कर्णलोक [1]

कर्णलोक, ध्रुव भट्ट

मैं चाहती हूँ कि गुजराती साहित्य की सबसे अच्छी, मेरी पसंदीदा कृतियाँ आप तक सब से पहले पहुंचाऊं। विदेश में गुजराती किताबों के अभाव से गुजराती साहित्य की अच्छी कहानियों का मेरा संपुट खत्म होता चला है और पिछले दो महिनों से कहानियों के अनुवाद कर अब मुझमें इतनी हिम्मत आई है कि, नवलिकाओं के अनुवाद करने की गुस्ताख़ी कर सकू। आनेवाले कई सप्ताहों तक इस कथा के प्रकरण धारावाहिक रूप में यहाँ प्रस्तुत होंगे।

 


‘मैंने उसे मारा है। डाली टूट गई तब तक धुलाई की।’  दुर्गा बोल रही थी। साहब शांति से उसे सुन रहे थे। ‘पहले उन लोगों ने गालियाँ दी। उस वक्त हम तो सिर्फ खड़े ही थे। कुछ कर नहीं रहे थे फिर भी।  फिर उन लोगों ने हमें मारना शुरू किया। इतनी छोटी करमी को भी उन लोगों ने …’ दुर्गा आगे बोल न पाई।

यह ही होना था। माधो और लक्ष्मी ने कितना भी सिखाया हो, फिर भी दुर्गा ने जो किया था वह ही वह बोलने वाली थी। इस जगत में कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जिन्हें दुनिया से छिपाने जैसा भी कुछ होता है उस बात की समझ नहीं होती। ऐसे विरल जनों को कहाँ, क्या बोलना चाहिए यह सिखाने का सामर्थ्य किसी में नहीं होता।

‘उन लोगों ने मतलब बेटा, किन किन लोगों ने?’ दुर्गा ने ‘उन लोग’ शब्द का इस्तेमाल किया इससे ज़रा आश्चर्यचकित साहब ने भावुक स्वर में पूछा।

‘यह नलिनी बहन ने।’ नलिनी बहन के सामने ही बिलकुल हिचकियाए बिना दुर्गा ने कहा। उसकी आँखों में ज़रा भी डर नहीं था।

‘उस औरत को आप ‘वे लोग’ कहते हैं ?’ साहब के मन में हुआ प्रश्न मेरे मन में भी जागा था।

‘वे लोग हमें भी ‘वे लोग’ ही कहते हैं। दुर्गा खुद को जो सहज, सरल लगा वह बोली।

साहब ने बहन के सामने देखा और ऊपर ऊपर से पूछा ‘आप आपस में ‘वे लोग’ बनकर रहने का वातावरण बदल नहीं सकते?’ इस तरह पूछे गए प्रश्नों के उत्तर दिए नहीं जाते।

दुर्गा ऐसे सीधा सीधा बोल देगी उसका अंदाज़ा शायद किसी को, स्वयं नलिनी बहन को भी नहीं था; तो फिर बेचारे माधो और लक्ष्मी को तो कहाँ से होगा? साहबों के सामने कचहरी में बुलाकर पूछा जाए तब झूठा बयान देना सिखाने के अपने हुनर पर माधो और लक्ष्मी को चाहे कितना ही भरोसा क्यों न हो; पर उस दिन उनकी शिक्षा काम नहीं आई। परिणामस्वरूप जो होना था वह ही हुआ। माधो ने लक्ष्मी की ओर देखकर मुँह बिगाड़ा। लक्ष्मी ने सिर पर हाथ पटका।

चोरी करती, धड़ाधड़ी सामने जवाब देती, कोई न कोई फ़साद मचाती रहती, चालाक और शैतान मानी जाती दुर्गा ने खरे समय पर, अंतिम घड़ी में लक्ष्मी-माधो का कहा, सिखाया सब बिसरकर जो हुआ था वह ही बोल दिया।

‘लड़की खुद तो सब कबूल कर रही है। अब क्या करना है वह आप बताईए।’ अधिकारी नलिनी बहन की ओर देखकर बोला।

‘गुनाह कर के कबूलने में उन लोगों को क्या शर्म?’ नलिनी बहन ने अपनी हल्की भूरी साड़ी का पल्लू खींचकर जवाब दिया। उन्होंने नेहा बहन की ओर भी देख लिया। नेहा बहन सफ़ेद सलवार कमीज़ में शांत और विचारमग्न बैठीं रहीं। नलिनी बहन की आँखें उन्होंने पढ़ी या नहीं यह समझ नहीं आ रहा था।

दुर्गा इन किसी की भी तरफ ध्यान दिए बिना अधिकारी की ओर देखती रही। नलिनी बहन की बात ने उसकी स्वच्छ चमकीली आँखों में अपार आश्चर्य भर दिया। इस पूरी बात में गुनाह क्या और कहाँ था यह दुर्गा की समझ में आ रहा हो ऐसा मालूम नहीं पड़ता था।

साहब शिकायत के फैसले की, सज़ा किस तरह हो सकती है इस मुद्दे की, और दूसरी बातें कर रहे थे उस वक्त दुर्गा तो अपना दिल साबुत रहे और आंसुओं का समंदर न बह जाए इस कोशिश में लगी हुई थी। ऐसा नहीं होता तो वह खुद ही जाँच-अधिकारी को सब कुछ समझाती।

वह कहती, ‘आप ही बताइए साहब, ताले में बंद करनेवला गुनाहगार ठहरता है या फिर बंदी को छुड़ाने वाला? बच्चों के लिए आई हुई खाने-पीने की, पहनने-ओढ़ने की चीज़ों को ताले-चाबी के पीछे छिपाए रखनेवाले, सब कुछ अपने घर ले जानेवाले गुनाहगार कहलाते हैं या फिर उसे छुड़ाकर बच्चों तक पहुंचाने वाले!’

उस उम्र में ऐसा भाषण शायद उसको नहीं आता फिर भी दुर्गा इतना तो ज़रूर कहती, ‘उस दिन हमने एक भी अमरुद तोड़ा नहीं था। तोड़ा हो तो भी उनके घर का तो नहीं तोड़ा था। बाग़ के पेड़ पर उगे अमरुद तोड़े इसलिए उन लोगों को किसी को मारने का तो हक़ नहीं।’ फिर भी उन्होंने हमें मारा, छड़ी से मारा, मेरी ज़ात पर गाली दी, फिर भी मैंने कुछ नहीं किया पर करमी को छड़ी लगाई…’

इसके बाद की सारी बात तो अधिकारी की टेबल पर टाइप की हुई पड़ी थी। उसमें नलिनी बहन ने जो लिखा था वह सब कुछ हुआ था।

दुर्गा दृढ़तापूर्वक मानती थी कि जो होना चाहिए था वही हुआ था। इतनी सीधी बात इतने बड़े और भले दिखते अधिकारी को न समझ आए ऐसा तो होनेवाला नहीं था; पर दुर्गा ऐसा कुछ कह न पाई। वह कह पाई होती तो भी ऐसी बातें समझ सके ऐसा कोई अधिकारी कहीं हो सकता था या नहीं यह यक्षप्रश्न से भी जटिल सवाल है।

आज समझ सकता हूँ कि उस बारह साल की लड़की को, खुद ने क्या गुनाह किया है यह समझने की ज़रुरत ही नहीं थी। अगर वह समझने का प्रयास करे भी तो उस घड़ी पर ही नहीं, जीवनभर उसको समझ नहीं आनेवाला था; क्यों कि उसका किया कोई भी कृत्या ‘गुनाह’ की उस बच्ची की अपनी समझ की परिभाषा में बैठता नहीं था।

वह छोटी, छः वर्ष की थी तब से रसोई-भंडार में घुसकर ताले-चाबी में पड़े बिस्किट, दूध के पाउडर या ढंके भोजन को मुक्त करने की कला उसने साध्य कर ली थी। अँधेरी रात में भी पीली दीवार कूदकर किसी भी तरीके से वह आम तोड़कर ला सकती थी; पर ऐसे बेजोड़ कौशल्य को गुनाह कहते हैं यह बात; उस कौशल्य दिखाने की सज़ा भुगतने के बावजूद वह कभी स्वीकार नहीं कर पाई थी।

उस दिन पूछताछ चल रही थी। बाहर गाँव से आए अधिकारी टेबल के पीछे कुर्सी पर बैठे थे। एक तरफ नेहा बहन, दूसरी तरफ भारी भरखम चेहरा धारण किये रखने के प्रयत्न में उलझी नलिनी बहन। पीछे दीवार के पास माधो। सामने हमेशा की तरह नए कपड़े पहनकर खड़ी लक्ष्मी।

नंदू दरवाज़े के बाहर आँगन में बैठा था। दुर्गा लाल रंग के फूलों वाला लंबी बांह का फ्रॉक पहनकर, गुरु द्रोण के पद्म में निडरता से प्रवेश किए हुए बाल अभिमन्यु की तरह, टेबल के सामने ही स्वस्थ खड़ी रहकर जवाब दे रही थी।

उस पीली दीवार से घिरे मकान के निवासिओं का थोड़ा-बहुत परिचय हुए मुझे तो अभी दस – पंद्रह दिन ही हुए थे। जिस रात उस पीली दीवार वाले मकान पर पहुँचना हुआ उस सुबह ही दुर्गा और नलिनी बहन के बीच जो हुआ वह मुझे बिलकुल नज़रों के सामने देखने मिला था।

उस सुबह के बाद के दो दिन उस जगह का रूटीन इन्स्पेक्शन था। इस इन्स्पेक्शन के दौरान ही नलिनी बहन ने लिखित शिकायत की थी।

नलिनी बहन ने कागज़ तैयार किये हैं यह बात माधो जानता था। थोड़े दिन तो वह कुछ बोला नहीं था। फिर एक बार ऐसे ही आया हो उस तरह दुकान पर आया था। स्टूल खींच कर पैर पर पैर चढ़ा कर बैठते बोला, ‘दुर्गा भले ही शरारती हो पर बेचारी भले दिल की है। चोरी करती है, सामने जवाब देती है पर तुम ही बताओ भानजे, ऐसा तो आजकल कौन नहीं करता!’

जवाब न मिले फिर भी माधो अपनी बात रोक दे ऐसा होनेवाला नहीं था। उसकी ओर थोड़ा भी ध्यान दिए बिना जो कर रहे हो वह करते रहो तो भी अपनी बात की उपेक्षा हो रही है वैसा वह मानने वाला नहीं, इसकी गारंटी कोई भी दे सकता था।

दांत बाहर दिखे वैसे माधो हंसा और आगे बोला, ‘भंडार से कितनी बार चीज़ें गई हैं। मैं जानू कि दुर्गा उठाती है; पर बड़ी बात न हो तो शिकायत नहीं करता। हम भी जानते हैं, और तुम ही कहो, इतनी सी लड़की की शिकायत थोड़े ही करेंगे?’

‘क्या शिकायत? कोई चोरी हुई है?’ ज़रा चौंक कर मैंने पूछा।

माधो क्या कह रहा है यह जब कोई समझता नहीं तब वह ज़रा चिढ़ जाता। उसे लगता था कि उसकी बात न समझने का ढोंग हो रहा है। उस वक्त उसके काले रुक्ष चेहरे पर कपटी हास्य चमकता।

माधो साशंक बोला, ‘तो लाला भाई, आप भी माधो को चक्कर में घुमाने की कोशिश में लग गए! शिकायत चोरी की नहीं तो और किस बात की हुई है। उस छुटकी सी लड़की ने बहन को जो मार लगाई है वह आपने नहीं देखा?’

ना कहा नहीं जा सकता था। जो नज़रों के सामने बना हो वह देखा न हो ऐसा तो कैसे हो सकता है। देखा ही था। तीन दिन पहले, यहाँ पहुँचते पहली सुबह को ही देखा था।

‘हम्म, तो अब चाय बना दे’ माधो ने कहा और बोला, ‘मारामारी की शिकायत बहन ने इन्स्पेक्शन वाले दिन ही ऊपर भेजी है। मैं कहुँ, दुर्गी जैसी जी हो पर दिल की बुरी नहीं। चोरी करेगी पर कोई पैसे वैसे की नहीं, चीज़ें लेकर बेचती हो ऐसा भी नहीं। बस, उसका मन बच्चों में लगा रहता है। बच्चे भूखे हुए नहीं कि दुर्गा छापा मारेगी। या तो दूध का पाउडर उठाएगी, या दूध चुरा जाएगी या कुछ खाने पीने का ले जाएगी। और कभी कुछ नहीं।’ बोलकर माधो फिर हंसा।

दुर्गा के विषय में माधो ने जो कहा उससे ज़्यादा मुझे कुछ पता भी नहीं था। जो आदमी कल-परसो आया हो और अंदर रहता भी न हो उसको ऐसा पूछना व्यर्थ है यह बात माधो समझने वाला नहीं था। मैंने कहा, ‘अंदर आप सब क्या करते हो उसकी इधर किसी को कुछ नहीं पड़ी।’

माधो बोला, ‘पड़ी क्यों नहीं, भाई? तुझे मिलने यहां मैं ऐंवे ही नहीं आया। कहना तो यह था कि मैं छोटा आदमी होकर इतना चला लेता हूँ तो बहन तो सबकी ऊपरी हैं। उन्होंने थोड़ा कुछ चला लिया होता तो इस इतनी सी लड़की की शिकायत ऊपर तक नहीं जाती और जांच पड़ताल न आती।’

पड़ताल आने वाली है यह सुन कर किसी को भी घबराहट होगी। ख़ास कर प्रसंग देखने वाले को तो चिंता करनी ही पड़ती है। माधो की बात पर बिलकुल ध्यान न देना तो अशक्य था। पूरी हकीकत जाननी तो पड़ी ही। शिकायत क्या है और उसकी जांच कब होने वाली है यह बात भी जानी।

अंत में माधो ने कहा था, ‘दुर्गा को किसी से पूछना चाहिए कि जांच में कैसे और क्या जवाब देते हैं। मैं जानता हूँ। लक्ष्मी भी जानती है कि क्या कहने के बाद कुछ परेशानी नहीं होती। दुर्गी जाने खुद राजकुमारी हो। किसी से पूछ कर जैसे छोटी हो जाएगी।’

दुर्गा। इतनी से लड़की को ज्ञान नहीं होगा कि उसे माधो और लक्ष्मी जैसे सलाहकारों की सलाह के मुताबिक़ चलना चाहिए। अगर हो भी तो शायद उसे वैसा करना पसंद न हो। माधो यह सब यहां दूकान पर आकर क्यों बोल रहा था यह समझ नहीं आ रहा था लेकिन मैंने कुछ कहा नहीं।

माधो ने अपनी बात शुरू रखी, ‘वह पूछे या न पूछे। बुज़ुर्ग होने के नाते हमारा भी तो कुछ फ़र्ज़ तो है न! हम कहकर भेजे वह बोलती तो वे लोग कितनी भी कोशिश करें तो भी कुछ होता नहीं।’

जवाब देने की कला आप जानते हों और दुर्गा का भला चाहते हो तो आप ही उसे कहिए न! मन में आई बात टाल कर मैंने कहा, ‘दुर्गा तो रात दिन आप के साथ रहती है तो फिर सिखाइए न!’

माधो बोला, ‘हम से सीधा बोला जाता तो तुम तक आते ही नहीं। मैं बिलकुल खरे हृदय से कहूँ तो भी मेरी कोई बात दुर्गा मानने वाली नहीं। लक्ष्मी पर तो उसको बिलकुल भरोसा नहीं। एक नंदू की सुनती है; पर नंदू इन मामलों में पड़ता नहीं। पड़ता है तो उलटा बकता है। तुम बाहर के हो। तुम बोलोगे तो शायद उसे भरोसा होगा।’

थोड़ा रूक कर माधो ने कहा, ‘बच्चू, जांच में जवाब तो तुमको भी देना पड़ेगा। तुम वहीँ हाज़िर थे यह भी अर्ज़ी में लिखा है। साक्षी में तुमको बुलाकर ही छोड़ेंगे। तुम दुर्गा से मिल लो उसमें ही भलाई है।’

मुझे भी फंसना है तो अब काम रोक कर भी कुछ सोचना पड़े वैसी नौबत आ गई थी। मैं वैसे दुर्गा को एका – दो बार ही मिला था। उस रात ट्रेन में साथ थी पर कुछ लंबी बात तो हुई नहीं थी। अरे, एक दुसरे से ख़ास कोई पहचान भी नहीं बनाई थी।

दुसरे दिन सुबह बाग़ में नलिनी बहन के साथ उसका जो हुआ वह देखा और आखिर में कल ही वह यहाँ, इस दुकान पर नंदू की बात पूछने आई थी उतना ही, इससे अधिक दुर्गा के साथ मेरा कोई परिचय नहीं। दुर्गा को समझाना तो दूर की बात है, थोड़ी सी सिफारिश करते भी मुझसे बने इस विषय में मेरी बिलकुल श्रद्धा नहीं थी।

फिर भी पिछले दो-चार दिन नंदू ने दुर्गा के विषय में की बातें, दुर्गा का परिचय करने की सुषुप्त इच्छा, उस समय माधो की की हुई बात या फिर साक्षी के तौर पर कुछ कहना पड़ेगा इस बात का भय, न जाने किस कारण से प्रेरित होकर मैंने दुर्गा से साथ बात करने का कबूल किया था। कहा था, ‘दुर्गा को मिलूंगा तब उसको आप की बात माननी चाहिए ऐसा कह कर देखूंगा। और साक्षी होना पड़ेगा तो कह दूंगा कि मुझे कुछ पता ही नहीं। उस वक्त मैं बहुत दूर खड़ा था।’

‘बस, यही जवाब देते रहना। मैंने देखा ही नहीं वही कहते रहहना। और कुछ बोलना ही मत।’ माधो कह कर गया।

कुछ मुश्किलें ऐसी होतीं हैं जिसका निवारण ढूंढने में उलझो और वे अपने आप आसानी से सुलझ जातीं हैं। उस सूबह बात करके माधो गया फिर पूरा दिन, वह और लक्ष्मी जैसा कहे वैसा बयान देने की बात दुर्गा को कैसे कही जाए उस उलझन में कटा। सामने से दुर्गा को मिलने जाना चाहिए या वह नंदू के वहाँ आई हो तब कहना चाहिए यह निश्चय नहीं हो पा रहा था। उतने में शाम को शाला से वापिस आती हुई दुर्गा दिखी।

‘एक मिनिट, ज़रा रुको तो।’

वह निःसंकोच खड़ी रही। मैं नज़दीक पहुंचा तब थोड़ा हंसी।

अचानक ही क्या कहना था वह मैं भूल गया। लगभग समान उम्र की लड़की को ऐसे रास्ता रोककर खड़े रखने उसके सामने मूर्खता से मौन खड़ा रहना भी मेरे लिए शर्मनाक हो गया। अरे बाप रे! मन में आयोजित किए शब्द जैसे हवा में पिघल गए।

दुर्गा ज़ोर से हंस पड़ी। દુર્ગા જોરથી હસી પડી.

सुना तो था कि ऐसा हो तब धरती रास्ता देती हो तो उसमें समा जाना चाहिए या फिर चुल्लू भर पानी में डूब मरना चाहिए; पर ऐसा कुछ करना पड़े उससे पहले तो वापिस हिम्मत आई। जो दिमाग में आया वह ही बोल दिया, ‘सुन, तेरी पड़ताल होने वाली है।’

बिलकुल अनाड़ी वाक्य। और कहने का तरीका तो उससे भी ज़्यादा अनाड़ी। लगा कि दुर्गा फिर से हंस देगी। मज़ाक ही बनेगा; पर ऐसा कुछ नहीं हुआ।

किताबें छाती से लगाकर दुर्गा सीधी खड़ी हो कर आगे क्या बोला जाता है वह सुनने को तैयार खड़ी रही। मैंने आगे कहा, ‘उस दिन … उस दिन जो बाग़ में हुआ उसकी फ़रियाद बहन ने की है। जांच होने वाली है। माधो कह रहा था कि जांच पड़ताल में कैसे जवाब दिया जाता है यह माधो और लक्ष्मी को आता है। वे दोनों सिखाएंगे।’ ठीक बोला जा रहा है या नहीं यह सोचने के लिए मुझे रुकना पड़ा।

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कर्णलोक [2]

कर्णलोक, ध्रुव भट्ट

‘ तू माधो का वकील कब से बनने लगा?’

‘मैंने … मुझे तो …’ अब क्या जवाब दिया जाए?

‘जांच की बात से घबराने के बदले दुर्गा दूसरी ही बात पर चढ़ गई। उसका हसना तो कब का थम चुका था। वह और कुछ कहने जा रही थी; पर फिर रुक गई। थोड़ी देर ऐसे ही सामने देखती हुई खड़ी रही। फिर कौन जाने किस पर दया खा रही हो वैसी शक्ल करके बोली, ‘लक्ष्मी-माधो क्या ख़ाक सिखाएंगे? ऐसी बातों में उलझने के बदले दूकान पर बैठकर साइकलें बराबर रिपेर करते रहो तो भला होगा तुम्हारा।’

और कुछ भी बोले बग़ैर वह चली गई। दूसरे दिन वह जाली के पास खड़ी माधो के साथ कुछ बात कर रही थी जो मैंने देखा। उनकी बातें सुनी जा सके उससे ज़्यादा अंतर था। मैंने माना कि माधो उसे पाठ पढ़ा रहा था।

उसके बाद के हफ़्ते जांच अधिकारी आ गए। नेहा बहन भी आई थी। सबको बुलाया गया। आख़िर में दुर्गा को बुलाया। अधिकारी ने आकर पहले तो दुर्गा को प्रेम से पास बुलाया। फिर बहन की फ़रियाद पढ़कर सुनाई। फिर पीठ थपथपाते हुए पूछा ‘बहन ने यह लिखकर भेजा है। अब तुम कहोगी वह भी सुनूंगा। बोल बेटी, उस दिन क्या हुआ था?’

बस। अधिकारी बोल लें इतनी ही देर थी और दुर्गा ने बता दिया ‘मैंने नलिनी बहन को मारा है। सबके सामने मारा। डाली टूट गई तब तक पीटा। पहले उन लोगों ने हमें…’

दुर्गा स्थिर खड़ी थी। अब क्या हो सकता था उस बारे में सब कुछ न कुछ दलीलें कर रहे थे उसका एक शब्द भी दुर्गा के कान पड़ने वाला नहीं था। अचानक उसने अधिकारी को पूछा ‘अब मैं जाऊँ?’ और छुट्टी मिलने का इंतज़ार किये बिना वह दौड़ गई।

बहन, नेहा बहन, साहब सब अभी बातों में लगे थे। हमने, बाकी के सब ने विदा ली। नंदू दरवाज़े पर बैठा था वह खड़ा होकर हमारे साथ चला। बाहर कम्पाउंड में पहुँचते ही मेरे मुँह से निकल गया ‘सही हुआ।’

‘नंदू ने रूककर मेरे सामने देखा और बोला ‘क्या सही हुआ भाई? ग़लत ही तो हुआ है। पहले उसने हज़ारों बार रोककर रखा था वह आज होकर रहा। मेरी माँ जननी हमेशा छुपाना चाहती थी उन औंसुओं को लाख कोशिश कर भी छिपा नहीं सकी। तुमने देखा नहीं?’

देखा था। अच्छी तरह देखा था। करमी का नाम आते ही जैसे अनजान गुफ़ा से सरकते झरने की तरह खारा पानी आँखों की कोर पर आकर रुका था। ज़्यादा देर वहाँ रुकना पड़ा होता तो बहकर गाल पर फैल जाता।

दूसरे दिन लक्ष्मी और माधो दोनों ख़रीददारी के लिए निकले तब मेरी दुकान पर आकर बैठे। ग्राहक की साइकल का काम ख़तम करके मैंने ऑफ़िस में भेजने के लिए चाय बना ली थी। उन दोनों को भी चाय पिलाई। हाथ में कप लेते हुई लक्ष्मी माधो को कह रही हो उस तरीके से बोली ‘बहन ने बेवजह बवाल किया। इसका परिणाम क्या? कुछ नहीं। मुल्ला की दौड़ मस्जिद तक।

माधो गंभीर होकर बोला ‘वह तो बहन खुद कह रही थीं कि बेवजह शिकायत हो गई। अब लगता है कि भूल गई होती तो अच्छा होता।’

‘वह सब तो ठीक यह दुर्गी भी अलग ही है। मुझे लगा था की इतनी सी लड़की रो देगी और विनती करेगी; पर माफ़ी का तो वह एक शब्द भी न बोली।

लक्ष्मी ने हवा में उड़ती साड़ी पकड़कर अपने मोटे शरीर पर ठीक से लपेटते हुए कहा था ‘दुर्गा रोएगी? उस दिन भी तुमने देखा नहीं कि आँखों में आँसू आए ही थे कि उतने में ‘मैं चलती हूँ’ कहकर जवाब सुनने के लिए भी रुकी नहीं। सीधे दौड़ी।’

लक्ष्मी कहती थी, ‘कितना भी गुस्सा क्यों न हो फिर भी दुर्गा को डांटने का जी नहीं करता। वह कितनी भी शरारत कर ले पर मैं जानती हूँ कि दुर्गा औरों के लिए खुद सहनेवालों में से है।’

लक्ष्मी और माधो को बच्चों को दुत्कारते सब ने देखा है। वैसे भी वे दोनों ढीट माने जाते थे; फिर भी किसी न किसी अवसर पर उनकी भावना बहती निकलते देखी है। इंसान अपनी इच्छा से हमेशा किसी का बुरा नहीं कर सकता। बुराई के अगोचर में से ही भलाई का झरना कभी न कभी अचानक कलकल करता बह ही जाता है।

एक बार माधो से भी सुना था ‘वह तो बहन को लगता था कि इस शिकायत के बहाने बच्चे काबू में नहीं रहते यह कहकर यहां से तबादला करा लिया जा सके इसलिए यह सब तमाशा किया था।

लक्ष्मी की बातों से ही जाना था। इतनी छोटी उम्र की लड़की को कोई सज़ा नहीं की जा सकती। कायदे से देखा जाए तो बाहर के अधिकारी उसे डांट भी नहीं सकते थे। हाँ, नलिनी बहन खुद उसे डांटे या फटकारे या लक्ष्मी उसे धमकाए तो उन्हें कोई क्या कर सकता है?

सारी जफ़ाओं के बाद यह तय हुआ कि बहन को नहीं, दुर्गा को ही कहीं और भेज दिया जाए। ऐसे आश्रम हर जगह तो होंगे नहीं इसलिए पालीताणा नारीसंरक्षण गृह में भेज देने का प्रस्ताव रखा गया।

दुर्गा मेरे लिए तो बिलकुल अनजान थी। फिर भी वह चली जाएगी यह बात नंदू को बताने के लिए मैं दौड़कर गया था। इन लोगों ने दुर्गा को निकाल बाहर करने का फैसला लिया है यह भी कहा था। ‘उसने उस दिन भली बनकर सब कुछ क़ुबूल कर लेने की क्या ज़रूररत थी? माधो ने सिखाया तो था, फिर भी हो गयी न देशनिकाल!’

नंदू ऐसे वक़्त में सोच में पड़ जाता। थोड़े पल कहनेवाले की ओर देखकर उसकी सच्चाई की कसौटी कर रहा हो ऐसा महसूस होता था।

थोड़ी देर के बाद अपनी जनेऊ से खेलते हुए धीरे से पर स्पष्ट आवाज़ में नंदू ने कहा, ‘जो सच था वह ही दुर्गा ने कहा, भाई, उसे जाने बिना तुम कुछ भी सोचोगे तो यह अच्छा नहीं होगा। और कुछ वक़्त यहां रहोगे तब उसे समझ पाओगे।’

माधो और लक्ष्मी की बात पर नंदू थोड़ा हँसा। फिर कहा ‘एक और बात समझ ले मुन्ना, आलतू फ़ालतू लोगों का सिखाया दुर्गाई कभी भी नहीं बोलनेवाली। वह कौन है यह जानोगे तब समझ में आएगा। वह किसी की सिखाई बातें भला क्यों बोलेगी? पालीताणा जाना पड़े या और कहीं। उसे क्या फर्क पड़ेगा! हाँ, इन बच्चों को और मुझे फर्क पड़ेगा।’ नंदू थोड़ी देर रुका। गहरी सांस लेकर आगे बोला, ‘तुम्हें पड़ेगा या नहीं यह अभी से जान नहीं सकता।’

 

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