दोमानिको

चन्द्रकान्त बक्षी

उन्नीसवी सदी के दूसरे या तीसरे दशक का समय था जब देश की अंधाधुंध अवस्था ने नक़्शे पर अलग अलग रंग भरने शुरू कर दिए थे। मराठा पेशवाई का सूरज डूब चुका था और बाजीराव ने अंग्रेज़ मालिकी स्वीकार कर ली थी।

मैसूर में सुलतान टीपू का क़त्ल हुए को भी एक पीढ़ी गुज़र चुकी थी। मध्य भारत की स्थिति अत्यंत धुंधली थी। सैन्य से फ़रार हुए सिपाहिओं ने लूट और मुख्य रास्तों पर हत्याओं को धार्मिक स्वरूप दे दिया था।

ठग स्त्री-पुरुष-बच्चों की हर साल हज़ारों की तादाद में ठंडे कलेजे से, सिफत से सफाई कर रहे थे। तंबुओं के लिए लकड़ियाँ गाड़नेवाले चोर बन गए थे और उनका क्रूर दौर-ए-सितम बेरोकटोक चल रहा था। अवध का अंतिम मुस्लिम गढ़ खंडरनुमा खड़ा था। उत्तर में नेपाल परास्त हो चुका था।

पंजाब के सीख मिसलदारों की जगह एक आँखवाला रणजीतसिंह फैल रहा था। सिंधु के पार बेशुमार सरहदी जातियाँ थी और आरपार दुर्रानी के वारिस अफ़ग़ान थे। देशभर में सतिओं को जलाया जा रहा था, फ्रेंच तोपची सेना तैयार कर रहे थे।

अंग्रेज़ इन्फंट्री समग्र उत्तर भारत के ऊपर फुंक चुकी थी और राजधानी कलकत्ता में एक नए धर्म – ब्रह्मसमाज का स्थापक राम मोहनराय स्पेन की प्रजा को संविधान मिला उस ख़ुशी में टाउन हॉल में नए विचारों, नई राजनीति का प्रचार कर रहा था। कर्नल स्लीमन ने ठगों की समस्या पर अभ्यास शुरू किया था और ठगों को नामशेष करने के कदम उठाए थे।

उस वक़्त बिहार से होकर बंगाल में प्रवेश कर सैंकड़ों धाराओं में टूटती गंगा पर नदी के ठगों की नई टोलियाँ छह्न रूप से ठगी करतीं थीं। तब उन्नीसवी सदी के दूसरे-तीसरे दशक का समय था। तब लालपुरा की गंगा के किनारे ठहराई हुई नावों के पास एक वृद्धा और एक जवान, जो उसका पुत्र लगता था, आए, और माझिओं की और देखते हुए पूछे: ‘मोकामा कौन जाएगा?’

‘कहाँ जाना है माँजी?’ एक माझी ने पूछा।

‘मोकामा घाट।’

माझी बैठा था, प्याज़ के कतरे और मिर्च की कतरिओं का एक छोटा ढेर कांसे के बर्तन में पड़ा था। खड़े होकर तार पर लटकती हुई एक मैली लुंगी के कतरे से हाथ पोंछकर वह नैया के किनारे पर आया। वृद्धा और जवान को ध्यान से देखकर माझी बोला – ‘ले जाऊँगा।’

पीछे से ढलते सूर्य की लालिमा में माझी का ऊपर से खुला देह लाल-लाल चमक रहा था और नौकाएँ घिरती परछाइओं में और बड़ी, और पानी और गहरा लग रहा था। पीछे एक पुरानी मस्जिद थी।

पूर्व में सर्दी की शामें जल्दी ढ़लती थीं। बारिश हफ्ते पहले ख़त्म हुई थी। दोपहर को सख्त धूप गिरती थी। किसान कहते कि वर्षा में उगी हुई फसल पकाने के लिए यह गर्मी अच्छी है, फसलें भरपूर पकेंगीं। सुबह नए सवेरे की छाँह में ठण्ड की चमक थी। देखते ही देखते कुल्ला करके हाथ-मुँह देखकर नमाज़ पढ़ने तक में ही शाम नदी के दोनों किनारों पर जम गई थी। बीच में डूबती धूप पानी की सतह पर कुछ समय तैर रही थी।

‘कितना समय लगेगा?’ जवान ने पूछा।

माझी ने कहा, देर रात चाँद सर पर आएगा तब हम अपने मोकामा पर पहुँच जाएंगे। माझी समझ गया कि प्रवासिओं का इतनी शाम और देर रात को सफ़र करने का कुछ ख़ास प्रयोजन था।

वृद्धा और जवान आपस में ही कुछ गुफ्तगू करने लगे। थोड़ी देर माझी दोनों को फुसफुसाते देखता रहा फिर बोला, ‘एक ही टाका लूंगा दोनों का।’

‘टाका के बारे में हम नहीं सोच रहे।’

‘फिर?’

‘आज-कल नदी पर ठगी बहुत होती है और वक़्त रात का है। मैं अपनी माँ के साथ जा रहा हूँ और …’ जवान आदमी बोला, ‘अभी निकले बिना चलेगा नहीं।’

माझी खिलखिलाकर हँसा। उसके खुले देह पर माँसपेशियाँ थिरक गईं। रक्त संध्या में माझी के खुले दांत भयंकर और खूबसूरत, दोनों लग रहे थे। आसपास लगभग चिपककर एक-दो नावें पड़ी थीं।

‘मैं हूँ फिर आपको घबराना क्या?’ माझी सांत्वना देते बोला, ‘मैं माल भरकर जाता हूँ, लाता हूँ। वाराणसी तक मेरी नौका जाती है। अभी तक किसी ठग की भेंट नहीं हुई। जिस दिन नदी पर कोई ठग मिलेगा उस दिन गठरी फेंककर उसे कुत्ते की तरह गठरी में भर लूंगा। आप दोनों बिलकुल घबराइए नहीं।’

जवान देखता रहा, ‘माझी, आपको पता नहीं। मोकामा गंगा पर एक नया समुद्री डाकू जन्मा है। उसका नाम दोमानिको है। पूरा किनारा उसके नाम से काँपता है। सिर्फ कंपनी सरकार के जहाज़ उससे घबराते नहीं और वह कंपनी सरकार के जहाज़ लूटता नहीं।’

‘मैंने तो उसका नाम भी नहीं सुना। नाम क्या बताया आपने?’ माझी ने पूछा।

‘दोमानिको’

माझी के चेहरे पर आश्चर्य झलक उठा।

‘बंगाली है?’

‘नहीं, वह है अरबी समंदर के मालद्वीप का। बीच में एक फिरंगी व्यापारी के जहाज़ पर काम करता था।’

‘नदी पर ठगी कब से शुरू की?’

‘पता नहीं।’ जवान बोलता रहा, ‘पर आदमी बड़ा खतरनाक है और आपने उसका नाम भी नहीं सुना? गंगा में कितने वक़्त से नाव चला रहे हैं?’

‘छः वर्ष हो गए। पहले मेरा भाई चलाता था पर उसे खून की संग्रहणी हो गई और मर गया। तब से यह नाव मैं घुमाता हूँ।’माझी ने ग़मगीन स्वर में कहा, फिर उसने स्वर बदल दिया, ‘आइए माँजी, चिंता मत कीजिए। मैं वाराणसी से बहुत कपड़ा लाता हूँ मेरी नाव में। ढाका से मलमल भी लाता हूँ। कोई डर नहीं मेरी नौका में, और आपके पास लूटने के लिए होगा क्या?’

वृद्धा चुप रही। जवान ने वृद्धा की ओर देखा, फिर माझी की ओर। फिर हिचकिचाते हुए कहा, ‘हाँ …’ क्षणार्ध रुककर कहा, ‘हमारे पास लूटने को होगा क्या?’

वृद्धा को नौका में चढ़ाकर जवान जूट की खाली थैलिओं का बंडल लेकर नौका में आ गया। माझी ने रस्सियाँ खोलकर पतवार चढ़ाई। बरसात के बाद के प्रवास का मौसम पुरबहार में शुरू होने को अभी आठ – दस दिन बाकी थे और अभी कृष्णपक्ष चल रहा था। चांदनी हो तब नदी का सफ़र ज़्यादा अनुकूल रहता था। अंधकार में लोग कम सफ़र करते थे। अब बारिश रुकने से रास्ते खुलने लगे थे फिर भी नदिओं में पानी छलक गए थे।

नाव की पतवार में हवा भर गई, पीछे बैठा हुआ एक इन्सान दिशा बताने लगा, नाव किनारे से पानी के मध्य की ओर खिसकने लगी।

‘क्या नाम है आपका?’ जवान ने पूछा।

‘मेरा नाम?’ माझी को आश्चर्य हुआ, फिर वह बोला, कुछ अनिच्छा से – ‘नौनिहालसिंघ’.

‘नौनिहालसिंघ! आपने दोमानिको को देखा है?’ जवान ने पूछा।

‘मैंने तो उसका नाम भी आप से सुना।’

माझी नौनिहालसिंघ ने पानी में थूंककर नाव प्रवाह में ली।

*

नाव प्रवाह की दिशा में आ गई। शाम के अंधेरे ने पानी को वज़नदार और काला बना दिया। माझी के सहायक ने नाव के मध्य में आकर अंदर उतारकर लालटेन जलाया। फिर वह लालटेन लेकर बाहर आया और लालटेन को कड़े पर लटकाकर वह फिर से नौका के दूसरे छोर पर चला गया। वह पतला, छरहरा लड़का था और बचपन से ही नदी को जानता हो वैसे उसके हावभाव थे।

अंधेरा बढ़ता चला और जैसे नौका नदी के बीच में आती गई वैसे वैसे किनारे की आवाज़ें दूर होती अश्राव्य हो गईं।खुले किनारे का दृश्य लगभग अदृश्य होने लगा। नदी के चौड़े फैलाव पर बिना चंद्र के आसमान का अंधकार ढँक गया था।

आसपास नावों का आवागमन बंद था और नदी में नयी बारिश का और उभरी हुई छोटी छोटी नदिओं की रेल का पानी खूब तेज़ी से बह रहा था। जवान ने देखा कि नदी ऊपर के चढ़ाव में कोई तूफ़ान मचाकर आई हो ऐसा लग रहा था, क्यों कि पेड़ों की टूटी टहनियाँ, डालियाँ-पत्ते, कभी एकाधे जानवर की दुर्गंध देती हुई लाश भी पानी के तेज़ प्रवाह में, लालटेन के प्रकाश में बहती दिखाई दे रही थी।

फिर उसे ख़याल आया, मोकामा के पास तो कहा जाता था कि, नदी में चक्रवात होता है, और साल में एक बार यहाँ अंधेरी रात में नदी एक भोग लेती है – बरसात के बाद के प्रवासिओं में से। यह ख़याल आते ही जवान को मन ही मन में खूब हँसी भी आई – वह, और नदी के भोग के बारे में सोच रहा था! उसको लगा कि शायद वृद्धा साथ थी और वह बारिश के बाद सफ़र कर रहा था इसी लिए उसको ऐसे ख़याल आ रहे थे।

‘आप लोग कहाँ तक जा रहे हैं?’ जवान ने माझी को पूछा।

‘बरसात में किनारे किनारे ही नाव खेते रहते हैं, क्योंकि बाढ़ आनी होती है तब बहुत बार जान का ख़तरा होता है।’

‘बाढ़ में क्या होता है?’ जवान ने पूछा।

‘अगर नौका नदी के बीच में हो तो उलट जाती है। किनारे की ओर हो तो पानी उसे पत्थरों के ऊपर फेंक देता है।’ नौनिहालसिंघ बोलता गया। उसने वृद्धा की ओर देखा फिर जवान की ओर। ‘आपने नदी का सफ़र नहीं किया? माँजी ने तो किया होगा।’

‘हाँ।’ जवान ने कहा, ‘मेरी माँ नाव पर गंगा पर बहुत घूमी है, पर मैं नदी के रस्ते से ज़्यादा प्रवास नहीं करता। छोटा था तब माँ के साथ गया था बस वही। और भी एक बात है।’ जवान ने दूर बैठे हुए सहायक की ओर देखा, वह सुन न सके उतना दूर था। ‘दूसरी बात यह है कि ज़मीन पर ठग मिले तो सामना भी कर सकते हैं।

हम दौड़ सकते हैं, हथियार इस्तेमाल कर सकते हैं। नदी पर ठग मिल जाए तो कोई क्या ही कर सकता है? जाएगा कहाँ दौड़कर? और नौका तो उसकी होती है – इसी लिए मुझे नदीमार्ग पसंद नहीं। पर अभी बरसात की वजह से रास्ते बंद हैं और काफ़िले शुरू होने में अभी पंद्रह दिन की देर है इसी लिए हमको नदी से मोकामा घाट जाना पड़ रहा है, वरना तो मैं ज़मीन के रास्ते जाने में मानता हूँ।’

माझी नौनिहालसिंघ कुछ बोला नहीं। चौकोर पतवार में हवा भर गई थी और नौका बराबर दिशा पकड़कर तेज़ गति से बह रही थी। कड़े में लटकाया हुआ लालटेन सिर्फ हिलता और ज़ंग लगे कड़े से बीच बीच में हवा – प्रतिहवा तेज़ बह जाए तब कड़कड़ आवाज़ आ जाती जो रात की शांति में और बड़ी लगती थी। पानी पर टूट- टूटकर सरकते लालटेन के प्रकाश के टुकड़े और पानी दबाकर गोल लय में घुमड़ती, सहायक की पतवार की भीनी आवाज़ों के सिवा रात की ठंडी शांति में ख़ास कोई खलल नहीं था।

नौनिहालसिंघ ने पूछा, ‘आपने दोमानिको को देखा है?’

जवान माझी की ओर देखता रहा। वृद्धा ने भी सिर ऊपर कर माझी को देखा। उसकी उनिंदी, लगभग झपकी खाई हुई आंखें खुली। वृद्धा को रात में ज़्यादा दिखता भी नहीं था पर उसने कान से प्रश्न सुना था और दोमानिको शब्द कान खोलदेनेवाला था।

‘हाँ एक बार। जवान ने कहा।’

‘कब?’ नौनिहालसिंघ ने पूछा।

‘मैंने एक बार सालों पहले उसे एक अदालत में देखा था। गवाही देने आया था – तब उसने नदी पर लूट शुरू नहीं की थी। मुकद्दमा ख़तम होने के बाद वह नदी का ठग बना। पर मुझे आश्चर्य इस बात का है कि आपने दोमनिको का नाम नहीं सुना।’

‘मेरी अभी उसके साथ मुलाक़ात नहीं हुई।’

‘हम कहाँ तक पहुंचे माझी?’ वृद्धा ने पहली बार प्रश्न पूछा।

‘माँजी, चांद सिर पर आएगा तब हम मोकामा घाट पर पहुंच जाएंगे।’

‘अभी अंधियारा है इसलिए चांद उगेगा ही बहुत देर से।’ जवान बोला।

‘आपका इतनी देर से कैसे जाना हुआ? सुबह चले होते तो शाम तक पहुँच जाते।’

फिर माझी बोला, ‘पर रात को जल्दी पहुँच सकते हैं। दिन में पानी से ज़्यादा समय लगता है।’

‘अच्छा? हमको पता होता तो सुबह निकलते, पर माँ ने ज़िद की कि अभी निकालना है।’

‘यात्रा के लिए तो नहीं ही जा रहे होंगे?’

‘नहीं। जवान बताने लगा, ‘मेरे मामा मोकामा में गुज़र गए हैं – मेरी माँ के भाई।’ माँ ने ज़िद की कि मुझे अभी निकालना है। इसलिए अभी निकले, और मैंने कहा भी कि नदी पर ठंडी हवा चल रही होगी। रात को तो ठंडी भी खूब लगेगी। पर घुड़सवार शाम को कह गया ‘माँ बोली मैं अब लालपुरा में रह नहीं पाऊंगी। मुझे अपने भाई के घर ही जाना है।

मैंने कहा, नदी पर अब सलामती नहीं रही। हम सुबह निकलेंगे पर उन्होंने माना नहीं इसलिए मैंने ज़ोर ज़बरदस्ती करके माँ को चद्दर में लपेटा और ऊपर कंबल लापेटाया। सिर बंधा लिया। सिर में या कान में नदी की हवा घुस जाएगी तो परेशानी हो जाएगी। इस उम्र में एकाधा रोग घर कर जाए तो चिता तक साथ आए – ‘

‘हाँ हाँ,’ नौनिहालसिंघ बोलने लगा, ‘सही बात है।’ उसने वृद्धा के सामने देखा, पूरे शरीर और सिर पर कंबल लिपटी हुई वृद्धा का सिर्फ़ चेहरा दिख रहा था झुर्रियों वाला। वह अंधकार में बैठी पर रात को उसको ज़्यादा दिखता नहीं था और प्रकाश भी सहन नहीं हो रहा था। ‘माँजी को किसी बात की चिंता करने की ज़रूरत नहीं। चांद सिर पर आने से पहले तो हम मोकामा पहुंच जाएंगे, क्योंकि हवा तेज़ है और प्रवाह सीधा है।’

फिर नौनिहालसिंघ ने नौका की गति बढ़ाई और कहा, ‘ कोई लुटारों की चिंता मत कीजिए। लुटारों के जहाज़ों से भी तेज़ में अपनी नौकाएं लेकर जाता हूं। ऐसी हवा हो और नदी साफ हो तो – ‘

देर रात को मोकामा के घाट का लहराता प्रकाश दिखा। नौनिहालसिंघ की नौका किनारे के पास आई और घाट से बराबर लगी। पहले वृद्धा को सम्हालकर उतारकर जवान उतरा। सहारा देकर, नौनिहालसिंघ का शुक्र अदाकार दोनों अदृश्य हो गए – अंधकारमय पिछली रात में सोए हुए रास्तों पर।

नौनिहालसिंघ ने आराम से शरीर को लंबा किया। सहायक ने लालटेन बुझा दिया, फिर वह पास आया – ‘ भैया’ सहायक ने कहा,’ मैंने दोमानिको का नाम सुना है। वह गंगाकिनारे सबसे बड़ा डाकु है। ‘

नौनिहालसिंघ हँसा ‘नाम तो मैंने भी सुना है, पर अगर ऐसा बोलता तो ये दोनों बेचारे घबरा जाते और आते नहीं। या फिर नौका बीच में ही किनारे करनी पड़ती।’ रात का समय और अंधेरा है इसलिए डर भी ज़्यादा लगता है। बाकी दोमानिको तो गंगा का राजा है। ज़मीन पर कंपनी सरकार की हुकूमत चलती है, पानी पर दोमानिको की।’

‘फ़िलहाल वह काफ़ी समय से शांत है।’

‘होगा। तू भी शांत हो जा। सो जा। सुबह धूप होते उठेंगे।’

दोनों आदमी लिहाफ़ ओढ़कर नदी की हवा में नाव की पट्टियों पर ही सो गए – पर सोने से पहले सहायक ने पतवार उतारकर बांध ली।

*

धूप में घाट पर कंपनी सरकार का एक जहाज़ आया तब सोए हुए माझी हड़बड़ाकर जाग गए। जागे हुए सतर्क हो गए।

जहाज़ पास लाकर एक फिरंगी जैसे दिखते आदमी ने पूछा ‘रात को लालपुर से एक बूढ़ी औरत और एक मर्द को नाव में कौन लाया था?’

नौनिहाल सिंघ बोला ‘क्यों, मैं लाया था।’

‘कहाँ गए वे?’

‘सामने अंधेरा था। घाट से उतर कर चले गए।’

‘कितनी देर हुई?’

‘वे तो आधी रात को गए। क्यों साहब?’

फिरंगी के मुंह पर लालिमा की झलक उभर आई। ‘माझी आपको पता है आपकी नौका में कौन था?’

‘कौन?’

‘दोमानिको। वह छूटकर भागा है और इस ओर आ गया है।’ फिरंगी बोला।

माझी नौनिहाल सिंघ के चेहरे पर कालिमा छा गई। जिस जवान के साथ उसने रातभर बात की थी वही मशहूर ठग गंगा का राजा दोमानिको था! एक कंपन सा आ गया।

‘आप तकदीरवाले हो माझी, बच गए। नहीं तो आधी नदी में ही वह आप दोनों को काटकर फेंक देता। वह बूढ़ी औरत आपने देखी न, वह औरत नहीं थी। वही दोमानिको ठग था!’ और फिरंगी बोला ‘उसके साथ एक जवान शागिर्द भी था।’

धूप में ही नौनिहालसिंघ को चक्कर आ गए।

-चन्द्रकान्त बक्षी (1932 – 2006)

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जटा हलकारा

ज़वेरचंद मेघाणी

स्त्रैण आदमी की घर-नारी जैसी सोगभरी शाम ढल रही थी। अगले जन्म की आशा जैसा कोई कोई तारा चमक रहा था। कृष्णपक्ष के दिन थे।

ऐसी ढलती शाम के समय आंबला गाँव की चौपाल पर ठाकुर की आरती की बाट देखी जा रही है। छोटे छोटे, आधे नंगे बच्चों की भीड़ जमी पड़ी है। किसी के हाथ में चाँद जैसा चमकीला कांसे का घड़ियाल झूल रहा है; और कोई बड़े नगाड़े पर दंड के घाव करने की राह देख रहा है। शक्कर की एक मिश्री, नारियल के दो टुकड़े और तुलसी के पत्ते की सुगंधवाले मीठे चरणामृत की हरेक अंजली बांटे जाएंगे इस आशा से बालक नाच रहे हैं। बाबाजी ने अभी ठाकुरद्वार के दरवाज़े खोले नहीं। कुँए के तट पर बाबाजी स्नान कर रहे हैं।

बड़े भी नन्हे बच्चों को कमर पे बिठाकर आरती की राह देखते चौखट की कोर पर बैठे हैं। कोई कुछ बोल नहीं रहा। मन अपनेआप गहरा जाए ऐसी शाम ढल रही है।

‘आज तो संध्या बिलकुल खिली नहीं ‘। एक आदमी ने संध्या का न खिलना जैसे बड़ा दुःख हो ऐसी आवाज़ में हल्के से सुनाया।

‘ दृश्य ही जैसे मुरझा गया है ‘ दूसरे ने अफ़सोस में अपने शब्द जोड़े।

‘ कलयुग! कलयुग! रातें अब कलयुग में समझ नहीं आती, भाई! कहाँ से समझ आएंगी! ‘ तीसरा बोला।

‘ और ठाकुरजी की मूर्ती का मुख भी आज कल कितना खिन्न दिखता है। दस वर्ष पहले तो कितना प्रकाशित हुआ करता  था!’  चौथे ने कहा।

चौपाल में धीमी आवाज़ में अधखुली आँखों से बुड्ढे ऐसी बातों पर लगे हैं, उस समय आंबला गाँव के बाज़ार से होते दो मनुष्य चलते आ रहे हैं: आगे आदमी और पीछे औरत है। आदमी की कमर पर तलवार और हाथ में डंडा है। औरत के सर पर एक बड़ी गठरी है। पुरुष तो एकदम पहचाना नहीं जा रहा था; पर राजपूतानी की पहचान उसके पैरों की गति से और घेरदार लहंगे से लिपटी ओढ़नी से छुपी न रही।

राजपूत ने जब भीड़ को राम-राम न किया तब गाँवलोक को लगा के कोई अनजाने गाँव का पथिक होगा। लोगों ने उसे बारी बारी से कहा ‘ भाई, राम-राम ‘।

‘राम!’ रूखा जवाब देकर मुसाफ़िर जल्दी आगे चल दिया। पीछे अपने पैर ढँकती बीवी चलती जा रही है।

एकदूसरे के मुँह देखकर भीड़ से कुछ लोगों ने आवाज़ दी: ‘अरे ठाकुर, ऐसे कहाँ तक जाना है ?’

‘दूर तक।’ जवाब मिला।

‘ फिर तो भाई रात यहीं रुक जाओ न? ‘

‘ क्यों? क्यों परेशानी उठानी है, भाई ? ‘ मुसाफ़िर ने कतराकर टेढ़ी जीभ चलाई।

‘और तो कुछ नहीं, पर देर बहुत हो गई है, और साथ में औरत है। तो अँधेरे में ख़ामख़ा जोख़िम क्यों उठाना ? और यहाँ खाना सबके लिए बना है: हम सब भाई ही हैं। तो आप भी रुक जाइए भाई।’

मुसाफ़िर ने जवाब दिया, ‘बाहुबल नापकर ही सफर कर रहा हूँ, ठाकुरों! मर्दो को डर काहे का! अभी तक तो कोई बेहतर बलिया देखा नहीं।’

आग्रह करनेवाले गाँव के लोगों के मुँह गिर गए। किसीने कहा ‘ ठीक है! मरने दो उसे!’

राजपूत और राजपूतानी चल दिए।

**

बन बीच से चले जा रहे हैं। दिन ढल गया है। दूर दूर से ठाकुर की आरती की खनक सुनाई पड़ रही है। भूतावाल नाचने निकले हों ऐसे दूर गाँव के झुण्ड में दिए टिमटिमाने लगे। अँधेरे में जैसे कुछ देख रहे हों और वाचा से उस दृश्य की बात समझाने का यत्न कर रहे हों वैसे नगरद्वार के कुत्ते भोंक रहे हैं।

मुसाफिरों ने अचानक पीछे झुनझुने की आवाज़ सुनी। औरत पीछे नज़र घुमाए उतने में  सणोसरा गाँव का हलकारा काँधे पर डाक की थैली रखकर, हाथमें खनकता भाला लेकर अड़बंग जैसा चला आ रहा है। कमर पर नई सजाई हुई, फटी म्यानवाली तलवार टंगी है। दुनिया के शुभ-अशुभ की गठरी सर पर उठाकर जटा हलकारा चल निकला है। कितनी परदेस गए बेटों की बुढ़ियाएँ और कितने समंदरी व्यापार करते पतियों की पत्नियाँ महिने – छः महिने कागज़ के टुकड़े की राह देखती जग रही होंगी ऐसी समझ से नहीं, पर देर होगी तो पगार कटेगी उसके डर से जटा हलकारा दौड़ता जा रहा है। भाले के झूमर उसके अँधेरी रात के एकांत के भाईबंधु बने हैं।

देखते ही देखते हलकारा पीछे चलती राजपूतानी के साथ हो गया। दोनों की जाँच पड़ताल हुई। स्त्री का पीहर सणोसरा में था, इसलिए जटे को सणोसरा से आता देखकर माँ-बाप की खबर पूछने लगी। पीहर से आनेवाला अनजान आदमी भी स्त्रीज़ात के मन सगे भाई जैसा होता है। बातें करते करते दोनों साथ चलने लगे।

राजपूत थोड़े कदम आगे चल रहा था। राजपूतानी को ज़रा पीछे चलती देखकर उसने पीछे देखा। परपुरुष के साथ बातें करती औरत को दो-चार तीखे बोल कहकर धमकाया।

औरत ने कहा: ‘मेरे पीहर का हलकारा है , मेरा भाई है। ‘

‘ बड़ा देखा तुम्हारा भाई ! चुपचाप चली आ ! और महाराज , आप भी ज़रा इन्सान देखकर बात कीजिये !’ बोलकर राजपूत ने जटे को फटकारा।

‘ जी बापू !’ कहकर जटे ने अपनी गति कम की। एक क्षेत्र दूर रखकर जटा चलने लगा। जहाँ राजपूत युगल दूर नहर में उतरता है, उतने में एकसाथ बारह लोगोंने चुनौती दी ‘खबरदार, तलवारें गिरा दो!’

राजपूत के मुँह से दो-चार गालियाँ निकल गईं। पर म्यान से तलवार न निकल सकी। राह देखते बैठे आंबला गाँव के कोल्हिओं ने आकर उसे रस्सी से बाँधा, बाँधकर दूर लुढ़का दिया।

‘ ए औरत, अपने गहने उतारने लग ।’ लुटेरे ने औरत को कहा।

अनाथ राजपूतानीने अंग से एक एक गहना उतारना शुरू किया। उसके हाथ, पैर , छाती वगैरह अंग दिखने लगे। उसकी सुरेख, सुन्दर काया ने कोल्हिओं की आँखों में कामना की आग जलाई। युवान कोल्हिओं ने पहले तो ज़बानी मज़ाक शुरू किया। पर जब कोल्ही उसके अंग को छूने नज़दीक आने लगे, तब ज़हरीली नागिन की तरह फूँकार कर राजपूतानी खड़ी हो गई।

‘ अबे, गिराओ उस सती की बच्ची को !’ कोल्हीओं ने आवाज़ लगाई।

अंधेरे में औरत ने आसमान की ओर देखा। उतने में जटा के झूमर झनके। ‘ओ  जटाभाई!’ औरत ने चीख लगाई: ‘दौड़!’ ‘खबरदार! कौन है वहाँ ?’ चिल्लाता हुआ जटा तलवार खींचकर वहाँ पहुँच गया। बारह कोल्हि डंडा लेकर जटा के ऊपर टूट पड़े। जटे ने तलवार चलाई।  सात कोल्हिओं के प्राण लिए। खुदके सर पर डंडे बरस रहे हैं , पर जटा को तब घाव महसूस नहीं हुए। औरत ने चिल्लमचिल्ली कर दी। डर के मारे बाकी के कोल्हि भाग गए, उसके बाद जटा चक्कर खाकर गिर पड़ा।

औरत ने अपने आदमी को मुक्त किया। उठकर तुरंत राजपूत बोलता है, ‘चलो चलते हैं।’

‘ चलेंगे कहाँ? जनाने! शर्म नहीं आती? पाँच कदम साथ चलनेवाला वह ब्राह्मण पलभर की पहचान में ही मेरी आबरू के लिए मरा पड़ा है; और तु – मेरे सब जन्मों के साथी – तुमको ज़िंदगी प्यारी हो चली! जा ठाकुर, अपने रस्ते। अब अपना – काग और हंस का – साथ कहाँ से होगा ? अब तो इस उद्धारक ब्राह्मण की चिता में ही मैं लेटूंगी। ‘

‘ तेरे जैसी बहुत मिल जाएंगी। ‘ कहकर आदमी चल दिया।

जटा के शव को गोद में लेकर राजपूतानी प्रभात तक अंधकार में भयंकर बंजर में बैठी रही। सवेरे आसपास से लकड़ी चुनकर चिता सुलगाकर, शव को गोद में लेकर खुद चढ़ गई; आग भड़काई। दोनों जलकर ख़ाक हो गए। फिर कायर पति की सती स्त्री जैसी शोकातुर सांझ जब ढलने लगी तब चिता के अंगारे धीमी ज्योति से टिमटिमा रहे थे।

आंबला और रामधारी के बीच एक नहर में आज भी जटा का स्मारक और सती की पालि विद्यमान है।

– झवेरचंद मेघाणी (1896 – 1947)

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જાપાન

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છેલ્લા બે વર્ષથી હું અમેરિકા અને કૅનેડામાં અલગ અલગ સ્થળોએ પૂરજોશમાં ફરી રહી છું. પણ, આ બંનેમાંથી એક પણ દેશનાં એક પણ સ્થળની મુલાકાતનાં અનુભવ ક્યારેય એટલા અલગ નહોતાં કે તેનાં વિષે લખવાનું મન થાય. મોન્ટ્રિયાલની છેલ્લી પોસ્ટ પછી હું લંડન, વાનકુવર, હ્યુસ્ટન (ટેક્સસ), ન્યૂ યોર્ક, ઓરલાન્ડો (ડિઝની વર્લ્ડ અને હેરી પોટર વર્લ્ડ) અને સિયાટલ ફરી. એ ઉપરાંત અમુક રોડ ટ્રિપ્સ પણ કરી. ફક્ત સ્થળો અને બેકગ્રાઉન્ડ બદલાતાં રહેતાં. તેની ફીલ હંમેશા સમાન રહેતી. નાનું શહેર કે ગામ હોય તો થોડું ઘણું જોવા કરવાનું, થોડી નેચરલ બ્યૂટી ને એવું બધું અને મોટું શહેર હોય તો એ જ બધું – કલા કારીગરી, નાઇટલાઇફ અને શહેરનાં જાણીતાં લેન્ડમાર્ક અને અટ્રેક્શન્સ. આ બધી ટ્રિપ લગભગ પાંચ દિવસ કરતાં ઓછાં સમય માટે થતી. જેમ રામ લીલા જોઈને આપણને થયું હતું કે, આનાં કરતાં તો દીપિકા પાદુકોણનો ચણિયા-ચોલી ફોટોશૂટ જોઈ લીધો હોત, તેવી જ લાગણી તમને એ શહેરો પરની પોસ્ટ્સ વાંચીને આવત.

ટ્રાવેલિંગની એક ઘરેડ પડી ગઈ હતી. એ ત્યારે બદલાઈ જ્યારે મેં મારી છેલ્લી જૉબ બદલી જેનાં માટે વિઝા અપ્રૂવ કરાવવા મારે અમેરિકાથી બહાર જવું પડે તેમ હતું. પહેલાં તો મેં જેટલૅગ સહન ન કરવો પડે એ માટે કૅનેડા કે મેક્સિકો જઈને કામ પતાવવાનું નક્કી કર્યું. જ્યારથી આ ટ્રિપની વાત થતી હતી ત્યારથી હું મારાં પાર્ટનર સેમને કહેતી હતી કે, મારી સાથે ચાલ. પણ, તેનું કઈં નક્કી નહોતું. એક વખત તેણે હસતાં હસતાં કહ્યું હતું કે, તું જાપાન જઈશ તો હું તારી સાથે આવીશ.

સમજો કે, આજે સોમવાર છે. પછીનાં અઠવાડિયે લૉન્ગ વીકેન્ડ છે એટલે ગુરૂ – શુક્ર રાજા છે અને બુધવાર આવતાં અઠવાડિયાનો કામનો છેલ્લો દિવસ છે. આજે મારો એક અગત્યનો કાગળ સહી થઈને આવી ગયો છે અને સરકારની એક વેબસાઈટ અનુસાર મને મેક્સિકોમાં આવતાં અઠવાડિયે અપોઈન્ટમેન્ટ મળી શકે તેમ છે. એટલે મેં મારા મેનેજરને કહ્યું છે કે, આવતાં બુધવારે મારાં કામનો છેલ્લો દિવસ હશે. હવે હું ખરેખર અપોઈન્ટમેન્ટ બુક કરવાનું શરુ કરું છું અને આ વેબસાઈટ પ્રમાણે મને મેક્સિકોમાં આવતાં મહિના સુધી કોઈ અપોઈન્ટમેન્ટ મળી શકે તેમ નથી. હું કૅનૅડાની તારીખો જોઉં છું અને મને ત્યાં આવતાં બે મહિના સુધી કઈં મળે તેમ નથી. સિડની પણ ત્રણ અઠવાડિયાની રાહ જોવી પડે તેમ છે. સોમવારની રાત પડે છે અને મને ત્રણમાંથી ક્યાંયે અપોઈન્ટમેન્ટ નથી મળતી. તો હું લંડન અને જાપાનની તારીખો જોઉં છું અને એ બંને જગ્યાએ મને 2-3 દિવસમાં અપોઈન્ટમેન્ટ્સ મળી શકે તેમ છે. મંગળવારે ફરીથી તારીખો જોઉં છું અને હજુ પણ તેમાં કોઈ જ ફેરફાર નથી થતો. હવે ખરેખર જાપાન કે લંડન જવાનું થાય તેવી શક્યતા હતી!

હજુ કંઇ નક્કી નહોતું પણ સેમે એ જાણતાં સાથે જ બુદ્ધિ દોડાવીને એ જ બપોરે જાપાનનાં વિઝા માટે અપ્લાય કરવા માટે કાગળ ભેગાં કર્યાં. ઍમ્બેસી સાડા ચારે બંધ થતી હતી અને તેની પાસે તેનાં મિત્ર આશુનું એડ્રેસ નહોતું જેની વિઝા અપ્લાય કરવા માટે તેને જરૂર હતી. જો એ ઍમ્બેસી બંધ થતાં પહેલાં અપ્લાય કરે તો તેને પાંચ દિવસ પછી તેનો પાસપોર્ટ પાછો મળે. જો ન કરી શકે તો તેને એક દિવસ વધારે રાહ જોવી પડે. મેં તેને એક રસ્તો એ સૂઝાડ્યો કે, કોઈ હોટેલનું ઍડ્રેસ એપ્લિકેશનમાં ભરી દે. પણ, બરાબર ચાર વાગ્યે આશુ ઊઠ્યો અને સેમની વિઝા એપ્લિકેશન મુકાઈ ગઈ! એ સાંજે તેનાં હાઉઝમેટ અને મારાં પણ મિત્ર – અભીએ અમને જણાવ્યું કે, એ પણ આવતાં અઠવાડિયે કામ માટે ટોક્યો જાય તેની પૂરી શક્યતા છે.

મંગળવારે રાત્રે અને બુધવારે દિવસે મને કંઇ જ જોવા કે બુક કરવાનો સમય નહોતો કારણ કે, કામ પર એક જરૂરી પ્રોજેક્ટ બુધવાર સાંજ સુધીમાં પતવાનો હતો એટલે એ ખતમ થયા પછી બુધવારે રાત્રે મેં ફરીથી તારીખો જોઈ અને અંતે ઓસાકા પર જ નમતું મૂક્યું. હવે એ અપોઈન્ટમેન્ટ માટે તમે પૈસા ન ભરો ત્યાં સુધી એ વેબસાઈટ તમને સૌથી પહેલી અવેલેબલ અપોઈન્ટમેન્ટ જ બતાવે, તેનાં પછીનું કૅલેન્ડર ન બતાવે અને એક વખત પૈસા ભર્યા પછી તમારે એ જ શહેરની એ જ એમ્બેસીમાં જવું પડે. મેં પૈસા ભરી દીધાં અને પછી જોયું તો ઓસાકાની આવતાં અઠવાડિયે મંગળવાર કે બુધવારની જ અપોઈન્ટમેન્ટ મળતી હતી. ગુરુ કે શુક્રની મળતી જ નહોતી. સમયનો ફરક વગેરે ઉમેરીને જોઈએ તો મારે બુધવારની અપોઈન્ટમેન્ટ માટે પણ સોમવારે તો નીકળવું જ પડે તેમ હતું. એ માટે મારે શુક્રવારે જ કામ પતાવવું પડે. અને ત્યાં સુધીમાં તો સેમનો પાસપોર્ટ પણ પાછો ન આવે. મને થયું માર્યાં! બુધવારની રાત તો થઈ પણ ગઈ હતી! હવે મારી પાસે બે ઓપ્શન હતાં. બેસ્ટ કેસમાં હું એ જ અઠવાડિયે કામ પતાવીને વીકેન્ડ પર જ નીકળી જાઉં અને પછીનાં અઠવાડિયે વિઝાનું બધું પતાવી દઉં અથવા એક અઠવાડિયા માટે મારી આખી પ્રોસેસ પાછળ ઠેલાય પણ મેનેજરને મેં શરૂઆતમાં જે શેડ્યુલ કહ્યું હતું એ જ શેડયુલ પર બધું પતે અને ત્યાં સુધીમાં સેમનો પાસપોર્ટ પણ પાછો આવી જાય પણ, એમ કરું તો હું નવું કામ શરૂ કરીને જે ક્રિસમસ બ્રેક લેવા ઈચ્છતી હતી એ ન લઈ શકું કારણ કે, નવા કામમાં પૂરતો સમય ન પસાર થયો હોય. મેં સેમને પૂછ્યું તો તેનો મત હતો કે, મારે તેનાં વિશે ન વિચારવું જોઈએ અને વહેલામાં વહેલું નીકળી જવું જોઈએ. રાત્રે બાર વાગ્યે મેં પહેલું કામ કર્યું મારા મેનેજરને મેસેજ કરવાનું. મેં તેને મારી પરિસ્થિતિ જણાવી અને પૂછ્યું કે, કામ પર કાલે કે પરમ દિવસે મારો છેલ્લો દિવસ હોય તો ચાલે? તેણે ધાર્યાં પ્રમાણે ગુરુવારે સવારે મને જણાવ્યું કે, મારે પોતાનાં માટે જે સૌથી સારું હોય એ જ કરવું અને તેનો મતલબ એવો હોય કે મારે આજે જ કામ છોડવું પડે તો તેમાં કોઈ વાંધો નહીં! બસ પછી તો એ જ દિવસે કામ પર બધો ખેલ આટોપીને મારી શનિવારની ટિકિટ પણ બુક થઈ ગઈ.

રાત્રે અમે મળ્યાં ત્યારે અભિએ અમને જણાવ્યું કે, તેનું આવતાં અઠવાડિયે ટોક્યો જવાનું પાક્કું થઈ ગયું. હવે અભી, હું, સેમનો ટોક્યો – નિવાસી મિત્ર આશુ (જે અભી અને મારો પણ મિત્ર બની ગયો હતો) અને તેની પત્ની શ્રી થોડાં તો થોડાં દિવસ પણ મળીને ટોક્યો જલસા કરવાનાં હતાં! મને પહેલેથી ખાતરી હતી કે, સેમ છેલ્લી ઘડીએ મગજ લડાવીને કઈંક ગોઠવી લેશે અને એવું જ થયું. તેણે પણ પોતાનો પ્લાન અંતે બનાવી જ લીધો.

ગુરુવારે મેં ટિકિટ બુક કરી અને શનિવારે હું પ્લેનમાં હતી. શુક્રવાર રાત સુધી મારી હોટેલ પણ બુક નહોતી થઇ. કારણ કે, બધાંનાં ફાઈનલ પ્લાન અમે શુક્રવાર સુધી નક્કી નહોતાં કર્યાં. અંતે નક્કી થયું કે, ઓસાકામાં હું રવિવારથી બુધવારની બપોર સુધી રહેવાની હતી. બુધવારે રાત્રે હું ટોક્યો પહોંચવાની હતી. સેમ ગુરુવારે બપોરે ટોક્યો લૅન્ડ થવાનો હતો અને અભી શુક્રવારે બપોરે. ત્યાર પછીનાં દસ દિવસ અમે થોડો સમય સાથે અને થોડો સમય અમારી રીતે અલગ ટ્રાવેલ કરવાનાં હતાં. આમ બહુ વખત પછી મને ટ્રાવેલિંગમાં એડવેન્ચર વાળી ફીલ આવી! :)

બાકીની વાત રાબેતા મુજબ to be continued …

તૈયારી

ઓસાકા, જાપાન

ગુરુવારે મેં તાબડતોબ મારું કામ આટોપ્યું. શુક્રવારે મેં નવી કંપનીનાં વકીલો પાસેથી મારાં વિઝા સંબંધી કાગળ એકઠાં કર્યાં અને ટ્રાવેલ સંબંધી થોડી ખરીદી કરી. એ આખું અઠવાડિયું ખૂબ પ્લાનિંગ અને દોડાદોડીમાં વીત્યું હતું એટલે નવી જગ્યાએ ટ્રાવેલ કરવાનો ઉત્સાહ જાણે મરી ગયો હતો. એટલે ચારેક વાગ્યા આસપાસ બધું બહારનું કામ પત્યા પછી જરા મૂડમાં આવવા માટે મેં પૅડિક્યોર કરાવ્યું અને પછી ઘરે પહોંચીને થોડું ઘણું પૅકિંગ કર્યું. પૅકિંગમાં જરા વિચારીને કરવું પડે તેમ હતું. મારે ફક્ત એક હૅન્ડ બૅગ લઇ જવી હતી જેથી જપાનમાં અંદર મુસાફરી કરવામાં સરળતા રહે અને મારે બધે બે-ત્રણ બૅગ ખેંચી ખેંચીને ન ફરવું પડે. જાપાનમાં હું કુલ પંદર દિવસ માટે રહેવાની હતી. ઓસાકા ચાર દિવસ અને પછી ટોક્યોમાં ઓછામાં ઓછા પાંચ દિવસ. એટલે ટોક્યોમાં ક્યારેક કપડાં ધોઈ શકાય એ ગણતરીએ મેં સાત દિવસનાં કપડાં લેવાનું નક્કી કર્યું. બે જીન્સ રિપીટ કરવાનાં અને પાંચ-છ જૂદા જૂદા ટી શર્ટ, લૅપટૉપ, ફોન અને નાની બૉટલોમાં થોડો નહાવા ધોવાનો સામાન બસ. એ રાત્રે અમે અમારાં જાપાન-નિવાસી મિત્ર આશુ અને તેની પત્ની સાથે ઓસાકા પછીનાં પ્લાન માટે વાત કરવી શરુ કરી. ત્યારે અમને જાપાન રેલ પાસ વિષે માહિતી મળી.

જાપાન રેલ પાસ (જે-રેલ પાસ) – ટૂરિસ્ટ માટે જાપાનની સરકારે આ પાસની યોજના કરી છે. તમે એક સમયે સાત દિવસ અથવા ચૌદ દિવસ માટે આ પાસ ખરીદી શકો. સાત દિવસ માટે ખરીદો તો લગભગ અઢીસો ડૉલર અને ચૌદ દિવસ માટે લગભગ સાડા ચારસો ડૉલરમાં આ પાસ મળે.એ પાસ સાથે તમે નિર્ધારિત સમય માટે ‘જાપાન રેલ (JR)’ દ્વારા સંચાલિત તમામ લોકલ ટ્રેન અને મોટાં ભાગની બુલેટ ટ્રેન (શિન્કાનસેન)માં કોઈ એક્સ્ટ્રા ચાર્જ વિના મુસાફરી કરી શકો. આ પાસ સાથે તમારે JR અને અમુક બુલેટ ટ્રેન્સની ટિકટ લેવા માટે અટકવું ન પડે. તમે એ બંનેનાં સ્ટેશન્સ પર ફક્ત તમારો પાસ દેખાડીને ફટાફટ આવ-જા કરી શકો. જાપાનમાં અંદર ફરવાનો સૌથી સરળ અને પ્રચલિત રસ્તો તેમની પબ્લિક ટ્રાન્સપોર્ટ સિસ્ટમ છે એટલે આ પાસ લેવાથી એક ટૂરિસ્ટ તરીકે મને ઘણો લાભ થાય. લાંબા સમય સુધી એવું હતું કે, આ પાસ તમને જાપાન સિવાયનાં દેશોમાં અમુક ટ્રાવેલ એજન્ટ્સ પાસેથી જ મળે. જાપાન પહોંચ્યા પછી એ પાસ મેળવવો એટલે લોઢાનાં ચણા ચાવવા જેવું કામ. ઓનલાઇન અમુક વેબસાઈટ પરથી એ પાસ મળે પણ એ તમારાં યુનાઇટેડ સ્ટેટ્સનાં એડ્રેસ પર જ પોસ્ટમાં આવે. તેની તત્કાલ ડીલીવરી પણ ઓછામાં ઓછા બે દિવસ પછી જ મળે.

મારા માટે એ પાસ મળી શકે તેનાં તમામ રસ્તા જાણે બંધ થઇ ગયા હતાં. શુક્રવારની રાત પડી ગઈ હતી અને શનિવારે અગિયાર વાગ્યાની તો મારી ફલાઇટ હતી. અમે જોયું તો એક લોકલ ટ્રાવેલ એજન્ટ જે જાપાન રેલ પાસ વેંચતો હતો, તેની ઓફિસ શનિવારે બંધ રહેતી હતી. સેમ મારા માટે પાસ લાવી શકે તેમ નહોતો કારણ કે, જાપાન પહોંચતાં સાથે જ ઍરપોર્ટ પર એ પાસ ઍક્ટિવેટ કરાવવો પડે જેનાં માટે મારાં પાસપૉર્ટની જરૂર પડે, જે તેની પાસે હોય નહીં. વળી શિન્કાનસેનની ઓસાકાથી ટોક્યો સુધીની એક મોંઘી મુસાફરી – જેનાં માટે મને આ પાસ કામ લાગે, એ તો મારે સેમનાં આવ્યાં પહેલાં જ કરવાની હતી. મને થયું મર્યા! મેં મારાં અમુક મિત્રોને આ વિષે વાત કરી. તેમાંનાં એકે મને એક વેબસાઈટ બતાવી જેનાં પરથી હું જાપાન રેલ પાસ ખરીદી શકું અને એ મને જાપાનમાં મારી પસંદગીની હૉટેલ પાર એ પાસની ડિલિવરી આપે. આ રસ્તો અમને સૌથી યોગ્ય લાગ્યો એટલે મેં તેનાં પરથી મારો પાસ લેવાનું શરુ કર્યું. ક્રેડિટ કાર્ડ ડીટેલ નાંખીને ખરીદી પૂર્ણ કર્યા પછી ફાઇનલ પેજ, જેનાં પર મને કન્ફર્મેશન મળવું જોઈએ એ પેજ પર મને 404 Error મળી.

મેં ઈ-મેલ ચેક કર્યો તો ત્યાં પણ કોઈ કન્ફર્મેશન નહોતું આવ્યું. એટલે મને થયું મારાં બ્રાઉઝરનાં ઍડ બ્લૉકર અને નોન-ટ્રેકર પ્લગિન ઘણી વખત થોડી બગવાળી વેબસાઈટ પર અમુક માહિતી અને સ્ક્રિપ્ટ્સ સરખી રીતે લોડ નથી કરતાં હોતાં. એટલે મેં મારાં ડીફોલ્ટ બ્રાઉઝરનાં બદલે એક અલગ બ્રાઉઝર પર ટિકિટ ખરીદવાનો પ્રયત્ન કર્યો. પણ કોઈ ફર્ક ન પડ્યો. પણ એ જ એરર આવી અને કોઈ કન્ફર્મેશન ન આવ્યું. મેં સૌથી પહેલાં મારું ક્રેડિટ કાર્ડ અકાઉન્ટ ચેક કર્યું અને કન્ફર્મ કર્યું કે, મારાં કાર્ડ પાર કોઈ ચાર્જ નથી આવ્યો. મને મારી જ મૂર્ખામી પર થોડો ગુસ્સો આવ્યો કે, ટેકનિકલી આટલી જાણકાર હોવા છતાં એ પાસ મેળવવાની આપાધાપીમાં મેં એ વૅબસાઇટ વિષે ઇન્ટરનેટ પર કોઈ શોધખોળ કર્યાં વિના, ફક્ત એક ભરોસાલાયક મિત્રએ વેબસાઈટ સજેસ્ટ કરી હતી એટલે તેનાં પર ભરોસો કરી લીધો. જે-રેલ પાસનું મિશન મેં ત્યાં જ આટોપ્યું અને જાપાન જઈને જે કઈં થઇ શકે એ કરવું બાકી છોડી દેવું એમ નક્કી કર્યું.

શનિવારે સવારે એરપોર્ટ પહોંચીને હું સિક્યોરિટી ચેકની લાઈનમાં ઊભી હતી. બાકીનાં બધાં કામ પતી ગયા હતાં અને હું બિલકુલ રિલેક્સ્ડ હતી એટલે મગજ થોડું સારું ચાલી રહ્યું હતું. મને વિચાર આવ્યો કે, ફરીથી એક વખત મારું ક્રેડિટ કાર્ડ અકાઉન્ટ ચેક કરી લેવું જોઈએ અને જોવું જોઈએ કે, પેલી વેબસાઈટ પરથી કોઈ ચાર્જ નથી આવ્યો. મેં જોયું તો તેનાં પાર સાડા ચારસો ડૉલરનાં બે પેન્ડિંગ ચાર્જ આવી ગયા હતાં અને બંનેની વિગતોમાં ‘જાપાન રેલ પાસ’ લખેલું હતું. મેં તરત જ બૅન્કમાં ફોન કર્યો અને કસ્ટમર સર્વિસ પરની સ્ત્રીને જણાવ્યું કે, આ બંને ટ્રાન્ઝેક્શન ફ્રોડ છે અને તેનું પ્રોસેસિંગ તરત જ રોકવાની વિનંતી કરી. એ સ્ત્રીએ મને જણાવ્યું કે, આવતા 24થી 48 કલાકમાં એ ટ્રાન્ઝેક્શન મારાં અકાઉન્ટમાંથી ચાલ્યા જવા જોઈએ. મેં તેની સાથે બે-ત્રણ વાર એ વાત કન્ફર્મ કરી કારણ કે, ધારો કે કઈં થાય અને બેન્ક મને ફોન દ્વારા સંપર્ક કરવાનો પ્રયત્ન કરે તો મારો ફોન નંબર તો જાપાનમાં ચાલુ ન હોય. તેણે મને ફરી ફરીને ખાતરી આપી કે, 24થી 48 કલાકમાં મારું કામ થઇ જશે એટલે મને થોડી ધરપત થઇ. ઓસાકાની ફલાઇટમાં બેસતાં સાથે જ મને થોડી નિરાંત થઇ અને મેં મૂવીઝ જોઈને બાર કલાક વિતાવ્યાં. મારાં જાપાનનાં મિત્રોએ મારાં માટે એક બહુ સારુ કામ કર્યું હતું અને મારી હૉટેલને ફોન કરીને તેમની ઍરપોર્ટથી હોટેલ સુધી પહોંચવા માટેની વ્યવસ્થાઓ જાણી લીધી હતી. કાન્સાઈ ઍરપોર્ટથી સવા કલાકની એક ટ્રેન લઈને મારે ઓસાકા સ્ટેશન પહોંચવાનું હતું. ઓસાકા સ્ટેશનની ‘સાકુરા-બાશી’ એક્ઝિટ પર મારી હૉટેલની કૉમ્પ્લિમેન્ટરી શટલ બસ લઈને હોટેલ પહોંચવાનું.

સાંજે સાડા ચાર આસપાસ મારી ફલાઇટ લેન્ડ થઇ. એરપોર્ટ પહોંચીને સૌથી પહેલું કામ મેં જે-રેલ પાસ વિષે તપાસ કરવાનું કર્યું. મને આરામથી જે-રેલ પાસનું કાઉન્ટર મળ્યું જયાં પાસપોર્ટ દેખાડીને હું આરામથી ચૌદ દિવસનો પાસ ખરીદી શકી. ત્યાં જ પાસ એક્ટિવેટ પણ થઇ ગયો અને તેણે મને ઓસાકા સ્ટેશન પહોંચવાનો રસ્તો પણ જણાવ્યો. પાસ કાઉન્ટરથી બહાર નીકળતાં જ બરાબર સામે JR સ્ટેશન હતું જયાંથી મારે ઓસાકાની ટ્રેન લેવાની હતી. જે-રેલ પાસ બતાવીને સહેલાઇથી હું અંદર પહોંચી અને યોગ્ય ટ્રેન પકડીને ઓસાકા તરફ પ્રયાણ કર્યું.

ઓસાકા

ઓસાકા, જાપાન

એરપોર્ટથી મારે ઓસાકા સ્ટેશન પહોંચવાનું હતું. ત્યાંની એક એક્ઝિટ પરથી મારે હૉટેલની શટલ લેવાની હતી. ત્યાં ટ્રેનમાં મને મારો સૌથી પહેલો જાપાનીઝ અનુભવ થયો. ટ્રેનમાં ઘણી બધી જગ્યાએ નાના ડિસ્પ્લે લગાવેલા હતાં જેનાં પર ટીવીની જેમ વારાફરતી અલગ અલગ જાહેરાતો ચાલતી હતી. જાહેરાતોનાં પોસ્ટર પણ લગાવેલા હતાં. દરેક જાહેરાત સંપૂર્ણપણે જાપાનીઝમાં હતી. એ ટ્રેનનો ડબ્બો જાણે નવી દુનિયામાં મારાં પ્રવેશનો દરવાજો હતો – સ્ટેશન 9-3/4 જેમ.

ઓસાકા સ્ટેશન ઉતારતાં જ ખૂબ બધી લાઇટ્સ અને ઘણાં બધાં લોકો જોવા મળ્યાં. આસપાસ લખેલું બધું જ જાપાનીઝમાં અને લોકોનો અવાજ પણ જાપાનીઝ જ સંભળાય. એટલું વળી સારું હતું કે, ત્યાં વિવિધ એક્ઝિટ અને હોટેલ તરફ ચિંધાડતાં સાઈન-બોર્ડ ઇંગ્લિશમાં હતાં.

મારી એક્ઝિટ તરફની સાઈન ફોલો કરતી હું આગળ વધી. પાંચેક મિનિટ ચાલી, પછી એસ્કેલેટરથી એક માળ ઉપર ચડી, ફરી થોડું ચાલી, એક બ્રિજ ક્રોસ કર્યો, ફરી એસ્કેલેટરથી નીચે ઉતરી, ત્યાં થોડું આગળ ચાલીને બે માળ નીચે ઉતરી, જમણી તરફ વળીને મારી એક્ઝિટ શોધવાનો પ્રયત્ન કર્યો પણ ત્યાંથી બહાર જવાનો રસ્તો તો ક્યાંયે દેખાતો નહોતો અને થોડું ધ્યાનથી જોયું તો ખબર પડી કે, નીચે હજુ એક માળ હતો એટલે જ્યાંથી આવી હતી એ તરફ પાછી ફરીને નીચે જવાનો રસ્તો શોધ્યો. સૌથી નીચેનાં માળ પર પહોંચ્યા પછી મારી એક્ઝિટ તરફનો રસ્તો દેખાડતી સાઈન ફોલો કરવાની શરુ કરી પણ દસેક મિનિટ ચાલ્યા પછી આગળ જે તરફ એરો લગાવેલો હતો એ તરફ ક્યાંયે મને એક્ઝિટ ન દેખાણી, ફક્ત એક દીવાલ આવી જ્યાંથી બહાર નીકળવાનો કોઈ રસ્તો નહોતો. થોડી વાર ત્યાં આસપાસ ચક્કર માર્યાં પછી મારી એક્ઝિટનાં નામવાળો એરો ફરીથી મળ્યો અને એ તરફ હું આગળ વધી. અંતે પાંચેક મિનિટ વધુ ચાલ્યા પછી મારાં નિર્ધારિત એક્ઝિટ ગેટ પર હું બહાર નીકળી અને ત્યાં સામે જ હોટેલનું નામ લખેલી બસ ઊભી હતી.

બસમાં બેસીને મને પહેલો વિચાર એ આવ્યો કે, મેં ઓસાકા સ્ટેશનની સાઈઝ ખૂબ અંડર-એસ્ટિમેટ કરી હતી. મારાં મનમાં હતું કે, બહુ બહુ તો એકઝિટ શોધીને બહાર નીકળતાં દસેક મિનિટ થશે. પણ, મને ઓછામાં ઓછી વીસથી પચીસ મિનિટ લાગી હતી. એટલું સારું હતું કે, સામાનમાં મારી પાસે ફક્ત એક મોટી હૅન્ડબેગ અને એક પર્સ હતાં અને વધુ કઈં નહોતું. પર્સમાં લેપટોપને કારણે એ થોડું ભારે થઇ ગયું હતું પણ બહુ વાંધો નહોતો આવ્યો. હોટેલ પહોંચતા જ મને આરામનો અનુભવ થવા લાગ્યો. લૉબી એકદમ સુંદર હતી અને રિસેપ્શનિસ્ટે થોડાં ભાંગેલા ઈંગ્લિશમાં મારી સાથે થોડી ઘણી વાત કરી.

મેં તેને જણાવ્યું કે, જો એ મને સારા વ્યૂવાળો કોઈ રૂમ આપી શકે તો આપે. તેણે તેની સિસ્ટમમાં જોઈને મને જણાવ્યું કે, સુંદર વ્યુવાળા સ્ટાન્ડર્ડ રૂમ તો બધાં બુક્ડ છે પણ તને લેડીઝ ફ્લોર પર રૂમ આપું તો ચાલશે? મને આશ્ચર્ય થયું. મેં આ લેડીઝ ફ્લોરનો અનુભવ ક્યારેય ક્યાંયે કરેલો નહોતો. આવામાં કદાચ મારી સાથે કોઈ પુરુષ હોત પણ ખરો તોયે હું કદાચ જિજ્ઞાસા સંતોષવા માટે એ રિસેપ્શનિસ્ટને હા પાડત. એ ફ્લોર પરનાં દરેક રૂમ ફક્ત સ્ત્રીઓને જ આપવામાં આવ્યા હતાં. ત્યાં સર્વિસ સ્ટાફ પણ સ્ત્રીઓ જ હતી અને કોઈ પણ પુરુષે જવાની મનાઈ હતી. એ ફ્લોરનાં દરેક રૂમમાં એક મૉઇસ્ચરાઇઝિંગ મશીન હતું જે તમે રાત્રે ચાલુ કરીને ઊંઘી શકો – જેનાં અસ્તિત્વ વિષે પણ મને એ દિવસ પહેલાં કોઈ જાણકારી નહોતી અને બાથરૂમમાં એ હોટેલની બે સ્ટાન્ડર્ડ ટોઇલેટ્રી (બોડી વૉશ, બોડી લોશન, શેમ્પૂ, કંડિશનર) બ્રાન્ડ્સ ઉપરાંત એક ત્રીજી ઑર્ગેનિક બ્રાન્ડ પણ હતી. આ જોઈને મને થયું આ લેડીઝ ફ્લોર તો આપણને ફાવી જાય તેવો છે! અને પછી એ રૂમની મોટામાં મોટી હાઈલાઈટ જોવા મળી. પડદા ખોલતાંની સાથે જ સામે અદભુત સ્કાયલાઇન જોવા મળી. મારો રૂમ ત્રેવીસમાં માળ પર હતો. તેનો રાતનો ફોટો તો મારા ભંગાર ફોન કેમેરા પર સારો નહોતો આવ્યો. પણ પછીનાં દિવસનો આ ફોટો જુઓ

એ સુંદર રૂમમાં ત્રણ રાત તો આરામથી નીકળી જાય તેમ હતી! હું ફ્રેશ થવા માટે બાથરૂમમાં ગઈ તો ત્યાં એ રાતનું છેલ્લું નોટ-સો-સરપ્રાઈઝ સામે હતું. ઑવર-એન્જીનીયર્ડ ટોયલેટ સીટ જેમાં સીટ વોર્મર ફેસિલિટી હતી. મને થોડું હસવું પણ આવ્યું અને સાથે સાથે એક નવી દુનિયામાં હોવાનો અહેસાસ પણ થયો. આ વિસ્મયની લાગણી મેં જાણે છેલ્લાં બે-ત્રણ વર્ષમાં ગુમાવી દીધી હતી અને અચાનક એ મને પાછી મળી હતી.

નાહીને મારી કઈં જ કરવાની કે વિચારવાની હાલત નહોતી. એ રાત્રે મેં હોટેલનાં રેસ્ટ્રોંમાં જ ડિનર કર્યું. તેમની પાસે વેજિટેરિયન ઓપ્શન બહુ ઓછાં હતાં એટલે જે એક સ્ટાર્ટર અને એક મેઈન કૉર્સ વેજ હતાં એ બે મેં મંગાવ્યાં. આટલી નામાંકિત હૉટેલમાં જમવાનું ખરાબ હોવાનાં ચાન્સ તો બહુ ઓછા હોય પણ એ, માઈન્ડ-બ્લોઇંગ પણ નહોતું. જમવાનું પતાવીને મેં એક બે કૉલ કર્યાં અને પછી ઊંઘવા તરફ પ્રયાણ કર્યું.