दोमानिको

चन्द्रकान्त बक्षी

उन्नीसवी सदी के दूसरे या तीसरे दशक का समय था जब देश की अंधाधुंध अवस्था ने नक़्शे पर अलग अलग रंग भरने शुरू कर दिए थे। मराठा पेशवाई का सूरज डूब चुका था और बाजीराव ने अंग्रेज़ मालिकी स्वीकार कर ली थी।

मैसूर में सुलतान टीपू का क़त्ल हुए को भी एक पीढ़ी गुज़र चुकी थी। मध्य भारत की स्थिति अत्यंत धुंधली थी। सैन्य से फ़रार हुए सिपाहिओं ने लूट और मुख्य रास्तों पर हत्याओं को धार्मिक स्वरूप दे दिया था।

ठग स्त्री-पुरुष-बच्चों की हर साल हज़ारों की तादाद में ठंडे कलेजे से, सिफत से सफाई कर रहे थे। तंबुओं के लिए लकड़ियाँ गाड़नेवाले चोर बन गए थे और उनका क्रूर दौर-ए-सितम बेरोकटोक चल रहा था। अवध का अंतिम मुस्लिम गढ़ खंडरनुमा खड़ा था। उत्तर में नेपाल परास्त हो चुका था।

पंजाब के सीख मिसलदारों की जगह एक आँखवाला रणजीतसिंह फैल रहा था। सिंधु के पार बेशुमार सरहदी जातियाँ थी और आरपार दुर्रानी के वारिस अफ़ग़ान थे। देशभर में सतिओं को जलाया जा रहा था, फ्रेंच तोपची सेना तैयार कर रहे थे।

अंग्रेज़ इन्फंट्री समग्र उत्तर भारत के ऊपर फुंक चुकी थी और राजधानी कलकत्ता में एक नए धर्म – ब्रह्मसमाज का स्थापक राम मोहनराय स्पेन की प्रजा को संविधान मिला उस ख़ुशी में टाउन हॉल में नए विचारों, नई राजनीति का प्रचार कर रहा था। कर्नल स्लीमन ने ठगों की समस्या पर अभ्यास शुरू किया था और ठगों को नामशेष करने के कदम उठाए थे।

उस वक़्त बिहार से होकर बंगाल में प्रवेश कर सैंकड़ों धाराओं में टूटती गंगा पर नदी के ठगों की नई टोलियाँ छह्न रूप से ठगी करतीं थीं। तब उन्नीसवी सदी के दूसरे-तीसरे दशक का समय था। तब लालपुरा की गंगा के किनारे ठहराई हुई नावों के पास एक वृद्धा और एक जवान, जो उसका पुत्र लगता था, आए, और माझिओं की और देखते हुए पूछे: ‘मोकामा कौन जाएगा?’

‘कहाँ जाना है माँजी?’ एक माझी ने पूछा।

‘मोकामा घाट।’

माझी बैठा था, प्याज़ के कतरे और मिर्च की कतरिओं का एक छोटा ढेर कांसे के बर्तन में पड़ा था। खड़े होकर तार पर लटकती हुई एक मैली लुंगी के कतरे से हाथ पोंछकर वह नैया के किनारे पर आया। वृद्धा और जवान को ध्यान से देखकर माझी बोला – ‘ले जाऊँगा।’

पीछे से ढलते सूर्य की लालिमा में माझी का ऊपर से खुला देह लाल-लाल चमक रहा था और नौकाएँ घिरती परछाइओं में और बड़ी, और पानी और गहरा लग रहा था। पीछे एक पुरानी मस्जिद थी।

पूर्व में सर्दी की शामें जल्दी ढ़लती थीं। बारिश हफ्ते पहले ख़त्म हुई थी। दोपहर को सख्त धूप गिरती थी। किसान कहते कि वर्षा में उगी हुई फसल पकाने के लिए यह गर्मी अच्छी है, फसलें भरपूर पकेंगीं। सुबह नए सवेरे की छाँह में ठण्ड की चमक थी। देखते ही देखते कुल्ला करके हाथ-मुँह देखकर नमाज़ पढ़ने तक में ही शाम नदी के दोनों किनारों पर जम गई थी। बीच में डूबती धूप पानी की सतह पर कुछ समय तैर रही थी।

‘कितना समय लगेगा?’ जवान ने पूछा।

माझी ने कहा, देर रात चाँद सर पर आएगा तब हम अपने मोकामा पर पहुँच जाएंगे। माझी समझ गया कि प्रवासिओं का इतनी शाम और देर रात को सफ़र करने का कुछ ख़ास प्रयोजन था।

वृद्धा और जवान आपस में ही कुछ गुफ्तगू करने लगे। थोड़ी देर माझी दोनों को फुसफुसाते देखता रहा फिर बोला, ‘एक ही टाका लूंगा दोनों का।’

‘टाका के बारे में हम नहीं सोच रहे।’

‘फिर?’

‘आज-कल नदी पर ठगी बहुत होती है और वक़्त रात का है। मैं अपनी माँ के साथ जा रहा हूँ और …’ जवान आदमी बोला, ‘अभी निकले बिना चलेगा नहीं।’

माझी खिलखिलाकर हँसा। उसके खुले देह पर माँसपेशियाँ थिरक गईं। रक्त संध्या में माझी के खुले दांत भयंकर और खूबसूरत, दोनों लग रहे थे। आसपास लगभग चिपककर एक-दो नावें पड़ी थीं।

‘मैं हूँ फिर आपको घबराना क्या?’ माझी सांत्वना देते बोला, ‘मैं माल भरकर जाता हूँ, लाता हूँ। वाराणसी तक मेरी नौका जाती है। अभी तक किसी ठग की भेंट नहीं हुई। जिस दिन नदी पर कोई ठग मिलेगा उस दिन गठरी फेंककर उसे कुत्ते की तरह गठरी में भर लूंगा। आप दोनों बिलकुल घबराइए नहीं।’

जवान देखता रहा, ‘माझी, आपको पता नहीं। मोकामा गंगा पर एक नया समुद्री डाकू जन्मा है। उसका नाम दोमानिको है। पूरा किनारा उसके नाम से काँपता है। सिर्फ कंपनी सरकार के जहाज़ उससे घबराते नहीं और वह कंपनी सरकार के जहाज़ लूटता नहीं।’

‘मैंने तो उसका नाम भी नहीं सुना। नाम क्या बताया आपने?’ माझी ने पूछा।

‘दोमानिको’

माझी के चेहरे पर आश्चर्य झलक उठा।

‘बंगाली है?’

‘नहीं, वह है अरबी समंदर के मालद्वीप का। बीच में एक फिरंगी व्यापारी के जहाज़ पर काम करता था।’

‘नदी पर ठगी कब से शुरू की?’

‘पता नहीं।’ जवान बोलता रहा, ‘पर आदमी बड़ा खतरनाक है और आपने उसका नाम भी नहीं सुना? गंगा में कितने वक़्त से नाव चला रहे हैं?’

‘छः वर्ष हो गए। पहले मेरा भाई चलाता था पर उसे खून की संग्रहणी हो गई और मर गया। तब से यह नाव मैं घुमाता हूँ।’माझी ने ग़मगीन स्वर में कहा, फिर उसने स्वर बदल दिया, ‘आइए माँजी, चिंता मत कीजिए। मैं वाराणसी से बहुत कपड़ा लाता हूँ मेरी नाव में। ढाका से मलमल भी लाता हूँ। कोई डर नहीं मेरी नौका में, और आपके पास लूटने के लिए होगा क्या?’

वृद्धा चुप रही। जवान ने वृद्धा की ओर देखा, फिर माझी की ओर। फिर हिचकिचाते हुए कहा, ‘हाँ …’ क्षणार्ध रुककर कहा, ‘हमारे पास लूटने को होगा क्या?’

वृद्धा को नौका में चढ़ाकर जवान जूट की खाली थैलिओं का बंडल लेकर नौका में आ गया। माझी ने रस्सियाँ खोलकर पतवार चढ़ाई। बरसात के बाद के प्रवास का मौसम पुरबहार में शुरू होने को अभी आठ – दस दिन बाकी थे और अभी कृष्णपक्ष चल रहा था। चांदनी हो तब नदी का सफ़र ज़्यादा अनुकूल रहता था। अंधकार में लोग कम सफ़र करते थे। अब बारिश रुकने से रास्ते खुलने लगे थे फिर भी नदिओं में पानी छलक गए थे।

नाव की पतवार में हवा भर गई, पीछे बैठा हुआ एक इन्सान दिशा बताने लगा, नाव किनारे से पानी के मध्य की ओर खिसकने लगी।

‘क्या नाम है आपका?’ जवान ने पूछा।

‘मेरा नाम?’ माझी को आश्चर्य हुआ, फिर वह बोला, कुछ अनिच्छा से – ‘नौनिहालसिंघ’.

‘नौनिहालसिंघ! आपने दोमानिको को देखा है?’ जवान ने पूछा।

‘मैंने तो उसका नाम भी आप से सुना।’

माझी नौनिहालसिंघ ने पानी में थूंककर नाव प्रवाह में ली।

*

नाव प्रवाह की दिशा में आ गई। शाम के अंधेरे ने पानी को वज़नदार और काला बना दिया। माझी के सहायक ने नाव के मध्य में आकर अंदर उतारकर लालटेन जलाया। फिर वह लालटेन लेकर बाहर आया और लालटेन को कड़े पर लटकाकर वह फिर से नौका के दूसरे छोर पर चला गया। वह पतला, छरहरा लड़का था और बचपन से ही नदी को जानता हो वैसे उसके हावभाव थे।

अंधेरा बढ़ता चला और जैसे नौका नदी के बीच में आती गई वैसे वैसे किनारे की आवाज़ें दूर होती अश्राव्य हो गईं।खुले किनारे का दृश्य लगभग अदृश्य होने लगा। नदी के चौड़े फैलाव पर बिना चंद्र के आसमान का अंधकार ढँक गया था।

आसपास नावों का आवागमन बंद था और नदी में नयी बारिश का और उभरी हुई छोटी छोटी नदिओं की रेल का पानी खूब तेज़ी से बह रहा था। जवान ने देखा कि नदी ऊपर के चढ़ाव में कोई तूफ़ान मचाकर आई हो ऐसा लग रहा था, क्यों कि पेड़ों की टूटी टहनियाँ, डालियाँ-पत्ते, कभी एकाधे जानवर की दुर्गंध देती हुई लाश भी पानी के तेज़ प्रवाह में, लालटेन के प्रकाश में बहती दिखाई दे रही थी।

फिर उसे ख़याल आया, मोकामा के पास तो कहा जाता था कि, नदी में चक्रवात होता है, और साल में एक बार यहाँ अंधेरी रात में नदी एक भोग लेती है – बरसात के बाद के प्रवासिओं में से। यह ख़याल आते ही जवान को मन ही मन में खूब हँसी भी आई – वह, और नदी के भोग के बारे में सोच रहा था! उसको लगा कि शायद वृद्धा साथ थी और वह बारिश के बाद सफ़र कर रहा था इसी लिए उसको ऐसे ख़याल आ रहे थे।

‘आप लोग कहाँ तक जा रहे हैं?’ जवान ने माझी को पूछा।

‘बरसात में किनारे किनारे ही नाव खेते रहते हैं, क्योंकि बाढ़ आनी होती है तब बहुत बार जान का ख़तरा होता है।’

‘बाढ़ में क्या होता है?’ जवान ने पूछा।

‘अगर नौका नदी के बीच में हो तो उलट जाती है। किनारे की ओर हो तो पानी उसे पत्थरों के ऊपर फेंक देता है।’ नौनिहालसिंघ बोलता गया। उसने वृद्धा की ओर देखा फिर जवान की ओर। ‘आपने नदी का सफ़र नहीं किया? माँजी ने तो किया होगा।’

‘हाँ।’ जवान ने कहा, ‘मेरी माँ नाव पर गंगा पर बहुत घूमी है, पर मैं नदी के रस्ते से ज़्यादा प्रवास नहीं करता। छोटा था तब माँ के साथ गया था बस वही। और भी एक बात है।’ जवान ने दूर बैठे हुए सहायक की ओर देखा, वह सुन न सके उतना दूर था। ‘दूसरी बात यह है कि ज़मीन पर ठग मिले तो सामना भी कर सकते हैं।

हम दौड़ सकते हैं, हथियार इस्तेमाल कर सकते हैं। नदी पर ठग मिल जाए तो कोई क्या ही कर सकता है? जाएगा कहाँ दौड़कर? और नौका तो उसकी होती है – इसी लिए मुझे नदीमार्ग पसंद नहीं। पर अभी बरसात की वजह से रास्ते बंद हैं और काफ़िले शुरू होने में अभी पंद्रह दिन की देर है इसी लिए हमको नदी से मोकामा घाट जाना पड़ रहा है, वरना तो मैं ज़मीन के रास्ते जाने में मानता हूँ।’

माझी नौनिहालसिंघ कुछ बोला नहीं। चौकोर पतवार में हवा भर गई थी और नौका बराबर दिशा पकड़कर तेज़ गति से बह रही थी। कड़े में लटकाया हुआ लालटेन सिर्फ हिलता और ज़ंग लगे कड़े से बीच बीच में हवा – प्रतिहवा तेज़ बह जाए तब कड़कड़ आवाज़ आ जाती जो रात की शांति में और बड़ी लगती थी। पानी पर टूट- टूटकर सरकते लालटेन के प्रकाश के टुकड़े और पानी दबाकर गोल लय में घुमड़ती, सहायक की पतवार की भीनी आवाज़ों के सिवा रात की ठंडी शांति में ख़ास कोई खलल नहीं था।

नौनिहालसिंघ ने पूछा, ‘आपने दोमानिको को देखा है?’

जवान माझी की ओर देखता रहा। वृद्धा ने भी सिर ऊपर कर माझी को देखा। उसकी उनिंदी, लगभग झपकी खाई हुई आंखें खुली। वृद्धा को रात में ज़्यादा दिखता भी नहीं था पर उसने कान से प्रश्न सुना था और दोमानिको शब्द कान खोलदेनेवाला था।

‘हाँ एक बार। जवान ने कहा।’

‘कब?’ नौनिहालसिंघ ने पूछा।

‘मैंने एक बार सालों पहले उसे एक अदालत में देखा था। गवाही देने आया था – तब उसने नदी पर लूट शुरू नहीं की थी। मुकद्दमा ख़तम होने के बाद वह नदी का ठग बना। पर मुझे आश्चर्य इस बात का है कि आपने दोमनिको का नाम नहीं सुना।’

‘मेरी अभी उसके साथ मुलाक़ात नहीं हुई।’

‘हम कहाँ तक पहुंचे माझी?’ वृद्धा ने पहली बार प्रश्न पूछा।

‘माँजी, चांद सिर पर आएगा तब हम मोकामा घाट पर पहुंच जाएंगे।’

‘अभी अंधियारा है इसलिए चांद उगेगा ही बहुत देर से।’ जवान बोला।

‘आपका इतनी देर से कैसे जाना हुआ? सुबह चले होते तो शाम तक पहुँच जाते।’

फिर माझी बोला, ‘पर रात को जल्दी पहुँच सकते हैं। दिन में पानी से ज़्यादा समय लगता है।’

‘अच्छा? हमको पता होता तो सुबह निकलते, पर माँ ने ज़िद की कि अभी निकालना है।’

‘यात्रा के लिए तो नहीं ही जा रहे होंगे?’

‘नहीं। जवान बताने लगा, ‘मेरे मामा मोकामा में गुज़र गए हैं – मेरी माँ के भाई।’ माँ ने ज़िद की कि मुझे अभी निकालना है। इसलिए अभी निकले, और मैंने कहा भी कि नदी पर ठंडी हवा चल रही होगी। रात को तो ठंडी भी खूब लगेगी। पर घुड़सवार शाम को कह गया ‘माँ बोली मैं अब लालपुरा में रह नहीं पाऊंगी। मुझे अपने भाई के घर ही जाना है।

मैंने कहा, नदी पर अब सलामती नहीं रही। हम सुबह निकलेंगे पर उन्होंने माना नहीं इसलिए मैंने ज़ोर ज़बरदस्ती करके माँ को चद्दर में लपेटा और ऊपर कंबल लापेटाया। सिर बंधा लिया। सिर में या कान में नदी की हवा घुस जाएगी तो परेशानी हो जाएगी। इस उम्र में एकाधा रोग घर कर जाए तो चिता तक साथ आए – ‘

‘हाँ हाँ,’ नौनिहालसिंघ बोलने लगा, ‘सही बात है।’ उसने वृद्धा के सामने देखा, पूरे शरीर और सिर पर कंबल लिपटी हुई वृद्धा का सिर्फ़ चेहरा दिख रहा था झुर्रियों वाला। वह अंधकार में बैठी पर रात को उसको ज़्यादा दिखता नहीं था और प्रकाश भी सहन नहीं हो रहा था। ‘माँजी को किसी बात की चिंता करने की ज़रूरत नहीं। चांद सिर पर आने से पहले तो हम मोकामा पहुंच जाएंगे, क्योंकि हवा तेज़ है और प्रवाह सीधा है।’

फिर नौनिहालसिंघ ने नौका की गति बढ़ाई और कहा, ‘ कोई लुटारों की चिंता मत कीजिए। लुटारों के जहाज़ों से भी तेज़ में अपनी नौकाएं लेकर जाता हूं। ऐसी हवा हो और नदी साफ हो तो – ‘

देर रात को मोकामा के घाट का लहराता प्रकाश दिखा। नौनिहालसिंघ की नौका किनारे के पास आई और घाट से बराबर लगी। पहले वृद्धा को सम्हालकर उतारकर जवान उतरा। सहारा देकर, नौनिहालसिंघ का शुक्र अदाकार दोनों अदृश्य हो गए – अंधकारमय पिछली रात में सोए हुए रास्तों पर।

नौनिहालसिंघ ने आराम से शरीर को लंबा किया। सहायक ने लालटेन बुझा दिया, फिर वह पास आया – ‘ भैया’ सहायक ने कहा,’ मैंने दोमानिको का नाम सुना है। वह गंगाकिनारे सबसे बड़ा डाकु है। ‘

नौनिहालसिंघ हँसा ‘नाम तो मैंने भी सुना है, पर अगर ऐसा बोलता तो ये दोनों बेचारे घबरा जाते और आते नहीं। या फिर नौका बीच में ही किनारे करनी पड़ती।’ रात का समय और अंधेरा है इसलिए डर भी ज़्यादा लगता है। बाकी दोमानिको तो गंगा का राजा है। ज़मीन पर कंपनी सरकार की हुकूमत चलती है, पानी पर दोमानिको की।’

‘फ़िलहाल वह काफ़ी समय से शांत है।’

‘होगा। तू भी शांत हो जा। सो जा। सुबह धूप होते उठेंगे।’

दोनों आदमी लिहाफ़ ओढ़कर नदी की हवा में नाव की पट्टियों पर ही सो गए – पर सोने से पहले सहायक ने पतवार उतारकर बांध ली।

*

धूप में घाट पर कंपनी सरकार का एक जहाज़ आया तब सोए हुए माझी हड़बड़ाकर जाग गए। जागे हुए सतर्क हो गए।

जहाज़ पास लाकर एक फिरंगी जैसे दिखते आदमी ने पूछा ‘रात को लालपुर से एक बूढ़ी औरत और एक मर्द को नाव में कौन लाया था?’

नौनिहाल सिंघ बोला ‘क्यों, मैं लाया था।’

‘कहाँ गए वे?’

‘सामने अंधेरा था। घाट से उतर कर चले गए।’

‘कितनी देर हुई?’

‘वे तो आधी रात को गए। क्यों साहब?’

फिरंगी के मुंह पर लालिमा की झलक उभर आई। ‘माझी आपको पता है आपकी नौका में कौन था?’

‘कौन?’

‘दोमानिको। वह छूटकर भागा है और इस ओर आ गया है।’ फिरंगी बोला।

माझी नौनिहाल सिंघ के चेहरे पर कालिमा छा गई। जिस जवान के साथ उसने रातभर बात की थी वही मशहूर ठग गंगा का राजा दोमानिको था! एक कंपन सा आ गया।

‘आप तकदीरवाले हो माझी, बच गए। नहीं तो आधी नदी में ही वह आप दोनों को काटकर फेंक देता। वह बूढ़ी औरत आपने देखी न, वह औरत नहीं थी। वही दोमानिको ठग था!’ और फिरंगी बोला ‘उसके साथ एक जवान शागिर्द भी था।’

धूप में ही नौनिहालसिंघ को चक्कर आ गए।

-चन्द्रकान्त बक्षी (1932 – 2006)

 

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