क्रमशः

चन्द्रकान्त बक्षी

दुःख पड़ते जाएँ और इन्सान बीमार भी न पड़े यह ईश्वर की कलामय क्रूरता का एक प्रकार होगा, उसने सोचा। समस्याएँ। एक मित्र ने पूछा, समस्याओं का निराकरण क्या? हमारी मिडलक्लासी समस्याओं का? भगवान है सब का। वह समस्याओं का निराकरण कर देता है। एक पुरानी समस्या सुलझे उससे पहले ही भगवान दो नयी विकट समस्याएँ खड़ी कर देता है। वरना तो हम मिडलक्लास के इन्सान पुरानी समस्याओं की तपिश में ही झुलसकर काले पड़ जाएँ और जले कागज़ की तरह कोनों में पड़े पड़े राख हो जाएँ। पर जन्मकुंडलिओं में विधाता शनि का समायोजन करके देता है। वह मरने नहीं देता। शनि ज़िंदा रखता है, संतप्त करता है। गर्दिश-ए-आसमानी में गोल गोल घुमाये रखता है। साप्ताहिक भविष्य पढ़ने का मज़ा आता है।

भूतकाल के पास मनःचित्र भी नहीं थे, साइकेडिलिक डिज़ाइनों की तरह सिर्फ़ एक ही तरह के रंग और उन रंगों के के परावर्तन चकराते रहते थे। यकायक, भूमिका के बिना सब घट रहा था। अप और डाउन ट्रेन की तरह एक ही समय भूतकाल और वर्तमानकाल बन जाता था। यह शहर जिसमें उसकी ज़िंदगी और शायद पूर्वजन्म भी गुज़रा था, अब उसका नहीं था। इस शहर के श्मशानघाट पर उसकी चिता जानेवाली नहीं थी। और यह शहर उसने छोड़ दिया था। स्टेशन पर एक ही मित्र आया था – आओगे फिर से? हाँ। कब? किसी दिन। मित्र समझता था। अनिश्चितता का कोई अर्थ नहीं था। फिर स्टेशनों पर ऐम्बर लाइटें होतीं, गार्ड सीटी लगाता – दिन हो तो हरी झंडी लहराता, रात हो तो हरी बत्ती हिलता। फिर पश्चिम की दिशा, उझड़ी हुई गृहस्थी की दिशा, नए स्मशानों की दिशा।

इंसान शहर छोड़ सकता है? उसने रेस्ट्रों कार की खिड़की से बाहर देखा। गाड़ी एक पुल पर आई, नीचे एक सूखी नाली आई – और पुल के नीचे हरे तोते उड़ रहे थे। सामने धुंधले, पहली धूप में मकाई के खेत दिख रहे थे। शायद मकाई थी, होगी। – उस शहर में अब घर नहीं था, गृहस्थी नहीं थी। रात को पौने नौ की बसें नहीं थी। हाँ, क्रॉसिंग पर उतर जाना, फिर दक्षिण की ओर सीधे जाना, दाहिने लाल मकान आएगा, ऊपर पहले माले पर वह रहता है … रहता था! उसके फ़्लैट की खिड़की –

उसके फ़्लैट की खिड़की भूतकाल की ओर पड़ती है। उस फ़्लैट की खिड़की से शाम देखने का अकस्मात शायद ही बना है। उस खिड़की से रोज़ रात दिखती थी, और सुबह। चिड़ियाँ और चढ़ता सूरज, सुबह बजती सायरन की आवाज़। पर इंसान शहर छोड़ सकता है? जीवन में पहले चालीस साल जीया हो वह शहर – जहाँ पीहर से भी ज़्यादा आत्मीयता हो गई हो। कहाँ से शुरू किया जाए और कहाँ ख़तम किया जाए? बारिश में स्कूल से भीगते भीगते आते थे वह शहर, माँ की चिता की प्रदक्षिणा कर आग जलाई थी वह शहर, वासना से छलकता पहला चुंबन किया था वह शहर, जहाँ सिगरेट पीना सीखे थे वह शहर, जवानी की ईर्ष्याएँ जहाँ आँखों के सामने धीरे धीरे बुझती देखी थीं वह शहर।

इंसान शहर छोड़ सकता है? छोड़ता है। पर छोड़ सकता है?

एक बार बचपन में खो गया था। एक बार डूब गया था, एक बार स्टेशन पर सो गया था, एक बार …

स्मृतिओं के अलावा कुछ रहता नहीं वयस्क इंसान के पास। या फिर बीमारियाँ। पूरी ज़िन्दगी जतन कर, परवरिश कर संभाली हुई बीमारियाँ। या फिर सफ़ेद बाल या सालों से एक ही तरह हंसने की वजह से पड़ी रेखाएँ। अथवा ज़माने से बैग उठाते उठाते घूमने से बाएँ हाथ की हथेली में पड़े छाले। बायाँ हाथ पूरी ज़िन्दगी दुनिया की ग़ुलामी करता रहा है और दाहिना सलामें।

अब बायें हाथ के छाले और दाहिने की सलामें शहर में छोड़कर वह बाहर निकल गया था। रेस्ट्राँ कार का मलयाली मुनीम बहुत तेज़ी से बिल फाड़ रहा था। मकाई के खेत अब नहीं थे। उर्वर ज़मीन थी, पश्चिम की ओर दौड़ती उर्वर ज़मीन और आसमान, पश्चिम के पेड़ों की ओर नील-कालिमा पकड़ता अपरिचित आसमान।

विचार संलग्न, क्रमबद्ध, सिलसिलेवार आ सके वैसी स्थिति नहीं थी। दो जहानों का ख़ुदा उसके दो जहानों को पहचानता था इसलिए वह इस शहर को पहचानता था। उसने गिद्ध की आँखों से यह शहर यह शहर देखा था, कुत्ते की नाक से यह शहर सूंघा था, सूवर के जबड़ों से इस शहर में खाया था: यह शहर उसकी भूख, जुराबों, क्रोध और कहाकों में फ़ैल गया था। यहाँ वह बच्चे की तरह आँखें खुली रख, कुछ देखे बिना अपने ही विचारों में लीन रह सकता था, यहाँ के हर चेहरे की रेखा को, हरेक पथरीली तह पर जमी धूल की पर्त को, आसमान को, धूप को, बरसात में जमे पानी को, दिशाओं को, अगली सुबह केअख़बार की हेडलाइनों को – सबको वह आत्मीयता से पहचानता था और वह सभी दौड़ती ट्रेन की गड़गड़ाहट में खो गए थे।

और बेकारी के दिन गुज़ारे थे इस शहर में। और इश्क़ के। महत्त्वाकांक्षाओं को ज़मींदोस्त होते देखा था इस शहर में। वर्षों से इन्सानों के साथ बिरादरी का ताल्लुक़ निभाया था इस शहर में। ख़ाकी कमीज़ और सफ़ेद टोपी पहनकर सिनेमा के नीचे अख़बार बेचते आदमी से वह सालों से अख़बार खरीदता था। गन्ने का रास निचोकर देनेवाले पहलवान के पास वह रस पीता था। गंजे सिरवाले एक हजाम से वह कॉलेज के दिनों से बाल कटवाता था। मोठे चश्मेवाले दर्जी से वह पैंट सिलवाता था – सालों से। कॉफ़ी – हाउज़ का धारदार मूछवालावाला एक वेटर हमेशा खबर पूछता था। रोज़ की बस के कंडक्टरों को वह चेहरे से पहचानता था। एयर-लाइन की रिसेप्शनिस्ट छूटती तब वह देखता रहता। रेसकोर्स के पास एक कोकाकोला वाले और नदी के तट पर हॉटल के नीचे बैठे पानवाले से सालों से लगाव था। बेनाम लोग। उनके नाम भीमालूम नहीं थे। वे लोग अचानक मर जाएंगे तब पता नहीं चलेगा। शायद वे लोग ही सोचेंगे कि सालों से रोज़ाना आनेवाला ‘वह’ अब आता नहीं। आये बिना रहता नहीं … शायद मर गया होगा।

और शहर उसकी हड्डिओं के प्रवाही तक उसके शरीर में उतर चुका था। उस शहर में रात में होती आवाज़ों से वह समय का अनुमान लगा सकता था। आधी रात आँख खोलकर आकाश की ओर देखकर सोच सकता – कितने बजे हैं। भरी दुपहरी में आराम से सोकर स्वप्न देख सकता था। आँखें बंद कर सिर्फ़ साँस लेकर वह रोज़ के मार्गों के बस स्टॉप को पहचान सकता था। उस शहर की हवा में उसका रेडियो सुंदर बजता था, उसकी ब्लेड धारदार चलती थी, उसके जूतों का पॉलिश ज़्यादा चमकता था, केटली की चाय को फ्लैनेल की टीकोज़ी और गर्म रखती थी, अलमारी का हैंडल ज़्यादा सफ़ाई से घूमता था, सिगरेट का धुँआ ज़्यादा स्वप्निल उड़ता था। अँधा इंसान अन्धकार को पहचानता है वैसे वह उस शहर की हवा को पहचानता था।

जाड़े आए थे और दीवालियाँ। नए अंडे, और होली पर अबीर गुलाल की खुशबू। पंखे की आवाज़ भी उसके अस्तित्त्व में बुन गई थी। और मौत की खबरें। कोर्ट और शनिवार-दर-शनिवार आता मासिक। सिनेमाहॉल की कुर्सियाँ। बियर और मक्खन खरीदता था वह दुकानें। परिचित आशाएँ, परिचित अपरिचय। सभी रह गया था पीछे; सिर्फ हरी बत्ती का प्रकाश परछाई के डर की तरह शायद साथ साथ आ रहा था और उसमें पीछे मुड़कर देखने की हिम्मत नहीं थी। पीछे मुड़कर देखने से सब कुछ एकसाथ खनखनाहट के साथ, हमेशा के लिए खो जानेवाला था। शायद।

जो जी जा रही हो वही चीज़ आत्मकथा होती है। जो जी जा चुकी हो वह संभवतः और किसी की कहानी होती है। जिसकी जीभ में वाचा नहीं होती ऐसे किसी की कहानी, कही न जा सके ऐसी, आत्मकथा को उत्तरार्ध और पूर्वार्ध नहीं होते। एक खत्म होती है, दूसरी शुरू हो जाती है। शायद – अगर वह आत्मकथा हो तो वह अलग अलग लोगों की होती है। बिल देकर वह रेस्ट्रों कार से अपने डिब्बे की ओर चला।

उसकी बर्थ आ गई। वह लेट गया।

*

फिर काफी समय बाद एक सहप्रवासी ने प्रश्न करने की रुचि दिखाई। रफ़्ता रफ़्ता पूछा: ‘कहाँ जा रहे हैं?’

‘मुंबई।’

‘काम से जा रहे होंगे?’

‘नहीं, हमेशा के लिए।’

‘धंधा करते हैं?’

‘नहीं।’

‘नौकरी करते होंगे?’

‘नहीं।’

‘परिवार वहाँ होगा?’

‘शादी नहीं की।’

‘कितनी उम्र हुई?’

‘चालीस।’

फिर सहप्रवासी की ज़रूरत न रही। सवाल आते ही रहे। खुद ही प्रवासी था और वही उसका सहप्रवासी भी था।

‘क्या किया चालीस साल तक?’

‘धंधा किया। फिर बंद किया।’

‘अब?’

‘पता नहीं।’

‘क्या इच्छा रखते हैं?’

‘फसाद, युद्ध, हुल्लड़। खून – खराबा। सब बहुत असह्य तरीके से सह्य बन गए हैं। इस तरह सड़ते रहने का कोई मतलब नहीं।’

‘इसलिए शहर छोड़ दिया?’

‘स्मृति के घाव भर गए थे वह पसंद नहीं आया। इसलिए घाव फिर से कुरेद लिए।’

‘वह हँसा।’

सच और झूठ एक ही बन रहे थे, गर्भाशय और कब्रस्तान की तरह।

बर्थ पर ही नींद आ गई। आसमान जितने ऊँचे मिनारे पर एक महाकाय छिपकली उसके सामने ताक रही थी और उसको लगा कि वह एक चींटी की तरह उस महाकाय छिपकली के हिलते गले की तरफ खिंचता सरक रहा था। आँखें खुल गईं।

उसने फिर से खुश होकर आँखें बंद की।

क्रमशः सपनों में भी विविधता आ रही थी। खुशकिस्मती। खुशकिस्मती ….

 

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चक्षु:श्रवा (भाग – २)

चन्द्रकान्त बक्षी

महल में जाने के मार्ग के दोनों तरफ साल के वृक्ष कतार-दर कतार थे और मार्ग पर वृक्षों की परछाइयों की डिज़ाइन दूर तक दिखती थी । पुराने वृद्ध वृक्षों पर अब फल-फूल भी बहुत छोटे आते थे । और एक-दो वृक्ष अत्यंत वृद्ध हो जाने की वजह से फल आने बंद हो गए थे । देहली के पास उगे हुए घुमावदार वृक्ष की वजह से, उसके मूल की वजह से, देहली के पत्थर में एक उतरती हुई दरार पड़ गई थी, जो गिरती हुई बिजली की तरह टूटती खिंच गई थी । पुरानी खिड़कियाँ, जिसमें कहीं कहीं लकड़ी की सिक्या नदारद थी और देहली अटकती थी वहाँ चौड़ी डोरिक कॉलमें फ़ैल जाती थी ।

बीच में एक चौगान था और चारों ओर पिंजरों में रंगीन पंछियों का कलरव था । बूढ़े काकातुआओं के पैर पित्तल की चैनों से बांधकर उन्हें लोहे के स्टैण्ड पर बिठाया था और उनके गले के रुएं झड़ चुके थे और उनकी चोंच पर से चमक उड़ गई थी । कहीं से एक मैना का स्वर, दूर एक सफ़ेद मोर के फैलाव सिकुड़ते होती हवा चीरती फफडाहट । हरे मख़मल का वज़नदार पर्दा खिसा । पर्दे हिलते नहीं थे । उनमें हवा रुकी हुई थी और समय बन्द पड़ा था और मखमली सिलवटों में धूल की पर्तें चिपक जाने से रंग निस्तेज हो गए थे । दीवारें थीं , लकड़ी के पॉलिश किये हुए दरवाज़े,टेबल पर चमकता कांसे का चिरागदान था, जिसके बाहर पाँखोंवाले नग्न कामदेव की सौम्य मूर्ति थी, चालू पॉलिश लगाने से कामदेव के गालों का कांसा कपाल, आँख और सिर के कांसे से विशेष चमकता था ।

एक दुनिया थी – साठ, सत्तर, पचहत्तर साल पहले शुरू हुई थी, पच्चीस-तीस साल तक चली थी। रंगदर्शी लरज की दुनिया, पोर्सेलिन के विराट वाज़, ऊपर पिरोजा रंग के चितरे ड्रेगन, जिनके खर्राटों से फूँकता केसरी धुआँ । शीशे का एक मोटा गोला था, अंदर झिलमिलाता पानी और उस पानी की टूटती तहें । अंदर चकराती काली सुनहरी गोल्डफिश और उनका गोल गोल तैरना । सीलिंग की कुतरी हुई लकड़ी के रंग और झुर्रियों वाला प्लास्टर, छिले प्लास्टर पर संभलकर सरकती छिपकली, दीवारें शौर्य की तवारीख़ के गवाह की तरह शांत खड़ी थीं, ढाल के नीचे झूलती गनमेटल की चैन और शस्त्र म्यान के ब्रोकेड पर मक्खियाँ बैठने से चिपकी हुई दाग़दार गंदकी, कटग्लास के कांपते झुम्मरों की नग्नता । पुरानी कालीन, सोफे के पैर के पास से रंगों के उखड़े हुए धब्बों के रुझे ज़ख्म वाली, जिसकी रुआंदार कढ़ाई पर ढली हुई शराबों की सिंचाई हुई थी । और कईं वर्ष, जवानी में सराबोर धुआँ-धुआँ । गौरसंजीदा साल और लोबान की तरह जल चुके उन हमदर्दों के वर्षों की महक । जीवन की उपज की रौंदती ज़हरीली महक, पर बहलाती महक ।

– सफ़ेद किनखाब पर उभरे काले फूल और सोने के तारों से गूँथी हुई टहनियाँ, हाथीदाँत की प्यालियाँ, चांदी के पानदान, बाल्कनी में से आती केवड़े की महक, गनमेटल में खुदा हुआ मांसल अपोलो, धुम्मसी स्त्रियों की स्वप्नशील आभासी तसवीरें, शिकार के चित्र, चेस्टनट रंग के पानीदार घोड़े और बदामी धब्बोंवाले सफ़ेद जानदार कुत्ते और विलायती आकाश और चेक फ्लेनेल की काउन्टी टोपियाँ । सुगन्धि बंद करने के लिए इस्तेमाल किये जाते हों वैसे नक्शी किये हुए बक्से, गुलाबजल की सुराहियां, केसर के आला शराब, जेड के हाथवाले कटार । गोमेदक मढ़ा हुआ पत्थर का क्रॉस, पन्नों में से तारी हुई गणेश की मूर्ति, छलकती श्री ।

और इति के बाद शुरू होता आरंभ । यॉर्कशायर पुडिंग ? … सोहो की याद दे रहा है … घोड़ा पिछले हफ्ते ही आया है, प्योर आइरिश थोराब्रेड … शनेल नंबर फाइव ? ओह ! ख़्वाबों में दुनिया में उसकी खुशबू छूटती नहीं … सेविल रो में सूट बनवाया था, दुनिया में ऐसे दो ही सूट हैं, अन्नदाता … अच्छा, इन्स ऑफ कोर्ट … जिमखाना … प्लांटर्स क्लब में सैटरडे नाइट है … कुनर आएगी । लेंकेशायर की है, दो साल बर्लिन में थी … ब्रिज एन्ड डेनिश बियर … ओह नो! मॉल पर थोड़ा घूमेंगे … ऑक्सफर्ड में थे ? कल सुबह गोल्ड लिक्स पर, केडीज़ को बोला है ? … मार्टिनी, ड्राय मार्टिनी … नो, आयम एन इंग्लिशमेन … डॉग शो है ? लंचन मीटिंग … मॉनसून रेसिस की सेकण्ड मीटिंग है । आरिएल पंटर … कड़क कॉलर, फीकी टाई, कॉकटेल के लिए आए चेकोस्लोवाक काँच के गिलास … टर्फ पर मिलेंगे … ‘न्यू स्टेट्समेन’ नया आया है ? येस … मिसिस रोबिनसन, हमारे सारे लोग स्टेबल बॉय, बूढ़े वेइटर, नेपाली ड्राइवर, बारमेन, खानसामा, साईस, बिलियर्ड मार्कर सबकी आँखों में आंसू आ गए, हमने कलकत्ता छोड़ा तब ‘फॉर ही इज़ आ जॉली गुड फेलो !’ … ‘गॉड सेव द किंग …’

-दादा  केसरीसिंघ ने मुँह फेर लिया, बेत किनारे पर टिका दी । वापस बिस्तर के पास आए । बिस्तर न बहुत नीचे था, न बहुत ऊपर था और दादा बिना आयास बैठ सके ऐसा था। कोशा को भी दादा का बिस्तर ज़्यादा पसंद था क्योंकि उसमे बिना प्रयत्न घुस सकते थे । दादा केसरीसिंघ के मन में आंधी के जोश से स्मृतियाँ टकरा रही थीं । ज़मीनदार थे, राजा-नवाब थे, गोरे हाकेमों की एक अलग रसम थी । दादा केसरीसिंघ ने अलग अलग दुनिया में से रास के घूँट पी लिए थे । अब सिर्फ ‘बीटिंग द स्ट्रीट’ बाकी रहा था । जीवन की मार्च पूरी होने को आई थी । झंडा झुका लेना था, सामने समंदर की ब्ल्यू अनपेक्षा लहराती थी और प्रकाश के थिरककर-झपककर बह जाती बूँदों की ओर आँखें झपकाकर अंतिम ‘स्लो-मार्च’ कर लेनी थी ।

दादा केसरीसिंघ अपने बिस्तर पर लुढ़क गए । आवाज़ों की दुनिया कई वर्षों से शांत हो गई थी । भूतकाल न होता तो जीया भी न जाता । नई दुनिया रास नहीं आती और दुनिया प्रत्येक क्षण नई होती जाती है । कुदरती खेल है । दादा केसरीसिंघ ने सोचा, इन्सान पुराना होता जाता है, दुनिया नई होती जाती है और हारती बाज़ी पर बैठा इंसान चिल्लाता रहता है – मैं सही हूँ, दुनिया ग़लत है । क्या होगा इस दुनिया का ? क्या होना है दुनिया का ? दादा केसरीसिंघ ने सोचा, सौ साल पहले वी.टी. के स्टेशन पर गाड़ी आई थी, आज जम्बो जेट आए हैं, सौ साल बाद कुछ नया आएगा ।

दादा केसरीसिंघ ने आँखें बंद की, थकान और साँस चढ़ गई थी । अचानक सब सुनाई देने लगा, बंद आँखें होने के बावजूद, दुनिया की आवाज़ें, जीवन की आवाज़ें – और मृत्यु का स्वर , हलका, थपथपाकर उठाता हो वैसा, दादा कोशा जितने थे तब उनकी माँ जगाने आती थी तब … तब वही आवाज़ सुनी थी, नींद में या शायद तन्द्रा में ।

**

दोपहर को कोशा को स्कूल से घर ले आए तब कोशा को समझ नहीं आया कि, पिनाक, राजु और नियति को नहीं पर उसे ही क्यों जल्दी छुट्टी मिल गई ? वह दौड़ती दौड़ती दादा केसरीसिंघ के बिस्तर के पास गई, किसीने उसे रोका नहीं, कहा भी नहीं वह दादा की प्रिय बेटी थी। दादा की आँखें बंद थी ।

“दादा, उठो, – आज मेरी छुट्टी हो गई ।” और दादा हिले नहीं । “आँखें  खोलो। आपने आँखें बंद की हैं इसलिए ही सुन नहीं रहे ।” और कोशा को अचानक घबराहट हो गई, और बड़े लोगों को होती है वैसी घबराहट, वह हट गई और फिर मुँह घुमाकर बड़ों की शकलें देखती रही। …

– चन्द्रकान्त बक्षी (1932 – 2006)

 

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चक्षु:श्रवा (भाग – १)

चन्द्रकान्त बक्षी

दादा केसरीसिंघ की उम्र उन्हें पता नहीं थी मगर उन्हें बराबर याद था कि विक्टोरिया टर्मिनस स्टेशन बना तब वे अपनी प्रपौत्री कोशा जितने थे | नया स्टेशन बना तब उनके पिता उन्हें चलाकर देखने ले गए थे और समझाया था कि यहाँ आगगाड़ी आएगी | गाड़ी धूएँ से चलेगी | पहली आगगाड़ी आई तब शहर के कई नामांकित स्त्री-पुरुष देखने आए थे | दादा केसरीसिंघ कोशा जितने थे पर स्टेशन पर प्रवेश करती वह पहली आगगाड़ी उनके स्मृतिपट पर स्पष्ट थी, काला लम्बा गोल मूंहवाला अजगर जैसा जानवर, धुंआ निकालता, चित्कार करता, भभकता पटरी पर होकर अन्दर आया था और लोग दूर हट गए थे और जानवर थमकर हाँफकर, सिसकता हुआ ठण्डा पड़ गया था और गोरे साहब गाड़ी से उतरे थे और मेमसाहब, रंगीन छत्रियाँ लेकर | और मेमसाहबों के लिए आराम करने के लिए एक शामियाना बाँधा गया था | बाहर मेला लगा था और शरबत पिए जा रहे थे | आठ साल की कोशा खिलखिलाकर हंसते हुए यह सुन रही थी | पीछे से एक पुत्रने दादा केसरीसिंघ को हिसाब लगाकर बताया था कि दादा, आप १८८० में जन्मे होंगे, उस वक्त आपकी उम्र पक्का आठ साल होगी क्योंकि १८८८ में विक्टोरिया टर्मिनस का पक्का स्टेशन बंधा था | दादा केसरीसिंघ आँखें मीचकर कहते, हाँ, सौ में थोड़े ही साल बाकी हैं | तब पुत्र ने कहा था कि आपकी उम्र बयानवे साल है | पर उस ज़माने में उम्र की तारीख-समय लिखकर रखने का रिवाज नहीं था | कोशा ने पूछा था, दादा, आप कौनसी हॉस्पिटल में जन्मे थे ?

प्रपौत्री कोशा और दादा केसरीसिंघ के बीच फर्क चौरासी साल का था | मगर दादा की कोशा के साथ सबसे ज़्यादा बनती थी और कोशा को भी दादा की बातें सुनने में बड़ा मज़ा आता | दादा बहुत कम सुन सकते | मगर एक पौत्र जो कि रेडियो इंजीनियर था वह कहता कि दादा कोशा की बात सबसे ज़्यादा सुन सकते हैं | दादा और कोशा की वेवलेंग्थ एक ही है | वह हँसकर बोलता कि इसलिए कम्युनिकेशन अच्छा है! दादा के दांत सालों पहले जा चुके थे, कृत्रिम दांत भी अब ज़्यादा काम नहीं करते थे और दादा खाते वक्त हलका हलका चबाने के लिए ही कृत्रिम दंतावली का इस्तेमाल करते, वरना बिना दांत का उनका जबड़ा पूरा दिन हिलता रहता | खाने में प्रवाही ही रहता | दादा धुम्मसी आँखों से कोशा के सामने देखकर कहते, बेबी, तू कान से सुनती है न ? मैं आँखों से सुनता हूँ | कोशा किलकारियाँ  करती हँसने लगती – तो फिर सबकी बातें क्यों आँखों से नहीं सुनते ? मेरी ही बात क्यों आँखों से सुनते हो ? दादा कहते, क्योंकि तुम मुझे सबसे ज़्यादा पसंद हो | कोशा कहती, कोई आँख से नहीं सुनता, सुनते हैं कान से, देखते हैं आँख से | और दादा ज़रा गंभीर होकर समझाते, तुम्हें पता है साँप के कान नहीं होते | साँप आँखों से सुनता है, इसलिए उसे चक्षु:श्रवा कहते हैं | संस्कृत में – जो आँखों से सुनता है, वह इन्सान बूढ़ा हो जाता है इसलिए आँखों से सुनता है | कोशा कुछ समजती नहीं पर दोनों कानों में उंगलियाँ डालकर आँखों से दादा के सामने देखती रहती, फिर कहती : पर मुझे तो कुछ भी सुनाई नहीं दे रहा | दादा हँसते – पगली लड़की है!

मुंबई में प्लेग आया तब दादा केसरीसिंघ लगभग जवान हो चुके थे पर बीसमी सदी अभी तक आई नहीं थी और लोग मुंबई छोड़कर जाने लगे तब उनके पिता ने उनके चाचा को कहा था : प्रह्ल़ाद, बालबच्चों को लेकर तुम कल अपने गाँव चले जाओ | अब यहाँ रहने में बड़ा जोखिम है – कमसे कम बच्चों-स्त्रीओं को यहाँ से ले चलते हैं | हम मर्दों को तो यहीं रहना होगा | और दादा केसरीसिंघ के हठ करने के बावजूद उनको सबके साथ गाँव जाना पड़ा था | प्लेग चला और जैसे ईश्वर पापोंकी सज़ा कर रहा हो, वैसे हज़ारों  परिवार ताराज हो गए | एक ही परिवार के तीन लोग एक ही दिन में मर जाने के किस्से भी सुनने मिले | यज्ञ, होमहवन, पूजा-प्रार्थना बहुत कुछ चला, अकाल भी आया, ढोर मुफ्त देने लगे और दादा केसरीसिंघ ने गरीब किसानों को उनके चाचा प्रह्लादसिंघ के पास आँखों में आँसू लेकर गाय देने आते देखा था | किसान कहते थे : चाचा, गायमाता को खिला नहीं सकते, उन्हें बचाइये, हमारा हम देख लेंगे | और चाचा प्रह्लादसिंघ की आँखों में आँसू देखना दादा को याद था | इंसान मक्खियों की तरह मर रहे थे | हलके लोग तो लकड़ी मिल नहीं रही थी इसलिए आग मुर्दे के मूंह में रखकर हिजरत कर रहे थे | कई लोग लाशों को समंदर में फेंक देते थे | दादा केसरीसिंघने छोटी उम्र में ही मौत को बहुत करीब से देख लिया था और रानी विक्टोरिया की छापवाला, उनके पिता ने मुंबई से लिखा हुआ पोस्टकार्ड भी पढ़ा था कि यहाँ मुंबई शहर में तो प्लेग की वजह से दंगे भी हो रहे हैं |

प्रपौत्री कोशा पूछती : दादा साँप कान से सुनता है ? और दादा केसरीसिंघ धीरे धीरे समझाते : साँप के कान नहीं होते, साँप की आँखें होती हैं | वह आँख से देखता है | मदारी बीन बजाता है और डोलता है इसलिए साँप उसे देखकर डोलता है | मदारी स्थिर हो जाता है तब साँप स्थिर हो जाता है | वह आवाज़ नहीं सुनता, आँख से देखता रहता है और डोलता रहता है इसलिए उसे चक्षु:श्रवा कहते हैं | मतलब जो आँखों से सुनता है वह | दादा केसरीसिंघ बात ख़तम करे उससे पहले ही कोशा पूछ देती, दादा! साँप कितना जीता है ? सौ साल | दादा हँसते | आपको सौ साल हो गए ? दादा कहते : नहीं, तुम कोलेज जाओगी तब मुझे सौ साल होंगे | मैं कोलेज कब जाउंगी ? और बातें आड़ी-टेढ़ी पटरी पर चला करती | स्कूल में कोशा अपने मित्रों पिनाक, राजु और नियति को बड़ी टिफ़िन रिसेस के वक्त बात करती, मेरे डेडी के डेडी के डेडी सौ साल के हैं, और उसके मित्र आँखें फैलाकर, चबाना रोककर सुनते रहते, फिर कोशा बहुत धीरे से, लगभग कानमें कहती हो वैसे स्पष्टता करती, तुम्हें पता है वह कानों से नहीं सुनते, आँखों से सुनते हैं | फिर वह आगे कहती, किसीको बताना नहीं, प्रोमिस ? बच्चे कहते प्रोमिस और बड़ी रिसेस ख़तम होने की घंटी बजती |

दादा केसरीसिंघ की आँखें अभी भी देख सकती थीं | शरीर में प्रवृत्ति थी और रोज सुबह-शाम वे घर में धीरे धीरे घूम सकते | बाल झड गए थे, सिर के दोनों तरफ की हड्डियाँ निकल आई थी और आँखें हड्डियों के गोल घर में बाहर से लगाईं हों वैसी लगती थी | मगर उन आँखों के पीछे जी हुई एक भरपूर ज़िंदगी की झलकें अभी तक कायम थी और भूतकाल – साठ, सत्तर, पचहत्तर पुराने भूतकाल की झपटें, स्वर अभी भी दादा केसरीसिंघ सुन सकते थे | दादा ने पूरे हिन्दुस्तान में नौकरियाँ की थी | पेशावर से कन्याकुमारी तक पेट भरकर घूमे थे, बहुत देखा था, बहुत खाया-पीया था | राजा-महाराजा-नवाब-हुक्काम रेज़ीडेंटो की दुनिया वे बहुत आसानी से याद कर सकते थे | आज़ादी आने के बाद उन्होंने प्रवृत्त जीवन समेट लिया था | और निवृत्ति को भी पचास साल हो चुके थे | दादा केसरीसिंघ कहते कि आज़ादी के बाद ज़िंदगी फीकी पड़ गई | अंग्रेज साहब क्या लोग थे ! अब तो सिर्फ मच्छर बुनबुनाते हैं | राजा – नवाब कदरदान थे, गुणी थे | खानदानी खून उनकी रगों में बहता था | अब तो काला पैसा और कला खून पूरे देश में फैल गए हैं | सफ़ेद कपड़ेवालों ने पूरे देश को काला कर दिया | दादा कभी अपनी पुरानी बेत को पकड़ते, उनकी पघड़ी की किनार पर सड़ी हुई ज़री की किनारिओं पर कांपती उंगलियाँ फेरते, रंग उडी हुई साटिन की रिबन पर लटकते मैडल हाथ में लेकर देखते रहते , काले मखमल पर चांदी के तार से काम की हुई जयपुरी जूतियाँ पहनकर , पित्तल पर गिल्ट की हुई वज़नदार नक्षी की हुई फ्रेम में जड़े पुराने लम्बगोल वेनिशियन शीशे में बहुत पास जाकर अपना मुरझाया हुआ बयानवे साल का चेहरा देखते और पानीदार आँखोंमें से स्मृति के मेघधनुषी प्रतिबिम्ब फैल जाते और अय्याशी की साड़ी घूंटी हुई तर्जो के दबे हुए प्रतिध्वनी सुनाई देने लगते –

 

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