क्रमशः

चन्द्रकान्त बक्षी

दुःख पड़ते जाएँ और इन्सान बीमार भी न पड़े यह ईश्वर की कलामय क्रूरता का एक प्रकार होगा, उसने सोचा। समस्याएँ। एक मित्र ने पूछा, समस्याओं का निराकरण क्या? हमारी मिडलक्लासी समस्याओं का? भगवान है सब का। वह समस्याओं का निराकरण कर देता है। एक पुरानी समस्या सुलझे उससे पहले ही भगवान दो नयी विकट समस्याएँ खड़ी कर देता है। वरना तो हम मिडलक्लास के इन्सान पुरानी समस्याओं की तपिश में ही झुलसकर काले पड़ जाएँ और जले कागज़ की तरह कोनों में पड़े पड़े राख हो जाएँ। पर जन्मकुंडलिओं में विधाता शनि का समायोजन करके देता है। वह मरने नहीं देता। शनि ज़िंदा रखता है, संतप्त करता है। गर्दिश-ए-आसमानी में गोल गोल घुमाये रखता है। साप्ताहिक भविष्य पढ़ने का मज़ा आता है।

भूतकाल के पास मनःचित्र भी नहीं थे, साइकेडिलिक डिज़ाइनों की तरह सिर्फ़ एक ही तरह के रंग और उन रंगों के के परावर्तन चकराते रहते थे। यकायक, भूमिका के बिना सब घट रहा था। अप और डाउन ट्रेन की तरह एक ही समय भूतकाल और वर्तमानकाल बन जाता था। यह शहर जिसमें उसकी ज़िंदगी और शायद पूर्वजन्म भी गुज़रा था, अब उसका नहीं था। इस शहर के श्मशानघाट पर उसकी चिता जानेवाली नहीं थी। और यह शहर उसने छोड़ दिया था। स्टेशन पर एक ही मित्र आया था – आओगे फिर से? हाँ। कब? किसी दिन। मित्र समझता था। अनिश्चितता का कोई अर्थ नहीं था। फिर स्टेशनों पर ऐम्बर लाइटें होतीं, गार्ड सीटी लगाता – दिन हो तो हरी झंडी लहराता, रात हो तो हरी बत्ती हिलता। फिर पश्चिम की दिशा, उझड़ी हुई गृहस्थी की दिशा, नए स्मशानों की दिशा।

इंसान शहर छोड़ सकता है? उसने रेस्ट्रों कार की खिड़की से बाहर देखा। गाड़ी एक पुल पर आई, नीचे एक सूखी नाली आई – और पुल के नीचे हरे तोते उड़ रहे थे। सामने धुंधले, पहली धूप में मकाई के खेत दिख रहे थे। शायद मकाई थी, होगी। – उस शहर में अब घर नहीं था, गृहस्थी नहीं थी। रात को पौने नौ की बसें नहीं थी। हाँ, क्रॉसिंग पर उतर जाना, फिर दक्षिण की ओर सीधे जाना, दाहिने लाल मकान आएगा, ऊपर पहले माले पर वह रहता है … रहता था! उसके फ़्लैट की खिड़की –

उसके फ़्लैट की खिड़की भूतकाल की ओर पड़ती है। उस फ़्लैट की खिड़की से शाम देखने का अकस्मात शायद ही बना है। उस खिड़की से रोज़ रात दिखती थी, और सुबह। चिड़ियाँ और चढ़ता सूरज, सुबह बजती सायरन की आवाज़। पर इंसान शहर छोड़ सकता है? जीवन में पहले चालीस साल जीया हो वह शहर – जहाँ पीहर से भी ज़्यादा आत्मीयता हो गई हो। कहाँ से शुरू किया जाए और कहाँ ख़तम किया जाए? बारिश में स्कूल से भीगते भीगते आते थे वह शहर, माँ की चिता की प्रदक्षिणा कर आग जलाई थी वह शहर, वासना से छलकता पहला चुंबन किया था वह शहर, जहाँ सिगरेट पीना सीखे थे वह शहर, जवानी की ईर्ष्याएँ जहाँ आँखों के सामने धीरे धीरे बुझती देखी थीं वह शहर।

इंसान शहर छोड़ सकता है? छोड़ता है। पर छोड़ सकता है?

एक बार बचपन में खो गया था। एक बार डूब गया था, एक बार स्टेशन पर सो गया था, एक बार …

स्मृतिओं के अलावा कुछ रहता नहीं वयस्क इंसान के पास। या फिर बीमारियाँ। पूरी ज़िन्दगी जतन कर, परवरिश कर संभाली हुई बीमारियाँ। या फिर सफ़ेद बाल या सालों से एक ही तरह हंसने की वजह से पड़ी रेखाएँ। अथवा ज़माने से बैग उठाते उठाते घूमने से बाएँ हाथ की हथेली में पड़े छाले। बायाँ हाथ पूरी ज़िन्दगी दुनिया की ग़ुलामी करता रहा है और दाहिना सलामें।

अब बायें हाथ के छाले और दाहिने की सलामें शहर में छोड़कर वह बाहर निकल गया था। रेस्ट्राँ कार का मलयाली मुनीम बहुत तेज़ी से बिल फाड़ रहा था। मकाई के खेत अब नहीं थे। उर्वर ज़मीन थी, पश्चिम की ओर दौड़ती उर्वर ज़मीन और आसमान, पश्चिम के पेड़ों की ओर नील-कालिमा पकड़ता अपरिचित आसमान।

विचार संलग्न, क्रमबद्ध, सिलसिलेवार आ सके वैसी स्थिति नहीं थी। दो जहानों का ख़ुदा उसके दो जहानों को पहचानता था इसलिए वह इस शहर को पहचानता था। उसने गिद्ध की आँखों से यह शहर यह शहर देखा था, कुत्ते की नाक से यह शहर सूंघा था, सूवर के जबड़ों से इस शहर में खाया था: यह शहर उसकी भूख, जुराबों, क्रोध और कहाकों में फ़ैल गया था। यहाँ वह बच्चे की तरह आँखें खुली रख, कुछ देखे बिना अपने ही विचारों में लीन रह सकता था, यहाँ के हर चेहरे की रेखा को, हरेक पथरीली तह पर जमी धूल की पर्त को, आसमान को, धूप को, बरसात में जमे पानी को, दिशाओं को, अगली सुबह केअख़बार की हेडलाइनों को – सबको वह आत्मीयता से पहचानता था और वह सभी दौड़ती ट्रेन की गड़गड़ाहट में खो गए थे।

और बेकारी के दिन गुज़ारे थे इस शहर में। और इश्क़ के। महत्त्वाकांक्षाओं को ज़मींदोस्त होते देखा था इस शहर में। वर्षों से इन्सानों के साथ बिरादरी का ताल्लुक़ निभाया था इस शहर में। ख़ाकी कमीज़ और सफ़ेद टोपी पहनकर सिनेमा के नीचे अख़बार बेचते आदमी से वह सालों से अख़बार खरीदता था। गन्ने का रास निचोकर देनेवाले पहलवान के पास वह रस पीता था। गंजे सिरवाले एक हजाम से वह कॉलेज के दिनों से बाल कटवाता था। मोठे चश्मेवाले दर्जी से वह पैंट सिलवाता था – सालों से। कॉफ़ी – हाउज़ का धारदार मूछवालावाला एक वेटर हमेशा खबर पूछता था। रोज़ की बस के कंडक्टरों को वह चेहरे से पहचानता था। एयर-लाइन की रिसेप्शनिस्ट छूटती तब वह देखता रहता। रेसकोर्स के पास एक कोकाकोला वाले और नदी के तट पर हॉटल के नीचे बैठे पानवाले से सालों से लगाव था। बेनाम लोग। उनके नाम भीमालूम नहीं थे। वे लोग अचानक मर जाएंगे तब पता नहीं चलेगा। शायद वे लोग ही सोचेंगे कि सालों से रोज़ाना आनेवाला ‘वह’ अब आता नहीं। आये बिना रहता नहीं … शायद मर गया होगा।

और शहर उसकी हड्डिओं के प्रवाही तक उसके शरीर में उतर चुका था। उस शहर में रात में होती आवाज़ों से वह समय का अनुमान लगा सकता था। आधी रात आँख खोलकर आकाश की ओर देखकर सोच सकता – कितने बजे हैं। भरी दुपहरी में आराम से सोकर स्वप्न देख सकता था। आँखें बंद कर सिर्फ़ साँस लेकर वह रोज़ के मार्गों के बस स्टॉप को पहचान सकता था। उस शहर की हवा में उसका रेडियो सुंदर बजता था, उसकी ब्लेड धारदार चलती थी, उसके जूतों का पॉलिश ज़्यादा चमकता था, केटली की चाय को फ्लैनेल की टीकोज़ी और गर्म रखती थी, अलमारी का हैंडल ज़्यादा सफ़ाई से घूमता था, सिगरेट का धुँआ ज़्यादा स्वप्निल उड़ता था। अँधा इंसान अन्धकार को पहचानता है वैसे वह उस शहर की हवा को पहचानता था।

जाड़े आए थे और दीवालियाँ। नए अंडे, और होली पर अबीर गुलाल की खुशबू। पंखे की आवाज़ भी उसके अस्तित्त्व में बुन गई थी। और मौत की खबरें। कोर्ट और शनिवार-दर-शनिवार आता मासिक। सिनेमाहॉल की कुर्सियाँ। बियर और मक्खन खरीदता था वह दुकानें। परिचित आशाएँ, परिचित अपरिचय। सभी रह गया था पीछे; सिर्फ हरी बत्ती का प्रकाश परछाई के डर की तरह शायद साथ साथ आ रहा था और उसमें पीछे मुड़कर देखने की हिम्मत नहीं थी। पीछे मुड़कर देखने से सब कुछ एकसाथ खनखनाहट के साथ, हमेशा के लिए खो जानेवाला था। शायद।

जो जी जा रही हो वही चीज़ आत्मकथा होती है। जो जी जा चुकी हो वह संभवतः और किसी की कहानी होती है। जिसकी जीभ में वाचा नहीं होती ऐसे किसी की कहानी, कही न जा सके ऐसी, आत्मकथा को उत्तरार्ध और पूर्वार्ध नहीं होते। एक खत्म होती है, दूसरी शुरू हो जाती है। शायद – अगर वह आत्मकथा हो तो वह अलग अलग लोगों की होती है। बिल देकर वह रेस्ट्रों कार से अपने डिब्बे की ओर चला।

उसकी बर्थ आ गई। वह लेट गया।

*

फिर काफी समय बाद एक सहप्रवासी ने प्रश्न करने की रुचि दिखाई। रफ़्ता रफ़्ता पूछा: ‘कहाँ जा रहे हैं?’

‘मुंबई।’

‘काम से जा रहे होंगे?’

‘नहीं, हमेशा के लिए।’

‘धंधा करते हैं?’

‘नहीं।’

‘नौकरी करते होंगे?’

‘नहीं।’

‘परिवार वहाँ होगा?’

‘शादी नहीं की।’

‘कितनी उम्र हुई?’

‘चालीस।’

फिर सहप्रवासी की ज़रूरत न रही। सवाल आते ही रहे। खुद ही प्रवासी था और वही उसका सहप्रवासी भी था।

‘क्या किया चालीस साल तक?’

‘धंधा किया। फिर बंद किया।’

‘अब?’

‘पता नहीं।’

‘क्या इच्छा रखते हैं?’

‘फसाद, युद्ध, हुल्लड़। खून – खराबा। सब बहुत असह्य तरीके से सह्य बन गए हैं। इस तरह सड़ते रहने का कोई मतलब नहीं।’

‘इसलिए शहर छोड़ दिया?’

‘स्मृति के घाव भर गए थे वह पसंद नहीं आया। इसलिए घाव फिर से कुरेद लिए।’

‘वह हँसा।’

सच और झूठ एक ही बन रहे थे, गर्भाशय और कब्रस्तान की तरह।

बर्थ पर ही नींद आ गई। आसमान जितने ऊँचे मिनारे पर एक महाकाय छिपकली उसके सामने ताक रही थी और उसको लगा कि वह एक चींटी की तरह उस महाकाय छिपकली के हिलते गले की तरफ खिंचता सरक रहा था। आँखें खुल गईं।

उसने फिर से खुश होकर आँखें बंद की।

क्रमशः सपनों में भी विविधता आ रही थी। खुशकिस्मती। खुशकिस्मती ….

 

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