એક કે બે હા પછી ખતમ થઈ જાય,
મિલન સિવાય વિરહ તારો સંભવિત નથી.

જગતના દર્દ અને દુઃખને એ હસી કાઢે,
કરી દ્યો માફ હૃદય એટલું વ્યથિત નથી.

ફના થવાની ઘણી રીત છે જગતમાં ‘મરીઝ’,
તમે પસંદ કરી છે એ સારી રીત નથી.

~ મરીઝ ~


नहीं वो बात कि पहले जैसी प्रीत नहीं,
मिलूं मैं आपको इसमें आपका हित नहीं।

अब बताओ दास्ताँ-ए-ज़ीस्त कैसे लिखें?
यहाँ तो जो भी किस्से हैं संकलित नहीं।

हुआ न हार का अफ़सोस पर ग़म ये रहा,
कि मेरी ऐसी मात में तुम्हारी जीत नहीं।

मिले न लय तो धमाल में ज़िन्दगी बीते
कि कोई शोर तो सुनाएँ जो गीत नहीं।

उस तरफ हर बात पे हिसाब हिसाब,
यहाँ अपने जीवन में कुछ गणित नहीं।

वो मेरे प्यार में देखते रहे ज़ाहिरी
कि मेरा हाल देखते हैं और चकित नहीं।

चाहे वो एक या दो हाँ पर ख़त्म हो जाए,
मिलन बिना विरह तुम्हारा संभवित नहीं।

जग के दर्द और दुःख पर वो हंस दे,
कर दो माफ़ हृदय इतना व्यथित नहीं।

फ़ना होने के बहुत तरीके हैं जग में ‘मरीज़’,
आपने अपनाई है वो अच्छी रीत नहीं।

~ मरीज़ ~


मरीज़ – गुजरात के ग़ालिब

अनुवाद, मरीज़

गुजरात के कवियों और शायरों में मरीज़ एक बहुत बड़ा नाम है। इनका जन्म का नाम था – अब्बास वासी। कला-विश्व के सितारों के जीवन के बारे में जो अक्सर सुना जाता है, वैसी हज़ारों परेशानियों और ख़ामियों के मरीज़ ये भी थे, पर मेरे विचार में ये सब बातें गौण हैं। ग़ौर करने लायक तो बस उनकी शायरी है जिसको हिंदी/उर्दू में, देवनागरी लिपि में उपलब्ध कराने का एक प्रयास मैं इस ब्लॉग के माध्यम से कर रही हूँ ताकि ये खूबसूरत ख़याल सिर्फ़ गुजराती भाषा तक सीमित न रहें और इनका लुत्फ़ ज़्यादा से ज़्यादा लोग उठा सकें।

इस श्रेणी में अनुदित ग़ज़लें और नज़्में 1982 में लोकमिलाप ट्रस्ट द्वारा ‘काव्य-कोडियां’ श्रेणी के अंतर्गत प्रकाशित की गई थी। इसकी ख़ास बात यह है कि यह शायर का पूरा दीवान नहीं है, पर उनकी चुनिंदा रचनाएँ हैं जो गुजराती साहित्य के एक और जाने-माने व्यक्तित्त्व – राजेन्द्र शाह ने बड़ी मेहनत से चुनी हैं और इस संग्रह को शायर का सबसे उमदा काम कहा जा सकता है।

ફક્ત એ કારણે

ફક્ત એ કારણે દિલમાં વ્યથા આખી ઉમર લાગી,
કે મારી બદનસીબીથી મને આશા અમર લાગી.

ઘડીભરમાં તને પણ એની સંગતની અસર લાગી,
તને પણ પાછા ફરતા એક મુદત નામાબર લાગી

ન મેં પરવા કરી તેનીય એણે નોંધ ના લીધી,
મને તો આખી દુનિયા મારા જેવી બેકદર લાગી.

ઝરણ સુકાઈને આ રીતથી મૃગ્જળ બની જાએ?
મને લાગે છે એને કોઈ પ્યાસાની નઝર લાગી

હવે એવું કહીને મારૂ દુખ શાને વધારો છો,
કે આખી જીંદગી ફીકી મને તારા વગર લાગી.

હતો એ પ્રેમ કે વિશ્વાસ, પણ તારી ઉપર આવ્યો,
અને શંકા કદી લાગી તો એ તારી ઉપર લાગી

ઘણાં વરસો પછી આવ્યાં છો એનો એ પુરાવો છે,
જે મહેંદી હાથ અને પગ પર હતી તે કેશ પર લાગી.

બધા સુખદ અને દુખદ પ્રસંગોને પચાવ્યા છે,
પછી આ આખી દુનિયા મારું દિલ લાગી, જીગર લાગી

અચલ ઇનકાર છે એનો ‘મરીઝ’ એમાં નવું શું છે?
મને પણ માગણી મારી અડગ લાગી, અફર લાગી.

सिर्फ़ इस लिए

सिर्फ इस लिए दिल को ख़लिश सारी उमर लगी,
कि मेरी बद-नसीबी से मुझे आशा अमर लगी।

पल भर में तुमको भी उसकी असर लगी,
तुम्हें भी लौटते एक मुद्दत नामा-बर लगी।

न मैंने परवाह की उसकी भी न तवज्जो हुई,
सारी दुनिया मुझे अपने जैसी बेक़दर लगी।

झरना सूख कर इस तरह सराब बन जाए?
शायद उसे भी किसी प्यास की नज़र लगी।

अब यह कहकर मेरा दर्द क्यों बढ़ाते हो,
कि पूरी ज़िंदगी फीकी मुझे तेरे बग़ैर लगी।

था वो प्यार या ऐतबार पर तुम पर आया,
और शक की निगाह लगी तो तुम पर लगी।

सालों बाद आए हो इसका यह सुबूत है,
जो मेहंदी हाथ-पैर पर थी वो सर पर लगी।

सारे अच्छे और बुरे किस्सों को पचाया है,
फिर सारी दुनिया मुझे अपना दिल लगी, जिगर लगी।

अचल इनकार है उनका ‘मरीज़’ इसमें नया क्या है?
मुझे भी मांग अपनी अटल लगी, अमर लगी।

एक शाम की मुलाक़ात

अनुवाद, चन्द्रकान्त बक्षी

दिसम्बर के तीसरे हफ्ते में हमने घर बदल लिया और नये फ़्लैट में रहने आ गए। फ़्लैट सबसे नीचे के तल्ले पर था। उसमें तीन कमरे और रसोई-बाथरूम थे।

बाहर छोटा प्रांगण था और उसके आसपास लगभग दस फुट ऊंची ईंट की दीवार थी, जिस पर ताज़ी पुताई की हुई थी। दीवार के पीछे से बिखरे हुए पेड़, नाटे मकानों के काले पड़ चुके छप्पर और बदलता आसमान – यह सब दिखाई देता था। खिड़किओं से प्रांगण दिखता था और उसमें तरह तरह के फूल उगाए जाते थे।

हमारे ऊपर हमारा बंगाली मकान-मालिक अक्षय बाबू, उसकी पत्नी और तीन बच्चों के साथ रहता था। वह किसी गवर्न्मेंट ऑफ़िस में क्लर्क था। उसकी पत्नी – शोभा – काली थी और बहुत खुले दिल से हंसती थी, और रात के अंधेरे में प्रांगण के फूलों के आसपास घूमती थी। तीनों बच्चे बालीगंज की ओर किसी हाईस्कूल में पढ़ते थे।

जब मैं मकान की खोज में एक दलाल के साथ आया था तब मेरी पहली मुलाक़ात शोभा के साथे हुई थी। मकान पुराना था और हमारा फ़्लैट पुता हुआ था। दलाल ने मुझे बाहर खड़ा कर अंदर जाकर ख़ुद बात की और फिर मुझे बुलाया था। बाँस के बंधे हुए मकान पर बैठकर रंगकर्मी डिस्टेम्पर के कूंचे घुमा रहे थे। कमरा खाली होने की वजह से बड़ा लग रहा था और दीवारों में से गीले रंग, चूने और मिट्टी की मिश्रित बू आ रही थी।

‘आप यह मकान लेना चाहेंगे?’ नमस्कारों की लेन-देन होने के बाद उसने पूछा था।

‘हाँ।’

‘आप दो लोग हैं?’

‘हाँ।’ दलाल ने बीच में कहा, ‘मियाँ-बीवी दो ही लोग हैं। और कोई नहीं। आपको किसी भी बात की परेशानी नहीं होगी और बहुत अच्छे लोग हैं।’

मैं ख़ामोश रहा और बाहर के प्रांगण की ओर देखता रहा। शोभा मुझे बराबर से देख रही थी वह मैं समझ गया।

जगह हमें पसंद थी। शुरूआती विधियाँ निपटा कर हमने दो दिन बाद लॉरी से सामान पहुंचा दिया। हफ़्ते बाद अच्छा दिन देख कर हमने वहाँ रहना शुरू किया।

मैं रोज़ सुबह आठ बजे नहा कर, गरम नाश्ता करके जाता। दोपहर एक बजे आता और खाना खा कर एक घंटा आराम करके फिर चला जाता। रात को वापस लौटते लगभग साढ़े नौ हो जाते, फिर खा कर, मेरी बीवी सरला के साथ थोड़ा झगड़ कर मैं सो जाता!

मेरी और शोभा की मुलाक़ात बहुत काम होती, पर वह मेरे आने-जाने के वक़्त का बराबर ख़याल रखती। एक रविवार मैं सुबह बिस्तर पर लेटे हुए एक क़िताब पढ़ रहा था तब उसने खिड़की की जाली के पीछे आकर कहा, ‘मिस्टर मेहता, आपको फूलों का शौक़ है क्या?’

मैं हक्का बक्का रह गया। मैंने क़िताब बाजू पर रखी और एकदम से बैठ गया। रसोई में से स्टव पर पानी के उबलने की आवाज़ आ रही थी। सरला रसोई में थी। मैंने कहा, ‘कुछ ख़ास नहीं।’

वह हंस दी, ‘आपकी बीवी को बहुत शौक़ है। रोज़ शाम मेरे से दो-चार फूल लेकर जातीं हैं।’ मैं देखता रह गया।

इतने में रसोई से सरला की आवाज़ आई। शोभा खिड़की से दूर चली गई और मैं खड़ा हो गया। सब कुछ एक स्विच दबने जितनी तेज़ी से हो गया।

मेरी और शोभा की मुलाक़ात बहुत कम होती। मैं रविवार के अलावा पूरा दिन अपनी दूकान पर रहता। दोपहर के थोड़े आराम के अलावा मैं सुबह आठ से रात के साढ़े नौ तक घर से बाहर ही होता। सुबह शोभा नीचे आती और मेरे जाने के बाद सरला के साथ बातें करती। रात को सरला मुझे रोज़ की बातों की रिपॉर्ट देती और मैं बिना ध्यान दिये सुनता।

थोड़े दिन इस तरह बिताने के बाद मुझे लगा कि मुझमें शोभा के लिए थोड़ा कुछ आकर्षण जन्म ले रहा था। यह स्वाभाविक नहीं था।

पर इसका स्पष्ट रूप से स्वीकार करने के लिए मैं राज़ी नहीं था। शोभा काली थी, वयस्क थी, तीन बच्चों की माँ थी। मैं अनायास विचारों में चला जाता। पर उसमें सचमुच कुछ आकर्षण था। उसके बदन में तीन बच्चे होने के बाद भी सरला की अपेक्षा विशेष सुरेखता थी। वह हंस देती, मज़ाक करती, देखती – सब कुछ, जिससे घबराहट हो उतनी निर्दोषता से। उसकी ऊंची, भरी भरी छाती से मैं कोशिश करके तुरंत नज़र हटा लेता और मुझ पर किसी गुनाहगार सा असर होता।

कभी कभी मुझे यह ख़याल भी आता था कि किसी दिन सरला घर पर नहीं होगी और वह अचानक मेरे कमरे में आ जाएगी, और खिड़कियाँ बंद कर देगी, और शाम होगी, – और मैं बड़ी कोशिशों के बाद ख़यालों को रोक पाता। मैंने सरला को इस बारे में कभी कुछ कहा नहीं था और जब वह बातों ही बातों में शोभा के बारे में बात करती तब मैं लापरवाह अनुत्तेजना का ढोंग करके भी एकदम ध्यान से उसकी बात सुन लेता।

सरला और मैं हर शनिवार रात या रविवार दोपहर को फिल्म देखने के लिए जाते और प्रायः हमेशा ही हम बाहर जाने निकलते तब वह खिड़की में बैठी होती। सरला से वह मेरी तारीफ़ करती और सरला मुझे सब बताती। एक दिन हम फिल्म देखने जा रहे थे तब रास्ते में सरला ने कहा, ‘शोभा बड़ी हुशियार औरत है। वह ऊपर रहती है इसलिए मुझे इस जगह पर बिलकुल डर नहीं लगता।’

‘सही बात है; है तो शेरनी जैसी। वह है तो कोई परेशानी नहीं।’

‘कौन कितने बजे आया, कब गया – सबका ख़याल रखती है। तुम किस बस-रुट से जाते हो और पिछले रविवार तुमने क्या पहना था वह भी उसे पता है।’

‘अच्छा? तुमको बताती होगी।’

‘हाँ। मुझे कहती है कि, सरला, तुमने लड़का अच्छा चुना है।’

मैंने सरला की ओर देखा। मुझसे आँख मिलते ही वह हंस पड़ी।

‘उसकी बात सही है।’ मैंने कहा। ‘तुमने लड़का सचमुच अच्छा चुना है।’

‘चलो जाओ; शादी करने की जल्दी तो तुम्हे थी। मैंने तो पहले ही मना किया था … ‘

‘… फिर सोचा, अब ज़्यादा खींचेंगे तो हाथ से निकल जाएगा इसलिए हाँ कर दी!’ मैंने कहा।

सामने से आती हुई खाली टैक्सी को रोक कर हम दोनों बैठ गए।

दिन गुज़रते गए। कभी कभी मैं दुकान जाने के लिए बाहर निकलता और शोभा प्रांगण में खड़ी खड़ी मुझे देखती रहती। सरला की उपस्थिति में भी वह मेरे साथ हंसकर बात करती। तब हम बंगाली में बातें करते और सरला बंगाली समझ नहीं पाती। अक्षय बाबू के साथे मेरी कुछ ख़ास बात होती नहीं। वह आदमी ऑफिस के आलावा पूरा वक़्त घर पे ही बैठा रहता। कभी कभी ऊपर से रविन्द्र संगीत गाने की आवाज़ आती या सुबह बाज़ार से सब्ज़ियाँ लेने निकलता तब दिखाई देता।

सरला ने एक बार मुझे पूछा था, ‘इसका बाबू कुछ काम नहीं करता लगता। विधवा की तरह पूरा दिन घर पे बैठा रहता है।’

‘कहीं नौकरी करता है और हमारा किराया मिलता है – उसका काम चलता है। पर, आदमी बेचारा बहुत शांत है।’

‘पर इन दोनों की जोड़ी कैसे बन गई? शोभा का बाप तो पैसेवाला है। गहनों की दुकान है और वह बचपन में कॉन्वेंट में पढ़ी है।’

‘कॉन्वेंट से बेचारी ज़नानख़ाने में आ फंसी …’ मैंने कहा।

‘ज़नानख़ाने में कोई नहीं फंसी।’ सरला ने कहा, ‘अपने पति को फंसा दिया।’ और हम दोनों हंसे।

‘तुम्हे पता है? अपने फ्लैट का रंग- रिपेरिंग सब उसने खुद से करवाया है। पक्की बिज़नेसवुमन है! बंगालियों में ऐसी स्त्री तो कभी ही देखने मिलती है!’ सरला ने जवाब नहीं दिया। किसी ख़याल में हो ऐसा भी कुछ नहीं लगा।

दिन गुज़रते गए वैसे शोभा मेरे ख़यालों पर कड़ी पकड़ जमाने लगी। मुझे दिन-रात उसी के ख़याल आते। वह भी मेरे साथ बात करने के बहाने खोजती फिरती थी यह मैं समझ गया था, पर वह बेवकूफ़ी करनेवाली स्त्री नहीं थी। बागीचे से फूल लेने वह निचे आती और मैं छुट्टी के दिन बिस्तर पर पड़ा हूँ या शेविंग कर रहा हूँ तब उसकी आँखों में मैं मुझे मिलने आने की, एकांत की इच्छा देख पाता। सरला पूरा दिन घर ही रहती, शोभा को अपने बच्चों से फुर्सत न मिलती और मैं अधिकांश दुकान पर रहता। एक दिन सुबह उसने मुझे कहा, ‘आप बहुत मज़दूरी करते हैं, मिस्टर मेहता!’

‘क्या करें?’ मैंने कहा, ‘तक़दीर में जो लिखी है …’

‘आप जैसी तक़दीर तो …’ वह रहस्यमय हंसी। ‘बहुत कम लोगों की होती है।’ मैं भी हंसा।

‘मुझे एक बार आपकी दुकान पर आना है।’ उसने कहा।

मैं बहुत घबराया। दुकान की दुनिया में मैं शोभा को घुसने देना नहीं चाहता था। मैंने तुरंत कहा ‘आपको कुछ चाहिए तो मुझे बताइएगा, मैं ले आऊंगा। दिन में चार बार तो आता-जाता रहता हूँ। इतनी दूर आने की आप क्यों तकलीफ़ लेंगी? मैं शायद बाहर गया हूँ, मिलूँ या ना भी मिलूँ …’ शोभा मेरी ओर देखती ही रही।

सरला की उपस्थिति में मैंने शोभा के साथ बातें करना कम कर दिया था। वह भी समझ कर सरला की उपस्थिति में मुझसे बात न करती। सरला के साथ उसका अच्छा नाता था। मेरी अनुपस्थिति में दोनों बहु बातें करतीं। कभी मैं आ जाता तब वह हंसकर कहती, ‘चलो, मैं चलती हूँ; अब आप दोनों बातें कीजिए -‘ और तुरंत चली जाती।

बहुत दिन हो गए थे। शोभा एकदम नज़दीक थी और फिर भी कितनी दूर थी। मुझे उसके साथ दिल खोल कर बात करने का मौका नहीं मिलता था। वह हमेशा कोशिश में रहती – मेरे पास आने की पर, घर में एकांत न मिलता। सरला हमेशा घर पर ही रहती। ऐसा कभी ही होता कि सरला बाहर गई हो और मैं घर में अकेला हूँ।

मैं सिर्फ उस दिन की कल्पना करके ही बेचैन हो जाता। शोभा के ख़याल से ही मैं एकदम गर्म हो जाता और अंत में निराश होकर सोचता कि शायद ऐसा प्रसंग कभी नहीं आएगा जब फ़्लैट के एकांत में मिल पाएंगे। और जैसे जैसे निराशा निराशा होती जाती वैसे वैसे मेरी इच्छा और भी सतेज बनती। शोभा गर्म औरत थी, उसकी आँखों में जवानी का तूफ़ान बिलकुल कम नहीं हुआ था और वज़नदार शरीर में अभी भी ज्वार था। मैं उसके लिए मानो छटपटा रहा था।

मुझे टेढ़े-मेढ़े बहुत ख़याल आते। रोज़ शाम ढलती और रास्तों पर हलकी गैसलाइटें जल उठतीं तब मैं उदास हो जाता और मेरा आधा सर दर्द करने लगता। कभी कभी मुझे घर चले आने का मन करता और मैं दुकान से बाहर निकलकर किसी एर-कंडिशंड होटल में जाकर बैठ जाता और कॉफ़ी पीता। एक दिन मुझे बेचैनी लगने लगी और शाम को ही मैं घर आ गया। सरला सब्ज़ी लेने गई थी। मैं दरवाज़ा बंद कर, कपड़े बदल कर बिस्तर पर जा गिरा और बाहर डोरबेल बजा – सरला आ गई थी।

मैंने उठ कर दरवाज़ा खोला – सामने शोभा खड़ी थी!

‘आप आज बड़ी जल्दी आ गए?’ उसने पूछा।

‘हाँ, ज़रा तबियत ठीक नहीं लग रही थी।’ मैंने कहा और मेरी तबियत को मैं एकदम भूल रहा था!

‘सरला हाल ही सब्ज़ी लेने गई है। उसे आने में अभी आधा घंटा लगेगा। आपको मैंने आते देखा इसलिए सोचा कि मिल लूँ … मुझे भी लगा की तबियत ठीक नहीं होगी!’

‘अंदर आइए।’ मैंने कहा। मेरे कान गर्म हो गए। वह अंदर आई और दरवाज़ा बंद किया। हम दोनों एकदूजे को समझ गए थे। जाने मुझे यह मौका अनायास ही हाथ लग गया था।

हम दोनों बीच के बड़े कमरे में आए। मेरा दिल धड़कने लगा। शोभा सामने थी और सरला को आने में अभी आधे घंटे की देर थी, और –

‘मुझे आपसे एक प्राइवेट बात करनी है।’ उसने कहा, ‘अंदर चलिए।’ मैं बोल पाया। हम दोनों कोनेवाले कमरे में आ गए। शाम थी। अंधेरा था। मैंने बत्ती नहीं जलाई।

‘यहाँ कोई नहीं?’ उसने दबी सी आवाज़ में पूछा।

‘नहीं। फ़्लैट में हम दोनों ही हैं।’

उसने ज़रा खिसक कर बीच का दरवाज़ा बंद करते हुए कहा, ‘सामने के मकानवाले हमें देखें यह मुझे पसंद नहीं।’

पूरे कमरे में शून्यता छा गई।

उसने मुझे अपने पास आने का इशारा किया। मैं खिंचा चला गया। मुझे लगा मैं कांप उठूंगा।

मेरी आँखों में आँखें डालकर वह कहने लगी, ‘मैं आई हूँ कुछ कहने … सुनिए, लगभग रोज़ शाम छः बजे एक आदमी आपकी बीवी को मिलने आता है! आपको पता है?’

मैं कांप उठा।

क्रमशः

चन्द्रकान्त बक्षी

ग़म बढ़ते जाएँ और इन्सान बीमार भी न पड़े यह ईश्वर की कलामय क्रूरता का एक प्रकार होगा, उसने सोचा। समस्याएँ। एक मित्र ने पूछा, समस्याओं का निराकरण क्या? हमारी मिडलक्लासी समस्याओं का? भगवान है सब का। वह समस्याओं का निराकरण कर देता है। एक पुरानी समस्या सुलझे उससे पहले ही भगवान दो नयी विकट समस्याएँ खड़ी कर देता है। वरना हम मिडलक्लास के इन्सान पुरानी समस्याओं की तपिश में ही झुलसकर काले पड़ जाएँ और जले कागज़ की तरह कोनों में पड़े पड़े राख हो जाएँ। पर जन्मकुंडलिओं में विधाता शनि का समायोजन करके देता है। वह मरने नहीं देता। शनि ज़िंदा रखता है, संतप्त करता है। गर्दिश-ए-आसमानी में गोल गोल घुमाये रखता है। साप्ताहिक भविष्य पढ़ने का मज़ा आता है।

भूतकाल के पास मनःचित्र भी नहीं थे, साइकेडिलिक डिज़ाइनों की तरह सिर्फ़ एक ही तरह के रंग और उन रंगों के परावर्तन चकराते रहते थे। यकायक, भूमिका के बिना सब घटित हो रहा था। अप और डाउन ट्रेन की तरह एक ही समय भूतकाल और वर्तमानकाल बन जाता था। यह शहर जिसमें उसकी ज़िंदगी और शायद पूर्वजन्म भी गुज़रा था, अब उसका नहीं था। इस शहर के श्मशानघाट पर उसकी चिता जानेवाली नहीं थी। और यह शहर उसने छोड़ दिया था। स्टेशन पर एक ही मित्र आया था – आओगे फिर से? हाँ। कब? किसी दिन। मित्र समझता था। अनिश्चितता का कोई अर्थ नहीं था। फिर स्टेशनों पर ऐम्बर लाइटें होतीं, गार्ड सीटी लगाता – दिन हो तो हरी झंडी लहराता, रात हो तो हरी बत्ती हिलता। फिर पश्चिम की दिशा, उझड़ी हुई गृहस्थी की दिशा, नए स्मशानों की दिशा।

इंसान शहर छोड़ सकता है? उसने रेस्ट्रों कार की खिड़की से बाहर देखा। गाड़ी एक पुल पर आई, नीचे एक सूखी नाली आई – और पुल के नीचे हरे तोते उड़ रहे थे। सामने धुंधले, पहली धूप में मकाई के खेत दिख रहे थे। शायद मकाई थी, होगी। – उस शहर में अब घर नहीं था, गृहस्थी नहीं थी। रात को पौने नौ की बसें नहीं थी। हाँ, क्रॉसिंग पर उतर जाना, फिर दक्षिण की ओर सीधे जाना, दाहिने लाल मकान आएगा, ऊपर पहले माले पर वह रहता है … रहता था! उसके फ़्लैट की खिड़की –

उसके फ़्लैट की खिड़की भूतकाल की ओर पड़ती है। उस फ़्लैट की खिड़की से शाम देखने का अकस्मात शायद ही बना है। उस खिड़की से रोज़ रात दिखती थी, और सुबह। चिड़ियाँ और चढ़ता सूरज, सुबह बजती सायरन की आवाज़। पर इंसान शहर छोड़ सकता है? जीवन के पहले चालीस साल जीया हो वह शहर – जहाँ पीहर से भी ज़्यादा आत्मीयता हो गई हो। कहाँ से शुरू किया जाए और कहाँ ख़तम किया जाए? बारिश में स्कूल से भीगते भीगते आते थे वह शहर, माँ की चिता की प्रदक्षिणा कर आग जलाई थी वह शहर, वासना से छलकता पहला चुंबन किया था वह शहर, जहाँ सिगरेट पीना सीखे थे वह शहर, जवानी की ईर्ष्याएँ जहाँ आँखों के सामने धीरे धीरे बुझती देखी थीं वह शहर।

इंसान शहर छोड़ सकता है? छोड़ता है। पर छोड़ सकता है?

एक बार बचपन में खो गया था। एक बार डूब गया था, एक बार स्टेशन पर सो गया था, एक बार …

स्मृतिओं के अलावा कुछ रहता नहीं वयस्क इंसान के पास। या फिर बीमारियाँ। पूरी ज़िन्दगी जतन कर, परवरिश कर संभाली हुई बीमारियाँ। या फिर सफ़ेद बाल या सालों से एक ही तरह हंसने की वजह से पड़ी रेखाएँ। अथवा ज़माने से बैग उठाते उठाते घूमने से बाएँ हाथ की हथेली में पड़े छाले। बायाँ हाथ पूरी ज़िन्दगी दुनिया की ग़ुलामी करता रहा है और दाहिना सलामें।

अब बायें हाथ के छाले और दाहिने की सलामें शहर में छोड़कर वह बाहर निकल गया था। रेस्ट्राँ कार का मलयाली मुनीम बहुत तेज़ी से बिल फाड़ रहा था। मकाई के खेत अब नहीं थे। उर्वर ज़मीन थी, पश्चिम की ओर दौड़ती उर्वर ज़मीन और आसमान, पश्चिम के पेड़ों की ओर नील-कालिमा पकड़ता अपरिचित आसमान।

विचार संलग्न, क्रमबद्ध, सिलसिलेवार आ सकें वैसी स्थिति नहीं थी। दो जहानों का ख़ुदा उसके दो जहानों को पहचानता था इसलिए वह इस शहर को पहचानता था। उसने गिद्ध की आँखों से यह शहर यह शहर देखा था, कुत्ते की नाक से यह शहर सूंघा था, सूवर के जबड़ों से इस शहर में खाया था: यह शहर उसकी भूख, जुराबों, क्रोध और कहाकों में फ़ैल गया था। यहाँ वह बच्चे की तरह आँखें खुली रख, कुछ देखे बिना अपने ही विचारों में लीन रह सकता था, यहाँ के हर चेहरे की रेखा को, हरेक पथरीली तह पर जमी धूल की पर्त को, आसमान को, धूप को, बरसात में जमे पानी को, दिशाओं को, अगली सुबह केअख़बार की हेडलाइनों को – सबको वह आत्मीयता से पहचानता था और वह सभी दौड़ती ट्रेन की गड़गड़ाहट में खो गए थे।

और बेकारी के दिन गुज़ारे थे इस शहर में। और इश्क़ के। महत्त्वाकांक्षाओं को ज़मींदोस्त होते देखा था इस शहर में। वर्षों से इन्सानों के साथ बिरादरी का ताल्लुक़ निभाया था इस शहर में। ख़ाकी कमीज़ और सफ़ेद टोपी पहनकर सिनेमा के नीचे अख़बार बेचते आदमी से वह सालों से अख़बार खरीदता था। गन्ने का रास निचोकर देनेवाले पहलवान के पास वह रस पीता था। गंजे सिरवाले एक हजाम से वह कॉलेज के दिनों से बाल कटवाता था। मोठे चश्मेवाले दर्जी से वह पैंट सिलवाता था – सालों से। कॉफ़ी – हाउज़ का धारदार मूछवालावाला एक वेटर हमेशा खबर पूछता था। रोज़ की बस के कंडक्टरों को वह चेहरे से पहचानता था। एयर-लाइन की रिसेप्शनिस्ट छूटती तब वह देखता रहता। रेसकोर्स के पास एक कोकाकोला वाले और नदी के तट पर हॉटल के नीचे बैठे पानवाले से सालों से लगाव था। बेनाम लोग। उनके नाम भीमालूम नहीं थे। वे लोग अचानक मर जाएंगे तब पता नहीं चलेगा। शायद वे लोग ही सोचेंगे कि सालों से रोज़ाना आनेवाला ‘वह’ अब आता नहीं। आये बिना रहता नहीं … शायद मर गया होगा।

और शहर उसकी हड्डिओं के प्रवाही तक उसके शरीर में उतर चुका था। उस शहर में रात में होती आवाज़ों से वह समय का अनुमान लगा सकता था। आधी रात आँख खोलकर आकाश की ओर देखकर सोच सकता – कितने बजे हैं। भरी दुपहरी में आराम से सोकर स्वप्न देख सकता था। आँखें बंद कर सिर्फ़ साँस लेकर वह रोज़ के मार्गों के बस स्टॉप को पहचान सकता था। उस शहर की हवा में उसका रेडियो सुंदर बजता था, उसकी ब्लेड धारदार चलती थी, उसके जूतों का पॉलिश ज़्यादा चमकता था, केटली की चाय को फ्लैनेल की टीकोज़ी और गर्म रखती थी, अलमारी का हैंडल ज़्यादा सफ़ाई से घूमता था, सिगरेट का धुँआ ज़्यादा स्वप्निल उड़ता था। अँधा इंसान अन्धकार को पहचानता है वैसे वह उस शहर की हवा को पहचानता था।

जाड़े आए थे और दीवालियाँ। नए अंडे, और होली पर अबीर गुलाल की खुशबू। पंखे की आवाज़ भी उसके अस्तित्त्व में बुन गई थी। और मौत की खबरें। कोर्ट और शनिवार-दर-शनिवार आता मासिक। सिनेमाहॉल की कुर्सियाँ। बियर और मक्खन खरीदता था वह दुकानें। परिचित आशाएँ, परिचित अपरिचय। सभी रह गया था पीछे; सिर्फ हरी बत्ती का प्रकाश परछाई के डर की तरह शायद साथ साथ आ रहा था और उसमें पीछे मुड़कर देखने की हिम्मत नहीं थी। पीछे मुड़कर देखने से सब कुछ एकसाथ खनखनाहट के साथ, हमेशा के लिए खो जानेवाला था। शायद।

जो जी जा रही हो वही चीज़ आत्मकथा होती है। जो जी जा चुकी हो वह संभवतः और किसी की कहानी होती है। जिसकी जीभ में वाचा नहीं होती ऐसे किसी की कहानी, कही न जा सके ऐसी, आत्मकथा को उत्तरार्ध और पूर्वार्ध नहीं होते। एक खत्म होती है, दूसरी शुरू हो जाती है। शायद – अगर वह आत्मकथा हो तो वह अलग अलग लोगों की होती है। बिल देकर वह रेस्ट्रों कार से अपने डिब्बे की ओर चला।

उसकी बर्थ आ गई। वह लेट गया।

*

फिर काफी समय बाद एक सहप्रवासी ने प्रश्न करने की रुचि दिखाई। रफ़्ता रफ़्ता पूछा: ‘कहाँ जा रहे हैं?’

‘मुंबई।’

‘काम से जा रहे होंगे?’

‘नहीं, हमेशा के लिए।’

‘धंधा करते हैं?’

‘नहीं।’

‘नौकरी करते होंगे?’

‘नहीं।’

‘परिवार वहाँ होगा?’

‘शादी नहीं की।’

‘कितनी उम्र हुई?’

‘चालीस।’

फिर सहप्रवासी की ज़रूरत न रही। सवाल आते ही रहे। खुद ही प्रवासी था और वही उसका सहप्रवासी भी था।

‘क्या किया चालीस साल तक?’

‘धंधा किया। फिर बंद किया।’

‘अब?’

‘पता नहीं।’

‘क्या इच्छा रखते हैं?’

‘फसाद, युद्ध, हुल्लड़। खून – खराबा। सब बहुत असह्य तरीके से सह्य बन गए हैं। इस तरह सड़ते रहने का कोई मतलब नहीं।’

‘इसलिए शहर छोड़ दिया?’

‘स्मृति के घाव भर गए थे वह पसंद नहीं आया। इसलिए घाव फिर से कुरेद लिए।’

‘वह हँसा।’

सच और झूठ एक ही बन रहे थे, गर्भाशय और कब्रस्तान की तरह।

बर्थ पर ही नींद आ गई। आसमान जितने ऊँचे मिनारे पर एक महाकाय छिपकली उसके सामने ताक रही थी और उसको लगा कि वह एक चींटी की तरह उस महाकाय छिपकली के हिलते गले की तरफ खिंचता सरक रहा था। आँखें खुल गईं।

उसने फिर से खुश होकर आँखें बंद की।

क्रमशः सपनों में भी विविधता आ रही थी। खुशकिस्मती। खुशकिस्मती ….

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अमृता

किशनसिंह चावड़ा

यूँ तो मेरी छोटी बहन का नाम अमृता था। पर सब प्यार से उसे ‘अमु’ नाम से ही बुलाते थे। वह मुझसे तीन साल छोटी थी। मैं बारह का था तब वह नौ की थी। भाई-बहन होने से भी ज़्यादा हमारा ख़ास दोस्ती का रिश्ता था। अमु बहुत शरारती थी और मैं ज़रा शांत। इसी लिए आँगन में ज़रा भी कुछ बच्चों में तकरार जैसा होता था तब मेरे सामनेवाले का तो अमु बारह बजा देती थी। छरहरा शरीर, तंदुरुस्ती की खुशबू, सुन्दर चेहरा और तेजस्वी आँखें। अमृता की आँखों पर मैं मुग्ध! वह आँखें उसके समग्र सौंदर्य का शिखर हैं यह बात मैं थोड़ा बड़ा हुआ तब मुझे समझ आई। पर नासमझी में भी मुझे उसकी आँखें बड़ी पसंद थीं और उन आँखों पर धनुष्याकृति रचती उसकी भौएँ सहलाते मैं थकता ही नहीं था। फिर अमु नहीं होती थी तब मैं अपनी ही भौएँ सहलाता अमु को याद करता रहता। अमु को देखकर मेरी नानी राजुबा हमेशा कहती कि, ‘किशन, तेरी बा (१) छोटी थी तब बराबर अमृता जैसी ही लगती थी। अमु बड़ी होगी तब नर्मदा जैसी ही सुन्दर दिखेगी।’ एक दिन राजुबा ने मुझे और अमु दोनों को बा के बचपन की एक बात कही: ‘नर्मदा तब नौ-दस साल की होनी चाहिए, मैं खूब बिमार पड़ी थी। किसी को आशा नहीं थी कि मैं जीऊँगी। तुम छोटे तो हताश होकर रोने लगे थे। उन दिनों में एक सन्यासी भिक्षा मांगने आया। नर्मदा उसकी आदत के मुताबिक़ दोनों मुठ्ठिओं में बाजरी भरकर दौड़ी। उसकी गर्दन पर एक सोने की तार थी। उस साधू ने बातों ही बातों में घर की बिमारी की खबर जान ली। तरसा था कहकर लड़की से पानी मांगा। वह साधू नहीं, कोई अवधूत था। उसने नर्मदा को कहा कि अगर अपनी सोने की कंठी दे दे तो तेरी माँ तुरंत ठीक हो जाए ऐसी ईश्वरी भस्म दूंगा। नर्मदा ने तो कंठी निकाल दी और वह साधू चुटकीभर भस्म देकर चलता बना। लड़की ने तो वह भस्म लाकर चम्मचभर पानी से मेरे गले से उतार दी। भगवान का करना कि तब के बाद रोग जाने लगा और मैं ठीक हुई। आठ-दस दिन बाद वह सोने की तार नर्मदा के गले पर दिखी नहीं इसलिए पूरी बात समझ में आ गई। लड़की ने तो सचसच बता दिया। अंत में तुम्हारे नाना ने कहा, ‘मोई कंठी गई तो गई, आप ठीक हो गईं बस और क्या चाहिए। नर्मदा, तू घबरा मत बेटी।’ ऐसी थी तुम्हारी माँ। देख अमु तू ऐसा कुछ मत करना।’

उस दिन शाम को हम ननिहाल से घर आए तब अमु ने तुरंत बा से कहा: ‘बा, मेरे गले से सोने की कंठी निकाल ले। वरना मैं कोई साधू को दे दूंगी।’ बा पहले तो अमु का विस्फ़ोट समझी ही नहीं। वह तो मैंने पूरी बात कही तब वह हँस पड़ी और अमु को पप्पीओं का इनाम मिला। बा मुझे पकड़ने आई उतने में तो बंदा दो-तीन-पाँच हो चूका था।

अमु को पाँचीका (२) खेलने का बहुत शौक़ था। उस खेल के पीछे वह पागल थी। घंटे के घंटे यह खेल खेलते वह थकती नहीं थी और खेलने में भी एक नंबर। उस वक़्त हमारे प्रांगण में एक मारवाड़ी कुटुंब हमारे दूसरे मकान में भाड़े से रहता था। उनके बुज़ुर्ग भैरव काका राजमहल में काम करते। संगमरमर टांकने में बेजोड़। हथौड़ा जैसे उनका बच्चा था और तक्षणी उनकी दासी। वह भैरव काका एक दिन बा के लिए संगमरमर का सुन्दर खल ले आए। बा बड़ी खुश हुई। उसी वक़्त अमु ने भैरव काका का हाथ पकड़कर संगमरमर के पाँचीके ला देने का वचन ले लिया। दूसरे ही दिन अमु के सुन्दर कुके (३) आ गए। बस तब से मोहल्ले की लड़कियों में अमु का नाम हो गया। उतना ही नहीं, उसकी महत्ता भी बढ़ गई।

धीरे धीरे अमु ने खेल-खेलकर संगमरमर के कुकों को और मुलायम और चमकदार बना दिया। वह कुके तो जैसे उसका प्राण। और पाँचीका खेलती भी कैसे! एक बार उसकी चार-पाँच सहेलियों के साथ वह हमारी दहलीज़ पर कुके खेलने बैठी। और लड़कियों के कुके तो थोड़े ही ऊंचे उछलते और छूट भी जाते थे। पर अमु की बारी आई और बस हो चुका। उसके कुके बहुत ऊपर उछलते और उनके साथ उसकी आँख की कनीनिका ऊपर चढ़ती। कुकों के साथ फिर दृष्टि भी नीचे उतरती। एक तो अमु की आँखे ही तेज़ ऊपर से इस कुके के खेल ने उसे और धारदार बना दिया था। वह गुस्सा करती तब उसकी भौएँ ऐसी चढ़ती कि बा तुरंत ही झुक जाती। अमु को उसके संगमरमर के कुके अत्यंत प्यारे थे। उसे नौ साल पूरे हुए और दसवीं वर्षगाँठ तब बा से अमु ने अपने कुकों के लिए मशरू (४) की थैली बनवाई थी। कुके तो उसका अमूल्य गहना, उसकी कीमती मिल्कीयत थे।

मुझे बारह वर्ष होकर तेरहवाँ बैठा। हमारे घर में उसके बाद तुरंत धमाल शुरू हुई। धान की बोरियाँ आने लगीं। मैं शाला से आता तब बा की मदद में बुआ, मौसी, मामा सब हाज़िर रहते और धान की सफाई चलती रहती। वह तो धीरे धीरे मुझे पता चला कि मेरी शादी की तैयारी की यह शुरुआत थी। शादी का दिन जैसे जैसे पास आता गया वैसे वैसे धमाल बढ़ती गई। मेरा महत्व घर में बढ़ता चला। यह बात अमु को नई लगी। क्यों कि हमारा पहले जितना साथ अब न रहा। धीरे धीरे वह और भी कम होता चला। अमु और मेरे बीच प्यार की रेशमगाँठ ऐसी दृढ़ बंधी थी कि हम दोनों यह नई परिस्थिति सह न सके। पर अमु तो मेरे से ज़्यादा गुस्सैल। इसलिए उसका क्रोध अनेक तरह से प्रकट हुआ। उसकी अर्ज़ी को बा ने हँसकर उड़ा दिया इसलिए वह बापूजी (पिता) तक पहुंची कि भाई की शादी रोक दीजिए और शादी की पूरी बात ही उड़ा दीजिए। पर बेचारी अमु की कौन माने! कुलवान घर। अच्छी प्रतिष्ठा। सम्बन्धियों का विस्तार बड़ा। इसलिए लड़का बचपन में ही बस जाएगा इस विचार से कुटुम्बिओं के हर्ष की सीमा नहीं थी। जिस दिन मुझे पीठी (५) लगाई उस दिन तो अमु फूट फूट कर रो पड़ी: ‘ओ मेरे भैया!’ बा और बापूजी भी उसे शांत न कर पाए। फिर मैंने जब उसे बाँह में लिया तब उसकी सिसकियाँ रुकीं।

शादी में सब ने मुझे कुछ न कुछ भेंट किया। किन्हीं लोगों ने हाथ में रुपये भी रखे। कोई ज़री की टोपी लाया। मौसी सोने की चेन लाइ। मामी ने हाथ की कड़ियाँ दीं। ऐसे चीज़ें एक के ऊपर एक आने लगीं। अमु क्या देती बेचारी? सब बिखरे। जब मैं अकेला रहा तब अमु धीरे धीरे आकर मेरी बगल में लपक गई और संकोच से धीरे बोली: ‘भाई, तुम्हारे लिए मैं यह लाइ हूँ।’ कहकर उसने पाँचीका की मशरू की थैली दिखाई। मैं था तो बच्चा पर अमु की आँख से टिपकता स्नेह देखकर मैं उससे लिपट गया और हम दोनों खूब रोए।

फिर तो अमु बड़ी हुई। और सुन्दर बनी। उसके रूप में यौवन जुड़ा। उसके लावण्य में लालित्य उगा। उसकी आँखों में मस्ती के बदले लज्जा की उपज हुई। पर हमारा स्नेह उम्र के साथ बढ़ा, घटा नहीं। सब संजोग और स्थितिओं को पार कर वह और विशुद्ध और सहृदय बना। उसकी आर्द्रता बढ़ी। उसकी भव्यता पहचान में आई। उतने में तो अमु की शादी हुई। अमु अब ससुराल जाएगी इस विचार से मैं ग़मगीन हो गया। और शादी के दिन तक वह ग़मगीनी इतनी असह्य हो गई कि उस पर पीठी चढ़ी तब मैं रो दिया।

अमु की बिदाई थी। बा की आँख से सावन भादो बरस रहे थे। सगे संबंधी रोती आँखों से दिग्मूढ़ बनकर साक्षी दे रहे थे। मुहूर्त भारी लग रहा था। वातावरण में समझ आ रहा था मांगल्य और अनुभव हो रहा था कारुण्य। मैं बा के पीछे उतरे हुए चेहरे से खड़ा था। मेरे अंतर में गज़ब की असमंजस चल रही थी। कुछ समझ नहीं आ रहा था। पर अकेलेपन का एहसास सर्वोपरी था। मैंने आग्रह से बापूजी से पचीस रूपए लिए। वह पैसे मैंने शादी में अमु की दी हुई उस पाँचीकावाली मशरू की थैली में उन कुकों के साथ मैंने रखे। अमु गाड़ी में बैठने चली उतने में ही मैंने वह थैली धीरे से उसके हाथ में सरका दी। उसने मेरी ओर देखा। वह आँखें मैं कभी नहीं भूलुंगा। उन आँखों में प्यार, विषाद और व्यथा की पूरी कहानी मूक क्रंदन कर रही थी। हमें रोता छोड़ अमु रोती हुई चली गई।

उसकी बिदाई हमें कुछ समझ आई अमु वापिस आई तब। शादी के थोड़े ही दिनों में मेरी वह लाडली बहन बिलकुल बदल गई थी। उसका हसता चेहरा, मुस्कराती और शरारती आँखें और उछलता पूरा अस्तित्व सबकुछ शांत हो गया। जैसे जैसे दिन गुज़रते चले वैसे वैसे अमु और शांत और होशियार हो गई।

चार साल बाद वह ससुराल से बिमार होकर घर आई तब मैं और बा उसे मुश्किल से पहचान पाएँ इतनी वह बदल गई थी। वह अमु ही नहीं, मानो उसका भूत। खूबसूरत और प्यारभरी अमु का ऐसा रूप देखकर हम डर से गए। बा तो रो पड़ी। थोड़े दिन हुए और अमु की बिमारी बढ़ी। बढ़ी तो इतनी बढ़ी कि एक दिन हमें रोता बिलखता छोड़ वह चल बसी। अमु के जाते ही घर में सन्नाटा छा गया। सनसनी टूट पड़ी। परिवार का जैसे मांगल्या मर गया।

बा की आज्ञा से तीसरे दिन मैं नर्मदा और ऑर नदी के संगम पर बसे चाणोद पर अमु के अस्थि लेकर जानेवाला था। बा और मैं अमु की पेटी की चीज़ें समेट रहे थे। उसमें से उसकी शादी के वक़्त की सौभाग्य चुनरी की गिरह से मशरू की थैली निकली। मैंने खोलकर देखा तो अंदर वे पांच संगमरमर के कुके ठिठुरकर पड़े थे। उन कुकों को देखर मेरे से न रोया गया, न ही बोला गया। बा कुके देखकर फिर मुझे देखती रही। देखते देखते देख न सकी इसलिए बाँह में भर लिया। बा की गोद में हृदय पिघल गया।

सोमनाथ की ओर से बहती आती नर्मदा से करनाळी और मांडवी के बीच जहाँ ऑर नदी मिलती है उस संगम की ओर मेरी नौका जा रही है। हाथ में अमु के अस्थि की थैली है। मेरी जेब में पाँचीका की मशरू की थैली पड़ी है और मेरे अंतर में अमु की स्मृति ज़िंदा पड़ी है। अचानक माझी ने कहा: ‘भाई, यह ऑरसंगम।’ मैंने अस्थि की थैली पानी में रखी। जी तो न चला पर पाँचीका वाली मशरू की थैली भी पानी में बहा दी। अमु के अस्थि और संगमरमर के पाँचीके पानी में बहाए उतने में लावण्य और लज्जाभरे उसके नैन, धनुष्याकृति भ्रमरों से छाए हुए मेरे सामने हंस पड़े!

– किशनसिंह चावड़ा (1904 – 1979)


(१) बा – गुजरात में आज से दो पीढ़ी पहले तक माँ को ‘बा’ कहकर संबोधित किया जाता था। आज यह शब्द ‘दादी’ / नानी के सन्दर्भ में ज़्यादा इस्तेमाल होता है, पर आज भी कई समुदायों में माँ को बा कहने की प्रथा है ।

(२) पाँचीका – पाँचीका एक पुराना गुजराती खेल है जो कंचे से थोड़े बड़े पाँच पत्थरों को उछालकर खेला जाता है।नब्बे – दो हज़ार के दशक तक यह गाँवों और छोटे शहरों में कभी कभी खेला जाता था लेकिन अब शायद लुप्त हो रहा है। जिन पत्थरों से यह खेला जाता है उन पत्थरों को भी पाँचीका ही कहते हैं।

(३) कुका – पाँचीका के पत्थरों के लिए यह शब्द भी इस्तेमाल होता है।

(४) मशरू – एक प्रकार का रेशमी कपड़ा

(५) पीठी – उत्तर भारत में शादी से पहले हल्दी लगाने की विधि को गुजरात में इस नाम से जाना जाता है। पीठी में हल्दी के अलावा चंदन, गुलाबजल, बादाम तेल इत्यादि का भी प्रयोग होता है।

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